नकवी जी की सेलरी 10 लाख रुपये महीने है!

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अनुरंजन झा ने अपनी संपत्ति घोषित करते हुए अपनी सेलरी का जो खुलासा किया है, उसके आधार पर लोग टीवी इंडस्ट्री के बिग बॉसों की सेलरी का अंदाजा लगाने लगे हैं और इस तरह ''सेलरी रहस्य'' से पर्दा उठने लगा है. अनुरंजन ने खुद लिखित रूप से बताया कि वे सालाना तीस लाख रुपये के पैकेज पर सीएनईबी गए हैं. महीने का ढाई लाख रुपये हुआ. लेकिन ये सेलरी कुछ नहीं है, अगर आप सुनेंगे कि दूसरे न्यूज चैनलों के संपादकों की सेलरी क्या है.

अनुरंजन झा से संबंधित पोस्ट पर एक कमेंट आया है, जिसमें कुछ बिग बॉसेज की महीने की सेलरी के बारे में बताया गया है. इस कमेंट के अनुसार- ''बाकी लोगों की सेलरी भी जरा सुन लीजिए. जानकारी के अऩुसार अजीत अंजुम छह लाख, शाजी जमां आठ लाख, आशुतोष 6 लाख, विनोद कापड़ी सात लाख, राहुल देव चार लाख, सुधीर चौधरी 5 लाख की सेलरी पाते हैं. चाहो तो चेक करवा लो. और नकवी भी आठ लाख पाते हैं.'' इस कमेंट के दावे की पड़ताल करते हुए जब टीवी न्यूज इंडस्ट्री के कुछ वरिष्ठ लोगों से बात की गई तो सच्चाई इसी आंकड़े के आसपास मिली.

इन लोगों ने नाम न छापने की शर्त पर भड़ास4मीडिया को बताया कि आजतक की संपादकीय टीम के नेता और वरिष्ठ पत्रकार कमर वहीद नकवी की तनख्वाह आठ लाख रुपये महीने नहीं बल्कि दस लाख रुपये महीने है. सीएनबीसी आवाज के एडिटर संजय पुगलिया, जो कभी एसपी सिंह की टीम के खास आदमी हुआ करते थे, भी दस लाख रुपये महीने पाते हैं. उपेंद्र राय जो सहारा मीडिया के सर्वेसर्वा हैं, 11 लाख रुपये के आसपास पाते हैं. दीपक चौरसिया की तनख्वाह स्टार न्यूज में चार लाख रुपये के आसपास है. पुण्य प्रसून बाजपेयी जी न्यूज में कांट्रैक्ट पर हैं और बतौर एडवाइजर काम करते हैं, उन्हें तकरीबन डेढ़ लाख रुपये मिलते हैं, ऐसा सूत्रों ने बताया. यह भी पता चला है कि जब पुण्य सहारा में गए थे तो उनकी सेलरी 11 लाख रुपये महीने के आसपास थी.

एनडीटीवी के रवीश कुमार की तनख्वाह एक लाख रुपये के आसपास है जबकि एनडीटीवी के ही विजय त्रिवेदी तकरीबन चार लाख रुपये पाते हैं. ध्यान रखें कि ये सेलरी एनडीटीवी के संपादकों की नहीं, वहां काम करने वाले वरिष्ठ पत्रकारों की हैं. संपादकों की सेलरी वहां दस लाख रुपये से ज्यादा ही होगी. अजीत अंजुम पांच से छह लाख रुपये महीने पाते हैं, इस पर ज्यादातर लोगों की आम राय है. आशुतोष भी पांच से छह लाख रुपये महीने पाते हैं. वायस आफ इंडिया लांच कराने के लिए संपादक बनकर आए रामकृपाल सिंह ने उस समय आठ लाख रुपये महीने की सेलरी ली थी और ज्वायनिंग के वक्त तीन महीने का एडवांस साइनिंग एमाउंट लिया था. मतलब चौबीस लाख रुपये रामकृपाल सिंह को वीओआई आने के लिए दिए गए थे. उस चैनल के तत्कालीन सीईओ राहुल कुलश्रेष्ठ, जो आजतक से आए थे, उन्हें 12 लाख रुपये महीने तनख्वाह दी जाती थी.

