बंद हो गई 'रवीश की रिपोर्ट'!

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बृजेश सिंहअब नहीं होगा, नमस्कार मैं रवीश कुमार... पता चला है कि एनडीटीवी ने 'रवीश की रिपोर्ट' को बंद करने का फैसला किया है. एनडीटीवी ने मीडिया में वैसी ही छवि बनाई है जैसी टाटा ने व्यापार में. दोनों ने बहुत ही चालाकी से एक खास तरह की प्रो पीपुल छवि गढ़ी. टाटा का मामला लीजिए. वो भी रिलायंस जैसा ही एक कारपोरेट संस्थान है.

लेकिन आप खुद महसूस करेंगे कि दोनों के प्रति आपके मनोभाव में अंतर होगा. टाटा और एनडीटीवी, दोनों ने अपनी एक खास तरह की छवि बनाने पर काफी मेहनत और पैसा खर्च किया है. याद कीजिए टाटा नमक के उस विज्ञापन को जिसमें अंत में कहा जाता है कि मैंने देश का नमक खाया है.

रवीश भाई की रिपोर्ट बंद होने से मैं चिंतित हूं, चकित नहीं. याद कीजिए साल भर पहले एनडीटीवी ने लगभग हर अंग्रेजी अखबार और चैनल पर एक विज्ञापन दिया था. उस विज्ञापन में कहा गया था कि "WHY SHOUT AND SCREAM WHEN NDTV HAS 60% VIEWVERSHIP." इस पूरे विज्ञापन में एनडीटीवी के जिन पत्रकारों की फोटो थी उसमें एनडीटीवी हिंदी से कोई नहीं था. कोई भी बड़ा कार्यक्रम उठा कर देख लीजिए, एनडीटीवी हिंदी के पत्रकार हमेशा बाहर ही रहे, या फिर हाशिए पर.

एनडीटीवी हिंदी के पत्रकारों की स्थिति एनडीटीवी समूह में वैसी ही है जो समाज में दलितों की है. बरखा दत्त की सामाजिक समझ विनोद दुआ और रवीश कुमार के मुकाबले कहां ठहरती है, यह मुझे बताने कि आवश्यक्ता नहीं है. हिंदी वहां भी दलित है.

बृजेश सिंह
तहलका
मध्य प्रदेश संवाददाता


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