महुआ के स्ट्रिंगर्स की दास्तान- कोई नहीं सुनने वाला

E-mail Print PDF

खबर है कि महुआ न्यूज़ के स्ट्रिंगरों को हर महीने कम से काम पच्चीस हजार रुपये का विज्ञापन संस्थान के लिए करना होगा और इसके एवज में स्ट्रिंगरों को विज्ञापन का पांच प्रतिशत कमीशन मिलेगा. यह जानकारी समस्त स्ट्रिंगरों को दूरभाष के जरिए चैनल मुख्यालय की तरफ से दे दी गई है. कुछ स्ट्रिंगरों ने नाम न छापने की शर्त पर महुआ प्रबंधन से सवाल किया है कि अगर स्ट्रिंगर स्वच्छ पत्रकारिता करने वाले पत्रकार हैं तो वे विज्ञापन का काम क्यों करें.

वह भी तब जबकि महुआ के पास विज्ञापन वाले लोग पहले से ही हैं. अगर स्ट्रिंगरों को विज्ञापन करके ही पेट पालना है तो फिर महुआ ही क्यों. यह काम दूसरे बड़े न्यूज चैनलों के लिए क्यों नहीं करें महुआ के स्ट्रिंगर. कई चैनल और लगभग सभी अखबार पन्द्रह प्रतिशत कमीशन देते हैं. कुछ स्ट्रिंगरों ने बताया कि महुआ प्रबंधन तक यह संदेश पहुंचाया जाना चाहिए कि आज जो महुआ न्यूज़ नंबर एक है वो विज्ञापन से नहीं बल्कि हम स्ट्रिंगरों की पत्रकारिता से. एक तो चैनल के पेमेंट में पारदर्शिता बिलकुल ही नहीं है. स्ट्रिंगर खबर तीस से पैंतीस भेजते हैं और पांच-छह महीने बाद चेक आता है, वह भी सिर्फ तीन हजार रुपल्ली का.

आप कौन सी स्टोरी ड्रॉप करते हो, कौन सी चलाते हो, किस दर से बिल बनाते हो, यह महुआ के स्ट्रिंगरों की समझ से परे है. महुआ के शुरुआती दौर से जुड़े एक स्ट्रिंगर ने बताया कि शुरू में एक खबर का पांच सौ मिलता था, बाद में साढे तीन सौ हुआ. अब पता नहीं पचास या सौ है. करीब एक साल से स्ट्रिंगरों की कोई मीटिंग नहीं बुलाई गयी जिससे स्ट्रिंगर अपनी परेशानी कह नहीं पाते. चैनल हेड टाइप जो बड़े लोग आते हैं वे चुपके से पटना वालों से मिलकर चले जाते हैं और रोज एक नया फरमान स्ट्रिंगरों को सुनाते हैं. ऐसे में जरूरी है कि चैनल की रीढ़ स्ट्रिंगर्स को एक जगह बुलाकर उनके साथ सीधी बात प्रबंधन और संपादकीय के लोगों को करना चाहिए और पूरे सिस्टम में पारदर्शिता रखने की कोशिश करनी चाहिए जिससे किसी स्ट्रिंगर के मुंह से आह महुआ के लिए न निकले.


AddThis