नकवी जी की सेलरी 10 लाख रुपये महीने है!

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अनुरंजन झा ने अपनी संपत्ति घोषित करते हुए अपनी सेलरी का जो खुलासा किया है, उसके आधार पर लोग टीवी इंडस्ट्री के बिग बॉसों की सेलरी का अंदाजा लगाने लगे हैं और इस तरह ''सेलरी रहस्य'' से पर्दा उठने लगा है. अनुरंजन ने खुद लिखित रूप से बताया कि वे सालाना तीस लाख रुपये के पैकेज पर सीएनईबी गए हैं. महीने का ढाई लाख रुपये हुआ. लेकिन ये सेलरी कुछ नहीं है, अगर आप सुनेंगे कि दूसरे न्यूज चैनलों के संपादकों की सेलरी क्या है.

अनुरंजन झा से संबंधित पोस्ट पर एक कमेंट आया है, जिसमें कुछ बिग बॉसेज की महीने की सेलरी के बारे में बताया गया है. इस कमेंट के अनुसार- ''बाकी लोगों की सेलरी भी जरा सुन लीजिए. जानकारी के अऩुसार अजीत अंजुम छह लाख, शाजी जमां आठ लाख, आशुतोष 6 लाख, विनोद कापड़ी सात लाख, राहुल देव चार लाख, सुधीर चौधरी 5 लाख की सेलरी पाते हैं. चाहो तो चेक करवा लो. और नकवी भी आठ लाख पाते हैं.'' इस कमेंट के दावे की पड़ताल करते हुए जब टीवी न्यूज इंडस्ट्री के कुछ वरिष्ठ लोगों से बात की गई तो सच्चाई इसी आंकड़े के आसपास मिली.

इन लोगों ने नाम न छापने की शर्त पर भड़ास4मीडिया को बताया कि आजतक की संपादकीय टीम के नेता और वरिष्ठ पत्रकार कमर वहीद नकवी की तनख्वाह आठ लाख रुपये महीने नहीं बल्कि दस लाख रुपये महीने है. सीएनबीसी आवाज के एडिटर संजय पुगलिया, जो कभी एसपी सिंह की टीम के खास आदमी हुआ करते थे, भी दस लाख रुपये महीने पाते हैं. उपेंद्र राय जो सहारा मीडिया के सर्वेसर्वा हैं, 11 लाख रुपये के आसपास पाते हैं. दीपक चौरसिया की तनख्वाह स्टार न्यूज में चार लाख रुपये के आसपास है. पुण्य प्रसून बाजपेयी जी न्यूज में कांट्रैक्ट पर हैं और बतौर एडवाइजर काम करते हैं, उन्हें तकरीबन डेढ़ लाख रुपये मिलते हैं, ऐसा सूत्रों ने बताया. यह भी पता चला है कि जब पुण्य सहारा में गए थे तो उनकी सेलरी 11 लाख रुपये महीने के आसपास थी.

एनडीटीवी के रवीश कुमार की तनख्वाह एक लाख रुपये के आसपास है जबकि एनडीटीवी के ही विजय त्रिवेदी तकरीबन चार लाख रुपये पाते हैं. ध्यान रखें कि ये सेलरी एनडीटीवी के संपादकों की नहीं, वहां काम करने वाले वरिष्ठ पत्रकारों की हैं. संपादकों की सेलरी वहां दस लाख रुपये से ज्यादा ही होगी. अजीत अंजुम पांच से छह लाख रुपये महीने पाते हैं, इस पर ज्यादातर लोगों की आम राय है. आशुतोष भी पांच से छह लाख रुपये महीने पाते हैं. वायस आफ इंडिया लांच कराने के लिए संपादक बनकर आए रामकृपाल सिंह ने उस समय आठ लाख रुपये महीने की सेलरी ली थी और ज्वायनिंग के वक्त तीन महीने का एडवांस साइनिंग एमाउंट लिया था. मतलब चौबीस लाख रुपये रामकृपाल सिंह को वीओआई आने के लिए दिए गए थे. उस चैनल के तत्कालीन सीईओ राहुल कुलश्रेष्ठ, जो आजतक से आए थे, उन्हें 12 लाख रुपये महीने तनख्वाह दी जाती थी.