किसी एक को 12 लाख रुपये महीने सेलरी मिलती है और कई सारे साल भर के लिए 12 लाख का पैकेज तलाशते घूम रहे हैं. बाजार में सब चलता है. जो बाजार व कारपोरेट के ज्यादा अनुकूल होता है, उसे ज्यादा सेलरी मिलती है. जो कंपनियों के एजेंडे पर काम कर कंपनियों को ग्रोथ दिलाने में मददगार साबित होते हैं, उन्हें मैनेजमेंट पुरस्कृत करता रहता है, नोटों की बरसात करता रहता है. पर न्यूज चैनलों के मामले में दुर्भाग्यपूर्ण बात ये है कि संपादक लोगों को इतनी तनख्वाह इसलिए नहीं दी जाती कि वे ठीकठाक पत्रकारिता करेंगे, उन्हें पैसे इस बात के मिलते हैं कि कैसे कम से कम स्टाफ व खर्चे में ज्यादा से ज्यादा टीआरपी लाई जाए ताकि ज्यादा से ज्यादा विज्ञापन चैनल को मिल सके.

कैसे ज्यादा से ज्यादा बड़े डील डाल को मैनेज किया जाए, ताकि भरपूर बाहरी और अप्रत्यक्ष निवेश चैनल में हो सके. तो, एक तरह से ये संपादक मार्केट और न्यूज के बीच लचीले दीवार की तरह हैं जो दोनों तरफ के प्रवाह-दबाव को झेलते हुए संतुलन कायम कर अंततः अंदरुनी तौर पर कंपनी का हित साधते हैं और बाहरी तौर पर आम जनमानस के लिए काम करते हुए खुद को दिखाते रहते हैं.

यहां अनुरंजन झा को जरूर बधाई दी जानी चाहिए जिन्होंने मीडिया में शीर्ष पदों पर बैठे व्यक्तियों के पारदर्शी होने को जरूरी मानते हुए अपनी संपत्ति व सेलरी का खुलासा कर दिया. क्या अनुरंजन की ही तरह अन्य मैनेजिंग नुमा एडिटर, डायरेक्टर नुमा एडिटर, चीफ नुमा एडिटर, ओ नुमा सीईओ व सीओओ अपनी अपनी सेलरी व संपत्ति का खुलासा करेंगे? आरटीआई और जन लोकपाल जैसे शब्दों-भावनाओं-माहौल के इस दौर में मीडिया के शीर्ष पर बैठे लोगों को पारदर्शी बन जाना चाहिए वरना वह दूर नहीं जब इन नामधारी संपादकों के घरों के सामने संपत्ति खुलासे के लिए सैकड़ों मीडियाकर्मी धरने पर बैठा करेंगे और तब ये लोग मुंह छिपाने को मजबूर हो जाएंगे.

अगर किसी सज्जन को लगता है कि उनकी सेलरी ज्यादा बढ़ाकर बता दी गई है तो वे अपनी बात नीचे कमेंट बाक्स के जरिए कह सकते हैं या मेल कर सकते हैं. उनकी बात को पूरा सम्मान दिया जाएगा और तदनुसार उनकी यहां उल्लखित सेलरी में संशोधन कर दिया जाएगा. यहां स्पष्ट कर दें कि उपरोक्त आंकड़े वरिष्ठ पत्रकारों से बातचीत पर आधारित हैं और इस बात का पूरा ध्यान रखा गया है कि आंकड़े वास्तविकता के नजदीक हों. फिर भी संभव है कि किसी किसी के मामले में दस बीस फीसदी की कमी-बेसी हो जाए. और हां, मीडिया जगत के लोगों से अनुरोध है कि वे भी अपने-अपने बिग बासेज की सेलरी का नीचे उल्लेख करें ताकि सेलरी व पैकेज की गोपनीय दुनिया से पर्दा हट सके और देशभर के लोग जान सकें कि आजकल के संपादक क्यों कुर्सी से चिपके रहते हैं और किस कारण इन कुर्सियों को पाने के क्रम में अपने रीढ़ की हड्डी को बाहर निकाल फेंकने का काम करते रहते हैं और अंततः मालिक के सामने एक लोटने वाले जीव में तब्दील हो जाते हैं और जनता के सामने खुद को ईश्वर के रूप में पेश करने में लग जाते हैं. इस मसले पर आपको क्या लगता है, अपनी राय, विचार, आलेख जरूर भेजें, This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it पर या नीचें कमेंट बाक्स में लिख दें. -एडिटर, भड़ास4मीडिया


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