बाजार में 'माल' बनकर रह गया है आदमी : नामवर सिंह

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नामवर सिंहजाने-माने आलोचक नामवर सिंह मौजूदा दौर की हर घटना को बाजारवाद से जोड़ कर देखते हैं। उनकी राय में आज हर चीज बाजार से प्रभावित है, जहां आदमी बाजार में महज एक 'माल' बन कर रह गया है। यही वजह है कि अब हर चीज आना-पाई-कौड़ी में आंकी जाने लगी है। बाजार से न तो राजनीति, न साहित्य और न ही मीडिया अछूता है।

बाजारवाद के खतरों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि समाज से लेकर राजनीति तक हर क्षेत्र में बाजार इस कदर हावी है कि लोक सभा जैसी संवैधानिक संस्था भी अप्रासंगिक नजर आने लगी है। हालात ये हैं कि हर किसी को अगर कहीं कुछ नजर आ रहा है तो वह है फायदा। लोग हर बात में फायदा खोजने लगे हैं। यहां तक कि रिश्तों में भी फायदे की घुसपैठ हो चुकी है जो परिवार जैसी संस्था के लिए बेहद खतरनाक है।

उन्‍होंने कहा कि लोग नफा नुकसान की तर्ज पर जिंदगी बदलने लगे हैं। शायद यही पूंजीवाद का चरम है। पूंजीवाद की सबसे बड़ी देन है कि वह व्यक्तिवाद को बढ़ावा दे रहा है जिससे सामाजिक ढांचा खंडहर होता जा रहा है। उन्होंने कहा कि परिवार एक बुनियादी संस्था है और भारतीय परंपरा ऐसी ही कुछ संस्थाओं के कारण बची हुई है।

न्यू़ज़ एक्सप्रेस के मंथन कार्यक्रम में पत्रकारों से मुखातिब नामवर सिंह ने कहा कि आज राजनीति में सामाजिक मुद्दों को तरजीह नहीं दी जा रही है जबकि सामाजिक ढांचे में बदलाव की बेहद जरूरत है, जिसका नतीजा यह है कि राजनीति बिलकुल बेअसर और अराजनीतिक हो गयी है।

नामवर सिंह ने कहा कि आज देश के हर राजनीतिक फैसले में पक्ष और विपक्ष की मिली भगत नजर आती है। सत्ताधारी कांग्रेस और विपक्षी दल बीजेपी दोनों को एक साथ कटघरे में खड़ा करते हुए उन्होंने कहा कि दोनों ही की ख्वाहिश है कि पश्चिमी मुल्कों की तरह भारत में भी दो दलीय व्यवस्था बन जाए। नामवर सिंह ने कहा कि अगर दलितों और महिलाओं को लेकर इन पार्टियों के नजरिये की बात करें तो शायद ही कोई खास फर्क नजर आए।

साहित्य और राजनीति के रिश्तों को लेकर नामवर सिंह ने कहा कि साहित्य दिनों दिन व्यापक हुआ है। बात जब कहानियों और दूसरी साहित्यिक कृतियों की उठी तो उन्होंने कहा कि राजनीति तो उपन्यास की खुराक है। सामाजिक मुद्दों पर कहानी और कविताएं काफी लिखी जा रही हैं लेकिन राजनीतिक मुद्दों पर अक्सर व्यंग्य ही लिखे गये हैं। प्रेस विज्ञिप्ति


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