किसी एक को 12 लाख रुपये महीने सेलरी मिलती है और कई सारे साल भर के लिए 12 लाख का पैकेज तलाशते घूम रहे हैं. बाजार में सब चलता है. जो बाजार व कारपोरेट के ज्यादा अनुकूल होता है, उसे ज्यादा सेलरी मिलती है. जो कंपनियों के एजेंडे पर काम कर कंपनियों को ग्रोथ दिलाने में मददगार साबित होते हैं, उन्हें मैनेजमेंट पुरस्कृत करता रहता है, नोटों की बरसात करता रहता है. पर न्यूज चैनलों के मामले में दुर्भाग्यपूर्ण बात ये है कि संपादक लोगों को इतनी तनख्वाह इसलिए नहीं दी जाती कि वे ठीकठाक पत्रकारिता करेंगे, उन्हें पैसे इस बात के मिलते हैं कि कैसे कम से कम स्टाफ व खर्चे में ज्यादा से ज्यादा टीआरपी लाई जाए ताकि ज्यादा से ज्यादा विज्ञापन चैनल को मिल सके.

कैसे ज्यादा से ज्यादा बड़े डील डाल को मैनेज किया जाए, ताकि भरपूर बाहरी और अप्रत्यक्ष निवेश चैनल में हो सके. तो, एक तरह से ये संपादक मार्केट और न्यूज के बीच लचीले दीवार की तरह हैं जो दोनों तरफ के प्रवाह-दबाव को झेलते हुए संतुलन कायम कर अंततः अंदरुनी तौर पर कंपनी का हित साधते हैं और बाहरी तौर पर आम जनमानस के लिए काम करते हुए खुद को दिखाते रहते हैं.

यहां अनुरंजन झा को जरूर बधाई दी जानी चाहिए जिन्होंने मीडिया में शीर्ष पदों पर बैठे व्यक्तियों के पारदर्शी होने को जरूरी मानते हुए अपनी संपत्ति व सेलरी का खुलासा कर दिया. क्या अनुरंजन की ही तरह अन्य मैनेजिंग नुमा एडिटर, डायरेक्टर नुमा एडिटर, चीफ नुमा एडिटर, ओ नुमा सीईओ व सीओओ अपनी अपनी सेलरी व संपत्ति का खुलासा करेंगे? आरटीआई और जन लोकपाल जैसे शब्दों-भावनाओं-माहौल के इस दौर में मीडिया के शीर्ष पर बैठे लोगों को पारदर्शी बन जाना चाहिए वरना वह दूर नहीं जब इन नामधारी संपादकों के घरों के सामने संपत्ति खुलासे के लिए सैकड़ों मीडियाकर्मी धरने पर बैठा करेंगे और तब ये लोग मुंह छिपाने को मजबूर हो जाएंगे.

अगर किसी सज्जन को लगता है कि उनकी सेलरी ज्यादा बढ़ाकर बता दी गई है तो वे अपनी बात नीचे कमेंट बाक्स के जरिए कह सकते हैं या मेल कर सकते हैं. उनकी बात को पूरा सम्मान दिया जाएगा और तदनुसार उनकी यहां उल्लखित सेलरी में संशोधन कर दिया जाएगा. यहां स्पष्ट कर दें कि उपरोक्त आंकड़े वरिष्ठ पत्रकारों से बातचीत पर आधारित हैं और इस बात का पूरा ध्यान रखा गया है कि आंकड़े वास्तविकता के नजदीक हों. फिर भी संभव है कि किसी किसी के मामले में दस बीस फीसदी की कमी-बेसी हो जाए. और हां, मीडिया जगत के लोगों से अनुरोध है कि वे भी अपने-अपने बिग बासेज की सेलरी का नीचे उल्लेख करें ताकि सेलरी व पैकेज की गोपनीय दुनिया से पर्दा हट सके और देशभर के लोग जान सकें कि आजकल के संपादक क्यों कुर्सी से चिपके रहते हैं और किस कारण इन कुर्सियों को पाने के क्रम में अपने रीढ़ की हड्डी को बाहर निकाल फेंकने का काम करते रहते हैं और अंततः मालिक के सामने एक लोटने वाले जीव में तब्दील हो जाते हैं और जनता के सामने खुद को ईश्वर के रूप में पेश करने में लग जाते हैं. इस मसले पर आपको क्या लगता है, अपनी राय, विचार, आलेख जरूर भेजें, This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it पर या नीचें कमेंट बाक्स में लिख दें. -एडिटर, भड़ास4मीडिया


