न होगा 42 लाख और न चलेंगे लोकल चैनल

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गोरखपुर शहर के सात लोकल चैनल सरकार के नये फरमान की वजह से बंद हो गये है। पिछले पांच वर्षों से स्थानीय समाचार पत्रों के साथ अपनी अहम पहचान बना चुके लोकल चैनल आम आदमी की जरूरत बन चुके थे। पर सरकार के बिना सोचे-समझे यह नियम लागू कर दिया। आप सभी को यह जानकर हैरानी होगी 1988 में जब वीडियो पार्लर की शुरुआत हुई थी तब सरकार ने प्रति वीडियो स्‍क्रीन 100 रुपये का टैक्स रखा था।

केबल के आ जाने के बाद धीरे-धीरे वीडियो बंद हो गये और अब एक जगह से ही केबल ऑपरेटर फिल्में और अन्य चैनल दिखाने लगे हैं,  उन्हीं चैनलों में स्थानीय केबल लोकल चैनल भी हैं। इन चैनलों की कमाई का मुख्य जरिया स्थानीय विज्ञापन है,  जिससे चैनल मालिक अपने कर्मचारियों के वेतन और अन्य खर्च चलाते हैं। यदि चैनलों की बात करें तो लगभग प्रत्येक शहर के लगभग सभी राष्‍ट्रीय व क्षेत्रीय समाचार चैनल इन्हीं लोकल चैनलों से विजुअल मांग कर अपनी नौकरी बचाते रहे हैं। कई विकलांग और मीडिया की एबीसीडी भी न जानने वाले का काम इन्हीं चैनलों की वजह से चल रहा था।

सबसे बड़ी सम्स्या यह है कि अब अपन घरों में ही शहर की दिन भर की खबरों को जान लेने वाले नागरिकों को अगली सुबह अखबारों का इंतजार करना पडे़गा। यह पूरी तरह से गलत निणर्य है कि नये टैक्स नियम के तहत 2400 लाइसेंस का और कुल कनेक्शन का गुणा 100 यानी 42 लाख के लगभग एक चैनल पैसा जमा करेगा तभी वह चैनल चला पायेगा। अब इतना पैसा वह लायेगा कहां से। सरकार को नियम बनाने से पहले यह सोचना चाहिए था कि लोकल चैनलों की मासिक आय कितनी है और उनका लाभ कितना है।एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.


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