हर महीने ढाई लाख रुपये तनख्वाह पाते हैं अनुरंजन झा

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सोचिए, अगर किसी को महीने में ढाई लाख रुपये सिर्फ तनख्वाह के रूप में मिले तो उसे भ्रष्ट या बेईमान होने की जरूरत पड़ेगी? बिलकुल नहीं. लेकिन लोग हैं कि इतना पाकर भी चैन से ईमानदार नहीं बने रह सकते. पर अनुरंजन झा ने दावा किया है कि वे भ्रष्ट व बेईमान कतई नहीं हैं क्योंकि वे अपना कच्चा चिट्ठा खुद खोल रहे हैं. पंद्रह दिनों के भीतर अपनी संपत्ति घोषित करने के फेसबुकिया ऐलान के बाद अनुरंजन ने पंद्रहवें दिन फेसबुक पर संपत्ति का ऐलान कर ही दिया.

इस ऐलान में उन्होंने यह भी खुलासा किया है कि उनका सेलरी पैकेज 30 लाख रुपये सालाना है. जोड़ते रहिए महीने के कितने बैठेंगे. और, ये तो सीएनईबी के सीओओ की सेलरी का हाल है. जरा पता लगाइए कि आशुतोष, अजीत अंजुम, विनोद कापड़ी, शाजी जमां, राहुल देव, एमजे अकबर आदि इत्यादि को महीने में कितने पैसे मिलते हैं? सुनेंगे तो कई लोग बेहोश होकर गिर जाएंगे. खुद इन लोगों ने भी अपने करियर के शुरुआत में ये कल्पना न की होगी कि उन्हें इतने पैसे मिलेंगे, पर जब मिलने लगते हैं तो लोगों का माइंडसेट भी इसी के अनुरूप ढलने-बदलने लगता है. लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू ये है कि देश के कोने-कोने में, जिले-जिले में कार्यरत स्ट्रिंगर बेचारे तो फाकाकशी के शिकार है. न संस्थान से मिलता है और न ही जनता-जनार्दन से. ज्यादातर लोगों का यही हाल है. ऐसे में अगर वे महीने में दस बीस पचास हजार के लिए दाएं-बाएं कर कराके कमा लेते हैं तो उन्हें दलाल घोषित कर दिया जाता है.

ये सेलरी पैकेज की बात तो हम सिर्फ हिंदी वाले संपादकों, मैनेजिंग एडिटरों, सीईओ, सीओओ आदि की कर रहे हैं. अंग्रेजी वालों की सुनेंगे तो होश उड़ जाएंगे. जब संपादकों, सीईओ, सीओओ आदि को इतने पैसे मिलते हैं तो जाहिर है कि वह अपना निजी जीवन भी दांव पर लगाकर, अपना सब कुछ झोंककर कंपनी की तरक्की के लिए काम करेगा और कंपनी के खिलाफ लिखने बोलने वाले को अपना परम दुश्मन समझेगा, मालिकों को भगवान से कम न मानेगा और नौकरी जाने को जीवन की सबसे बड़ी ट्रेजडी महसूस करेगा. और इसी प्रक्रिया में समाज, सरोकार, पत्रकारिता सब तेल लेने चले जाते हैं क्योंकि कंपनी को आगे बढ़ाना है, चाहे जो भी करना-कराना हो.

और यही कारण है कि जब ये दो-चार-पांच-दस-बारह-पंद्रह-बीस लाख रुपये महीने पाने वाले संपादक अचानक जब पैदल हो जाते हैं तो उनका चेहरा मोहरा सब लटक जाता है, कई तरह के धंधे करने की कोशिश करते हैं लेकिन किसी भी धंधे से अचानक महीने में दो चार दस बीस लाख रुपये तो नहीं आने लगेंगे, सो ये लोग सब कर कराने के बाद फिर नौकरी पाने व मालिक को पटाने के अभियान में लग जाते हैं. अनुरंजन झा को ही लीजिए. नौकरियां छोड़ते रहते हैं और कुछ गैप के बाद, कई तरह के काम करने के बाद फिर नौकरियां पाते-पकड़ते रहते हैं. इंडिया न्यूज से पैदल हुए थे तो मीडिया सरकार नामक वेबसाइट की शुरुआत कर दी. बिहार में चुनाव लड़ने की तैयारी शुरू कर दी. पर भाग्य ने ऐसा पलटा खाया कि जिस राहुल देव ने इनकी वेबसाइट मीडिया सरकार का उदघाटन किया था, उन्हीं राहुल देव का तख्तापलट कर अनुरंजन झा सीएनईबी के बॉस बन गए. और, अब उन्होंने अपनी संपत्ति का ऐलान करके वर्तमान व आधुनिक संपादकों से लीड लेने की कोशिश की है.

अनुरंजन झा के उर्वर दिमाग ने एक और काम किया है. उन्होंने खुद तो संपत्ति का ऐलान किया है, बाकी लोगों से भी अपेक्षा की है कि वे अपनी अपनी सेलरी व संपत्ति बताएंगे. और इसके लिए उन्होंने एक वेबसाइट का भी निर्माण कर दिया है, जर्नलिस्ट्सएसेट्स डॉट कॉम. अपनी संपत्ति की लिस्ट में अनुरंजन ने पूरी ईमानदारी से बताया है कि वे और उनकी पत्नी मिलकर एक कंपनी भी चलाते हैं जिसके 75 प्रतिशत शेयर उनकी पत्नी और 25 प्रतिशत शेयर अनुरंजन के पास हैं. अनुरंजन ने फेसबुक पर संपत्ति का ऐलान करते हुए जो लिखा है, वह इस प्रकार है- ''लीजिए .. अपने पास जो है सब बता दिया। बैंक में 2 लाख 80 हजार रुपए, दो गाड़ी जिसमें esteem कर्जमुक्त, लीनिया पर 5 लाख का लोन, पत्नी के नाम पर घर.. उनके एकाउंट में कुछ पैसे, पैतृक गहने, बेटे के नाम पर FD.. सालाना 30 लाख की नौकरी। सब विस्तार से देखें http://journalistsassets.com पर। और हां, इस वेबसाइट के जरिए आप भी अपनी संपत्ति का ब्यौरा देना चाहें तो आपका स्वागत है। कुछ सुझाव हो तो जरुर बताएं।''

अनुरंजन झा को इस साहस और नई शुरुआत के लिए बधाई. हालांकि भड़ास पर अनुरंजन से पहले हिमांशु डबराल और अनुज सिन्हा ने अपनी-अपनी संपत्ति घोषित कर दी है. लेकिन सीईओ, एडिटर, सीओओ जैसी प्रोफाइल में अभी तक सिर्फ अनुरंजन ने अपनी संपत्ति को पब्लिक किया है, जिसके लिए वे वाकई बधाई के पात्र हैं. देखना है कि अनुरंजन की ही तरह अन्य सीईओ-सीओओ नुमा संपादक या मैनेजिंग नुमा एडिटर अपना-अपना लेखा-जोखा पेश करते हैं या नहीं.


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