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Comments (34)Add Comment
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written by nakul devarshi, May 09, 2011
शर्म आती है की पत्रकारिता में सैलरी गैप कितना ज्यादा है... हेड ऑफिस में बैठे सम्पादक और वरिष्ट रिपोर्टरों की माना ज़िम्मेदारी बड़ी होती है जिसकी उन्हें मोटी रकम मिलती है....लेकिन एक छोटे से कसबे या जिले के स्ट्रिंगर और रिपोर्टर की क्या गलती जो दिन-रात भाग भाग कर चैनल के लिए साल भर तक खबरें भेजता है.... साईबर कैफे से फीड भेजकर नेट का खर्चा अपनी जेब से भरता है जिसके बदले में वो छोटी सी अपनी तनख्वा का बाट साल भर तक जोहता रहता है....ऐसे लोगों को कंपनी रुला रुलाकर पैसे देती है....और कई बार तो देती ही नहीं.... भगवान् इन कंपनियों के दिमाग में कुछ तो अक्ल डाले....
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written by raahul pandey, May 07, 2011
ek cheej mai hamesha se sunta aa raha ho,ladki ki age aur jounlist ki salary mat pucho.....lekin ab to puchna hi padega bhai.....kyoki hum v kisi kam nahi hai.....
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written by उत्पल, May 01, 2011
अगर इन हरामखौरो के पास कोई नौकरी मांगने जाए तो ढाक पे तीन पात बताते है खुद की घरों में मलाई जाटी जाती है और जो लोग मेहनत कर चैनल चलाते है उनके घरों में खुरचन भी नसीब नहीं होती इन लोगों में कई नाम तो ऐसे हैं जिनपर कुछ आता-जाता नहीं है बस एक बार नाम कमा लिए उसी का खा रहे हैं लेकिन भगवान की लाठी में बहुत दम है एक दिन ऐसा आएगा इनमें से कुछ को तो लाख क्या हज़ार रुपये की नौकरी में भी कोई नहीं रखेगा--बस उसी दिन का इंतजार है----
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written by rohit , April 29, 2011
to ye to rahi Senior logo ki salary ki baat
ab zara nazar daliye junior department ki salary par
jo ki 10 hazar ke upar badti hi nhi aur agr badti hai to post ke saath
wah ri duniya sirf apna ghar bharo aur sirf apne baare me socho
jo itni salary pate hai wahi log kahte hai 10 hazar esse jiyada to nhi de payengi company ka budget nhi hai ..

aur baat rahi tumhari to room 3000 thousand ka hoga baki ka umhara hi to hai ..
ye field hi kamino ka hai
jo jitna bada kamina utna success , utna senior .
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written by sarvesh saxena, April 29, 2011
aham ki bat bahoot sahee hai dosto.hum apne hi bosses ya seniors ki salary par sawal kyon utha rahen hain?yahan bhasha me kuntha aur hatasha zyada nazar aa rahi hai.aesa lag raha hai ki jaise ye salary nahi ghoos lekar itne paise kama rahe ho.aap logo ki choti soch par tajuub hota hai.ye sahee hai kee juniors kee salary aur honee chahiye lekin jo salari seniors ko mil rahee hai woh bhee koi bahut zyada nahee hai. IIM ya IIT se nikla el fresher hi aaj kal shuruat me 4-5 lakh kee salary le lete hai.20-25 sal kam krke in logo ko agar 5-6 lakh ki salary mil rahi hai to hame khush hona chahiye.hindi ke patrakaro key liye ye achi khabar hai ki bina beiman hue,bina dalali ke bhee 5 lakh mahine kama sakte hain.in logo ko bhi to 10-15 sal pahle 3-4 hazar hi milte honge.pata nahi aap logo ne kyon ek galat muhim shuru ki hui hai.muhim chalaiye dalalo k khilaf ya beimani ke khilaf.in logo ne tv ko jo bhi bigada uske khilaf.salary ke khilaf muhim chala kar aesa lag raha hai ki aap log jal rahe hain.sach me jalne ki boo nazar aa rahi hai.jalo mat bhaiya.khush hoiye kal ko mehnat ki to apko bhi 10 lakh milenge.naqvi ho ajit ya kapdi ye kaun se aroon purie ki aulad hain jo inko aate hi 5-6 lakh milne lag gaye.hum sabko junior position walo ke liye ladna chahiye.junior ki growth bhee tab hee hogi jab senior aage jayenge.
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written by Aham, April 29, 2011
Before writing anything else, i want to make it clear that i am a Journalist getting a monthly salary of Rs.15000/- per month. I know that many of my fellow journalists are getting much less that can also be termed as exploitation. No doubt that management exploits journalists these days to the extent that they are worse then a labour getting Rs.300/- a day or a confectioner earning between Rs.300/- to Rs.350/- a day.

