सहारा ने चलाई अपने स्ट्रिंगरों को लूटने की स्‍कीम

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सहारा समय में दो-चार दलाल टाइप लोगों को छोड़कर किसी की कोई हैसियत नहीं. सबसे ज़्यादा शोषित हैं तो सहारा के स्ट्रिंगर. सभी स्ट्रिंगरों को निपटाने के लिए नया फरमान आया है कि उनका बिल कम किया जाए. स्ट्रिंगर की न्यूज रिपोर्टर के नाम पर डाल कर बिल नहीं देना, एन मौके पर न्यूज़ रोक लेना, पैकेज की बड़ी खबरों को वीओ बनाकर डाल देना, स्ट्रिंगरों की दो-दो तीन-तीन न्यूज को इकट्ठा करके एक न्यूज बनाकर बिल कम कर देना जैसे प्रताड़ित करनेवाले हथकंडों के बाद अब नया फरमान है, उन्हें तत्‍काल बाहर करने के लिए मेहनताना कम कर दिया जाए.

अब नया नियम बनाया गया है कि हर स्ट्रिंगर को हर माह कम से कम 40 न्यूज करनी ही होगी (ऐसी न्यूज जो चैनल पे दिखाई गयी हो),  तभी उसे लिए उसको 15 हज़ार रुपए दिए जाएँगे ( ये बात कितनी अच्छी लगती है, लेकिन है ऐसा नहीं)  यानी एक न्यूज का 375 रुपया,  लेकिन अगर स्ट्रिंगर ने 40  से कम न्यूज की तो उसके बिल से प्रति खबर 800  रुपये के हिसाब से काट लिया जाने लगा है. किसी की 30 न्यूज लगी तो 15000  कुल मेहानताने से 10  न्यूज के 8000  काट कर केवल 7000  का बिल पास किया जाने लगा है.

अगर स्ट्रिंगर 80  खबर बनाए तो 40  लगने की आशा रहती है. अब अगर किसी की 20  न्यूज ही लगी तो उसे काम के बिल के एक धेला भी नहीं मिलेगा क्योंकि 15000  तो 40  न्यूज लगाने के मिलते पर 20  ख़बरें कम हैं तो उसके 16000  (प्रति न्यूज 800 रुपया) माइनस.  कंपनी कह रही है कि ये ऐहसान मानो कि एक हज़ार और वसूल नहीं कर रहे.

सहारा ने स्ट्रिंगरों को चूसने का ये नियम फ़रवरी 2011 से लागू कर दिया और इसकी जानकारी तक नहीं दी. अब दो महीने बाद जब बिल नहीं आ रहे हैं तब जाकर पता चला कि पैसा क्यों नहीं आ रहा है. अगर वो पहले बता देते तो तभी कोई और काम ढूंढ़ लेते स्ट्रिंगर लोग. 1700  करोड़ में आईपीएल टीम खरीदने वाली और लंदन में अरबों में होटल खरीदनेवाली सहारा को लूटने के लिए मिले तो बेचारे ग़रीब स्ट्रिंगर लोग. थोड़ी तो लाज शरम रखते सहारा वाले.

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.


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