Having said that we the journalists who are at the bottom of the journalistic pyramid should not criticize (or envy?) senior journalists who are obviously fetching a hefty amount. Tell me one field where the Senior most office bearer doesn't get manyfold salary than an employee at the bottom of the pyramid? On the one hand, we are criticizing these senior journalists for their pay packets, we appreciate (or eulogize?) boys and girls just passing out MBA or any professional degree colleges fetching astonising amounts during their campus placements! Why? Are we suffering with inferiority complex vis a vis these corporate degrees? The same MBA chap sits on the head of the Editor of your newspaper, you start crying and seek pity for journalistic world and here you are doing just opposite! So, just shun your inferiority complex as well as envy.

At the same time, i would appreciate these senior journalists if they stop becoming pussy cats before their bosses and fight for justifiable salaries of their juniors so that they could lead a normal life if not a decent life.
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written by pirit patrakar, April 29, 2011
Income tax department walon kya ab tak soye ho? ab toh jaag jaoo, kabhi toh patrkaron ko bhi limelight main laoo..Piggi chops k yahan chapey main sahdi kapoor mila, inkey yahan shayad aapkey promotion ka letter ho....
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written by Vikash Ranjan, April 29, 2011
बड़े संपादकों, पत्रकारों की सैलरी जगजाहिर करने की जो मुहिम छेड़ी गई है वह वाकई काबिले तारीफ है...लेकिन यहां एक बात पर मैं विशेष बल देना चाहूंगा कि ये तो उस सैलरी का खुलासा है जो ये बड़े लोग लेते हैं...अंडर टेबल तो हो सकता है कहीं ज्यादा हो...खैर यहां इन लोगों की असाधारण सैलरी पर कमेंट करना मेरा उद्देश्य नहीं है...बल्कि ये कहना चाहता हूं कि अगर ये मुहिम आपने नीचले तबके पर छेड़ी होती तो पता नहीं इसके सही अंजाम पर पहुंचने पर कितने शोषित पत्रकारों का भला हो जाता...क्या कभी आपलोगों ने ये जानने की कोशिश नहीं कि कई पत्रकार आज इस सुरसा के समान बढ़ रही महंगाई के जमाने में भी 5-7 हजार की सैलरी पर खुद का ही नहीं बल्कि पूरे परिवार का पेट पालने पर मजबूर हैं...अब इस सैलरी में कितनों का पेट पलेगा ये तो आप बखूबी समझ सकते हैं...अगर मैं कहूं कि आज कई ऐसे पत्रकारों को इस बात पर पछतावा होता है कि वो पत्रकारिता की दुनिया में घुसे ही क्यों, तो ऐसा कहना ग़लत नहीं होगा...ग्लैमर की चकाचौंध के पीछे की स्याह दुनिया का थोड़ा भी अंदाज़ा आज के नवयुवकों को हो जाए तो शायद पत्रकारिता में भीड़ थोड़ी बहुत तो कम हो ही जाएगी...और जिन प्रतिभाशाली लड़कों का मीडिया जगत में कोई गॉडफादर नहीं है वे कम से कम इस फील्ड में आने के बारे में सौ बार सोचेंगे...कहना तो बहुत कुछ है पर कितना कहूं और क्या क्या कहूं...बहरहाल अगर मुहिम छेड़नी ही है तो पत्रकारों की न्यूनतम सैलरी को फिक्स करने पर छेड़ी जाए तो शायद पत्रकार गर्व से सिर उठाकर अपने पेशे के साथ न्याय कर पाएंगे....
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written by johnsujju, April 29, 2011
BHAI YE AB PATRAKARITAA NAHI RAHI SAB KAHANE KI BAATE HAI....PATRAKAR..EDITOR KITNE BHI CHILLA CHILLA KAR KAHE KI CORRUPTION KO KAM KARNAA HAI LEKIN YE BAHUT MUSHKIL HAI AB AAP YE KAHENGE KI YE UNKI MEHANAT KI KAMAAI HAI....TO 10 LAKHS MONTH PARIWAAR KO CHALAANE KE LIYE NAHI LAGTAA...BHAI KCUH NAHI HAMAAM ME SAB NANGE HAI....
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written by raj, April 29, 2011
Sampadko ki salery to likh di. baki kamayi bhi batao..or news anchar ke screen test jo karte hai vo bhi batao..maliko ki majboori hai ye safed hathi palna...........
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written by bebas patrakar, April 28, 2011
KAHANI NUMBER ONE REGIOAL CHANNEL KEE

Chalo bhai, ye to thee bade channels ke baat. Ab ETV jaise bade media group kee bhee salalry jaan lete hain.
ETV mein reporters kee tankhwah 16000 se adhik nahin,
SR Reporters kee salary 19000 se adhik nahin
chief reporter kee salary 22000 se adhik nahin
principal correspondent kee salary 26000 se adhik nahi
editor kee salary 30000 se adhik nahin
AB KHAAS BAAT
kisi bhee cameraman kee salary 10500 se adhik nahin
AUR AB BREAKING NEWS
is baar ka DA shayad 250/- bhee nahin. MEHANGAI TO AAP JAAN HEE RAHE HONGEIN.
yehi haal hyderabad ka hai.
HAAN SENIOR MANAGEMENT MEIN SHAYAD HEE KISI KEE SALARY 50000 SE KAM HO. AUR WOH KARTE HAI MEETING-MEETING
AUR MANAGEMENT KA KEHNA HAI. ARE BHAI SALARY TO SAHI WAQT PAR MIL JAATI HAI.
SUNA HAI IS BAAR SABHI CAMERAMAN NEIN MARKET SE BYAJ/SOOD PAR PAISA UTHAYA HAIN YA PHIR UDHAAR LEKAR APNEIN BACCHON KA ADMISSION KARAYA HAI.
ETV HAI NUMBER ONE CHANNEL- YEH YAAD RAKHIYEGA.
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written by DINESH RAMAN, April 28, 2011
भाइयों स्ट्रिंगरों की बात करो जो ईमानदारी [ कुछ लोगों को छोड़कर] से काम करते है और उन्हें सालभर में चैनल देता है 500 रुपये ! और कुछ तो हराम के आदी हो गए है सो उन्हें देने के नाम पर मौत आती है ! मसलन जोधपुर में सी एन इ बी ने एक साल में एक स्ट्रिंगर को दिए 500 रुपये,काफी ने तो कलाई खोली ही नहीं, 4 चैनल का नाम बताना ही नहीं चाहते और बाकि का सारी दुनिया जानती है की टी आर पी के रंडीपन में स्ट्रिंगर नाचते है लेकिन पैसों के नाम पर ठेंगा दिखाया जाता है !अगर विश्वाश ना हो तो राजस्थान के स्ट्रिंगरों से पूछो, इन सबकी कलाई खुल जाएगी ! एक दिन सबको ऊपर जाना है अगर हुआ तो वहां इन सबसे बदला जरुर लिया जायेगा ! क्योंकि यहाँ हमारा कोई इस बिरादरी में है ही नहीं !
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written by suresh1983, April 28, 2011
yashvant bhai..yah sab media key wah ghadiyaal hai jo media key naam par loot rahey hai aur beychaarey stringer bhookhey mar rahey hai..desh key bahut sey stringer aisey hai jin ki stisthi vidharbh key kisaano sey bhi jyada buri hai..sharm kerey yah log...
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written by कुंवर चन्द्र प्रताप सिंह, April 28, 2011
अरे भाई तथाकथित कुंवर प्रताप अगर कुछ कमेन्ट लिखते हो तो अपना सही नाम लिखने की भी हैसियत पैदा करो .....दुसरे के नाम का सहारा लेकर अगर इस तरह की चीप हरकते करोगे तो इससे तुम्हारी घटिया मानसिकता का ही पता चलेगा .....यशवंत जी मेरे बड़े भाई है ....और जिस तरह से मेरे नाम का सहारा लेकर तुमने इतनी गन्दी बातें लिखी है उससे अगर तुम सोचते हो की मेरे और यशवंत जी के सम्बन्ध ख़राब हो जायेंगे तो ये तुम्हारी भूल है .....क्योकि मेरे सम्बन्ध विश्वास की बुनियाद पर बनते है ....तुम्हारे जैसे लोगो की बकवास के बुनियाद पर नहीं .....अब तो तुम समझ ही गए होगे की मै तुम्हे पहचान चुका हु .......अगर वाकई कमेन्ट लिखने का बूता है ...और उसके बाद सम्बंधित व्यक्ति का सामना करने की औकात है तो अपना पूरा और असली नाम लिखा करो, ये सब मै इसलिए लिख रहा हु की बहुत सारे लोगो को लगता है की ये कमेन्ट मैंने लिखा है ........जबकि अभी ही मैंने इस खबर को देखा है

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written by bhupendra gaurh, April 28, 2011
peoples samachar indore ne achanak paper band kar patrakaro ko bhukha marna ke liya chodha diya hai
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written by jaatak, April 28, 2011
यशवंत बाबू, भैया ऐसा है के ज्यादा आलोचना ना करो. नेतागिरी की तरह पतरकारिता भी एक समाजसेवा का काम है. हर पतरकार मिशन पर है और पतरकारिता एक मिशनरी काम है. एक मिशनरी पोजीशन भी होती है. तो भैया जे लोग भी नेताओं की तरह डट गए हैं और जनता की * ** हैं. सब मिशनरी काम है.

छुटभैया खुश है, बड़े भैया को १० लाख मिलता है महीने का. ये १० लाख का आंकड़ा उसे याद दिलाता रहेगा के पतरकारिता एक मिशनरी काम है. पर ये मूरख ये कभी नहीं सोंचेगा के जब तक बड़े भौयाओं को १० लाख मिलते रहेंगे इसे १० हज़ार ही मिलेंगे. पर इस मूरख की नज़र गाज़र पे रहेगी और ये मिशनरी काम करता रहेगा.

वैसे जे बड़े पतरकार कहू चले जाएँ पैसा बोरा भर के ही लेते हैं. ठीक भी है जब आदमी की कीमत फिक्स हो जाती है तो फिर उसे दिक्कत नहीं आती. इस देश में १०=२० हज़ार कमाने वाला अपने को समझदार मानने लगता है. वहीँ १ लाख कमाने वाला अपने को ब्रह्मज्ञानी मानता है. उसकी कुण्डलिनी जाग्रत हो जाती है. अब मूलाधार खाली हो गया. तो वह अपने सामजिक सरोकार मूलाधार में खोंस लेता है और मिशनरी पोजीशन मेरा मतलब कार्य में डट जाता है.

आप देखेंगे वारांगना, नाचेगी, गाएगी, कपडे भी उतारेगी. आप ये काम उससे कहीं भी करवाएं. वो करेगी. पेशा है, धंधा है, कीमत फिक्स है. ठीक इसी तरह बड़े भैया हैं, उन्हें मिशनरी काम करना है कहीं भी करेंगे.

मज़ा ये है के पैस हमारी ही जेब का है, लेकिन हमें ये नहीं पूछने देंगे के बड़े भैया आपको इतने रुपयों की क्या ज़रुरत, आप तो मिशनर काम कर रहे है. किसी भी तरह के कंट्रोल की बात करो तो एन. के. सिंह जैसे लोग हाय-दैय्या मोड में विलाप करने लगते है. भाई एक बार कंट्रोल शुरू होगा तो जनता ये तो ज़रूर पूछेगी के आप की कीमत इतनी क्यों है.

अब मुझे क्या अपन तो कुछ नहीं बोलेंगे. पर आप यशवंत बाबू लगे रहो. और तथ्यपरक लेख इस विषय पे लिखो.
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written by kamlesh, April 28, 2011
चैनलों के ये सफेद हाथी बीस फीसदी काम करते हैं और कमाई का अस्सी फीसदी हिस्सा ले उड़ते हैं। वहीं अस्सी फीसदी काम करने वाले निचले कर्मचारियों को कमाई का 20 फीसदी हिस्सा ही मिल पाता है। अफसोस। smilies/cheesy.gifsmilies/cheesy.gifsmilies/cheesy.gif
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written by vishal , April 28, 2011
koi in media ke bade dhrmatmaaon ko samjhaye ki bhaiya chote reporter aur stringer ko sirf unka mehntana samay se de diya karein, jai hind jai bharat .aap sabhi ka ek ptrkaar bhai./
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written by vishvesh, April 28, 2011
मिडिया छोडकर दूसरा कोई ऐसा क्षेत्र नहीं होगा जहाँ के कर्मचारियों के आर्थिक स्थिति में जमीन-असमान का फर्क होता है. यहाँ एक को पगार सलाना करोड़ों मिल रहे हैं, तो दूसरा साल भर एक एक पाई के लिए तरस रहा है. स्ट्रिंगर उन्हीं में से एक हैं जिनकी खबरे 70 प्रतिशत चैनल पर चलती रहती है लेकिन आमदनी के नाम पर उन्हें प्रबंधन ठेंगा दिखाती है. ऐसे में स्ट्रिंगरों ने चैनल के माइक को बन्दुक बना लिया है जिसकी नोंक पर रंगदारी और वसूली की जा रही है. एक नए अपराध की शुरुआत इसी आर्थिक असंतुलन से हो रहा है, जो देश के विश्वसनीय चौथे स्तंभ को खोखला कर रही है.
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written by सुरेश, April 28, 2011
जितने भी इस पद पर बैठे हैं सब के सब हरामखोर हैं साले अपने तो मोटी रकम लेते हैं और दूसरे कर्मचारियों के साथ दुर्व्यवहार साला यहां पर सैलरी से महीने का खर्च ही नहीं निकलता महीने के अंत में भिखमंगा हो जाना पड़ता है। जब किसी नए स्टॉफ को रखा जाता है तो उसे एक मेहनत करने वाले मजदूर से भी कम पैसे मिलते है...। इन सबों के पिछवाड़े में पेट्रोल लगाकर बाहर निकाल देना चाहिए....
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written by lucky jain, April 28, 2011
editors ko mile achcha he lekin reporters ki to koi vakat hi ni he. media house malik bhul jate he ki reporters ki lai khabar se hi akhbar or channal ki trp or pathak sankhya badti he. phir bhi pareshan he reporters. electronic media se jyada buri halat print media ki he
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written by lucky , April 28, 2011
editors ko mile achcha he lekin reporters ki to koi vakat hi ni he. media house malik bhul jate he ki reporters ki lai khabar se hi akhbar or channal ki trp or pathak sankhya badti he. phir bhi pareshan he reporters. electronic media se jyada buri halat print media ki he
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written by pappu, April 28, 2011
investing subject ye hai ki jin logo ko itne salery mil rahe hai kya unmey sey sabhi log patrkar hai ya maliko key lijneng officer....sabhi ko patrkar kahna patrkaro ka aapmaan hoga...kai media houses mai kaha jata hai ki hamerey ground duty walo ki salery jyada hone ka dum bharte hai un houses mai kam kar rahe logo sey hi pata kare to pata chalega.jise log pariwar kahte hai aise pariwar mai rehne sey accha anath hona theek hai...fir bhi dil hai hindusthani.... smilies/grin.gif
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written by mahfuz, April 28, 2011

eh khooshi ki baat ha ke media me kaam karne wale logo ko bhi etni tankhah milti hai... lakin es field mai zeyadatar ese log hae jo aaj ke mahgai ka mokabla karne se puri tarah se majboor hae.
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written by Vivek Pandey, April 28, 2011
Media me kaam karne waale big bosses ko jitna mil raha hai sun kar acha laga lekin unhe apne se niche kaam karne walo ke baare me bhi sochna chahiye ki unhe kya milta hai. aap ne to khulasa kar diya ki aapki kitni income hai par wo bechare to sharm ke maare bata bhi nahi sakte hai ki unhe kya milta hai milta bhi hai ya nahi le de ke unke paas ek izzat hi to kripya bechare un media karmiyo ke ko is daayre se chut milni chahiye . wo kya batayega ki har maheene kaise apne pariwar ko chalata hai.
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written by Lucky, April 28, 2011
हैरत इस बात की नहीं होनी चाहिए क मीडियाकर्मियों की तनखाह इतनी है सोचने वाली बात ये है क रिपोर्टर और जर्नलिस्ट की सेलरी क्यूँ नहीं बढ़ती ! महगाई चरम सीमा पे पोहच गयी है आज ईमानदारी से जीवन गुज़ारना सच में एक कठिन काम है ... अगर सही अनुपात में सभी को महगाई की बढ़ती दर के हिसाब से मेहेंताना मिलता रहे ओ इसमें कोई शक नहीं क मीडिया भ्रष्टाचार पे भी काबू पाया जा सकता.

जिन मीडिया वालों की सलेरी को ले के सब चिंतित हैं उन्हें ये भी सोचना चाहिए वो किस लेवल पे और कितना और कैसे काम करते हैं, क्युनके सेनिओर्स सिर्फ सेनिओर नहीं एक्ष्पिरिएन्सेद भी हैं.

जहाँ तक नाक्विजी की बात है क्यूँ के उनका नाम बोल्ड लेत्तेर्स में है तो ये सब जानते है क वो इलेक्ट्रोनिक मीडिया में अपनी म्हणत से आज किस स्थान पे हैं! ऐसा नहीं है म्न्ज्मेंट उन पे एहसान क्र रहा है , ऐसे जितने भी लोग है उनकी बदौलत ही बड़े बड़े मीडिया हाउस करोड़ों नहीं अरबों रुपये कमा रहे हैं अगर उसमे से कुछ पैसा इस लेवल के लोगों को दिया जाये तो बिलकुल जायज़ है!

हाँ साथ ही साथ बाकी काम करने वाले रिपोर्टर्स और पत्रकारों को भी बढ़ती महंगाई के हिसाब से सलारी और भत्ते मिलने चाहिए.
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written by Haresh Kumar, April 28, 2011
अनुरंजन झा को साधुवाद। इनके खुलासे के बाद कम से कम हमें पता तो चला कि मीडिया में संपादकों और वरिष्ठ पदों पर काम करने वाले महानुभावों को कितनी सैलरी मिलती है। और फिर भी ये लोग मीडिया में नए आगंतुकों का खून चूसने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं। कोल्हू के बैल की तरह काम लेते हैं और जब अप्रैजल का वक्त होता है तो तरह-तरह के बहाने बनाते हैं कई संस्थानों में तो मीडियाकर्मियों को सही वक्त पर तो वेतन भी नहीं मिलता है और पीएफ की बात करने पर तो एकांटेंट के लोग ऐसे देखते हैं जैसे सांड़ ने आपको लाल कपड़ों में देख लिया हो। प्रबंधन के लोग हर समय़ रोते रहते हैं और बड़े पदों पर काम करने वाले लोग मौज उड़ाते हैं। यह स्थिति बहुत ही दुखद है। अगर समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो एक दिन विस्पोटक रूप ले लेगा और फिर ये लोग मुंह छिपाने के काबिल भी नहीं रहेंगे। आप बेशक लाखों की सैलरी लो लेकिन जिनके मेहनत की कमाई आप खाते हो उन मीडिया कर्मियों को भी तो समय पर वेतन दो। उन्हें भी बेहतर जीवन जीने का हक है। दूसरों की कमियों को उजागर करने वालों की जिंदगी में भी तो बाहर आए जिसका सपना आंखों में लेकर न जाने कितने लोग इस क्षेत्र में प्रवेश करते हैं।
इस मुद्दे को उठाने के लिए आपका भी साधुवाद और हार्दिक धन्यवाद।
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written by कुंवर प्रताप, April 28, 2011
अनुरंजन को कब तक तेल लगाओगे यशवंत.. अरे कुछ तो शर्म करो.. राजपूतों की खून इस कदर ठंडी हो जाएगी.. यकीन न था.. आलोकजी की कमी अब वाकई खलने लगी है......
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written by Mukesh Kumar Jha , April 28, 2011

कॉरपोरेट जगत की हस्तियों के सामने यह सैलरी तो कुछ भी नहीं है लेकिन संतुलन ज़रूरी है ...ऊपर से नीचे क्रम का ..और यह ख़ुशी की बात है कि मीडिया में हमारे सीनियर अच्छी सैलरी पाते हैं..वर्तमान ठीक है तो भविष्य भी ठीक ही होगा इस मामले में...महंगाई भी तो देखिये , कैसे आसमान पर पहुँच गयी है ...क्या हम पत्रकार बेहतर जीवन जीने का हक नहीं रखते हैं ...
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written by Girish Joshi, April 28, 2011
ab woh samay nhai jab patrakar jhola lekar field me nikla karte the. Aaj ka media Hi-Tech ho gaya hai. aur isme itna soch ne wali baat kya hai. in loga ne media industry me apna best diya hai. aaj apni kadi mehanat ke dum par hi ye log is mukam par pahuche hai. media industry me inhi logo ka sikka chalta hai....bas yaha thoda dhyan naye patrakaro par bhi de dijiye jo bolne ke liye to media me Producer or Editor hai aur salary sirf 6000 se 12000 tak hi le pate hai...
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written by anil pande, April 28, 2011
INKE Kapde AUR Lifestyle Dekh kar To Nahi Lagta.

Kai To LANDURE Jaise Lagte Hain.

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written by shivendra Tomar, April 28, 2011
ये तो खुशी की बात है कि पत्रकार अब फटीचर नहीं रहे, अब उन्हें भी कारपोरेट की तरह सैलरी मिलने लगी है.... लेकिन आपके लेख में खुशी कम और गम ज्यादा है।
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written by shyam singhal, April 28, 2011
Amrendra ji, daan dene ke lie amir hone ki jaroorat naheen hotee. Aap bataaie, aapne aaj tak kitne rupaye daan kie?
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written by Amrendra singh, April 28, 2011
ek patkar ki tankha 10,00,000/- hi to 5,00,000/-har mahine garabo ko dan dena chaye .
Thank
Amrendra singh

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