शलभ प्रकरण : जो सिस्टम से लड़ेगा, दलाल उसे दलाल कहेगा

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: यूपी सरकार के अफसरों के इशारे पर लखनऊ के चंद दलाल पत्रकारों ने आईबीएन7 के जर्नलिस्ट शलभ व मनोज के खिलाफ शुरू किया दुष्प्रचार अभियान : पत्रकारिता का यह दुर्भाग्य है कि यहां जितने ईमानदार हैं, उनसे सौ गुना ज्यादा दलाल हैं. दिल्ली, लखनऊ समेत जितनी भी राजधानियां हैं, वहां खासतौर पर नेता-अफसरों की तरफ से सरकारी दलाल के रूप में कथित पत्रकार पाले जाते हैं.

इन दलाल पत्रकारों का काम विज्ञापन और दलाली की मलाई खाना होता है और सरोकार या सिस्टम से जंग वाले मुद्दे पर दलाली शुरू करना होता है ताकि लड़ने वाले पत्रकारों को बदनाम कर उन्हें अलग थलग किया जा सके और अपने आकाओं को लाभ पहुंचाया जा सके. लखनऊ के लगभग दर्जन भर मान्यताप्राप्त बसपाई दलाल पत्रकारों ने यह काम शुरू कर दिया है. इन लोगों ने पुलिसिया उत्पीड़न के शिकार आईबीएन7 के पत्रकार शलभ मणि त्रिपाठी और मनोज राजन के खिलाफ गुमनाम मेल भेजो अभियान शुरू कर दिया है. इस मेल के जरिए शलभ और मनोज राजन पर तरह तरह के आरोप लगाए गए हैं. मेल की भाषा और कही गई बात से यह जाहिर है कि इन पत्रकार महोदय को शलभ और मनोज को बदनाम करने के लिए बसपा सरकार की तरफ से ठेका मिल चुका हैं. इस मेल में शलभ और मनोज द्वारा खरीदे गए मकान का जिक्र किया गया है तो किसी बड़ी राशि को लेकर इनके नौकर द्वारा भागने की बात बताई गई है.

पर दुर्भाग्य यह कि मेल भेजने वाले ने अपने नाम और पहचान का खुलासा नहीं किया है. दलालों ने अपने प्रभाव के जरिए इन मेलों को यहां वहां छपवाने का प्रयास शुरू कर दिया है ताकि लखनऊ में राज्य सरकार के बेहूद अफसरों के खिलाफ चल रहे पत्रकारों के आंदोलन में फूट डालकर सरकार को निर्णायक बनने का मौका दिया जा सके. मेल भेजने वाले और शलभ के खिलाफ दुष्प्रचार अभियान चलाने वालों से कुछ सवाल है, अगर वे इन सवालों के जवाब दे दें तो उनकी कही गई बातों पर सोचा-विचारा जा सकता है....

  • 1. आखिर क्या वजह है कि आईबीएन7 को यूपी सरकार ने राज्य में दिखाए जाने पर अघोषित पाबंदी लगा दी है?

  • 2. आखिरी आईबीएन7 ही लगभग हर महीने एक दो बार क्यों यूपी में सरकार द्वारा अघोषित रूप से आफ एयर करा दिया जाता है?

  • 3. क्या कोई दूसरा बड़ा चैनल भी है जो राज्य सरकार के कोप का शिकार हो?

  • 4. अगर नहीं तो ये क्यों नहीं मान लिया जाए कि दूसरे सारे बड़े चैनल के मालिक यूपी के मामले में दलाली कर रहे हैं? जिस तरह टाइम्स आफ इंडिया ने मायावती को क्लीनचिट देकर अपनी खुली दलाली का मुजाहिरा कर दिया है.

  • 5. डा. सचान हत्याकांड में शलभमणि त्रिपाठी ने लगातार आक्रामक व खुलासे वाली रिपोर्टिंग की या नहीं?

  • 6. क्या यूपी सरकार ने शलभ को पहले से ही टारगेट नहीं कर रखा है?

  • 7. क्या शलभ को परेशान करने के लिए राज्य सरकार ने समय समय पर उनका उत्पीड़न नहीं किया है?

  • 8. लखनऊ में किस पत्रकार पर बेहतरीन व धारधार रिपोर्टिंग को लेकर पिछले चार वर्षों में तीन सरकारी एफआईआर दर्ज हुई है?
  • 9. अगर सरकार से शलभ की इतनी ही वारी न्यारी है तो शलभ व उनकी टीम बसपा सरकार के खिलाफ खबर लगातार क्यों करते रहते हैं?

  • 10. क्या यह सच नहीं है कि यूपी में करीब दर्जन भर से ज्यादा बड़े पत्रकार इन दिनों सिर्फ बसपा नेताओं और बसपाई अधिकारियों की जी-हुजूरी कर पैसे कमाते हैं और उनके इशारे पर पत्रकार राजनीति को ट्विस्ट देने की कोशिश करते हैं? और इसके प्रमाण यदा-कदा दिखते-मिलते रहते हैं?

यूपी समेत देश भर के पत्रकारों से अपील है कि जब भी कभी सत्ता और सिस्टम के खिलाफ पत्रकारों का या किसी भी संगठन का बड़ा आंदोलन खड़ा होता है तो उस आंदोलन के नायकों को तरह तरह से बदनाम किया जाता है. यकीन न हो तो हाल फिलहाल के अन्ना और रामदेव के आंदोलनों को देख लीजिए. अन्ना का आंदोलन ज्यों खड़ा हुआ त्यों उनके सिपहसालारों भूषण पिता पुत्रों को टारगेट कर लिया गया और फिर एक एक कर कई लोग विवादों में घसीटे जाने लगे. रामदेव का आंदोलन खड़ा हुआ तो सरकार अब रामदेव व बालकृष्ण दोनों के पीछे हाथ धोकर पड़ चुकी है. दरअसल हम लोगों की स्मृति इतनी कमजोर है कि हम आंदोलनों के गुणा-गणित को अगले ही आंदोलन में भूल जाते हैं.

शलभ को कटघरे में खड़े करने वाले दलालों को यह चेतावनी मात्र है कि उनकी मेल आईडी की तफ्तीश शुरू हो गई है और उनके नाम का पता चलते ही उनकी पूरी कुंडली का वर्णन यहां वहां जहां तहां भांति भांति तरीके से किया जाएगा. फिलहाल सभी ईमानदार, संवेदनशील और प्रखर पत्रकारों से अपील है कि वे यूपी में आईबीएन7 की टीम पर अत्याचार करने वाले अफसरों को सबक सिखाने के लिए कमर कसे रहें और इस मुद्दे को जनता के बीच भी ले जाएं ताकि जनता को समझाया जा सके कि यूपी की सरकार अपने घपले-घोटाले-हत्याओं पर से पर्दा उठाने वालों को किस तरह परेशान करती है.

यहां मैं खुद के बारे में साफ कर दूं कि मैं दुनिया का एक नंबर का कमीना, दलाल और चिरकुट हूं, या रहा हूं, या हो सकता हूं... पर मैं हर उस आंदोलन का साथी हूं जो सिस्टम के खिलाफ है, बड़े सवाल व सरोकार से संबंधित है और नरक समान हो चुके हालात पर सवाल खड़ा करने वाला है. शलभ से मेरा याराना नहीं है. शलभ कभी मेरे साथी हुआ करते थे, अमर उजाला वाराणसी में. और तब, इस रिपोर्टर की बेहतरीन खबरों की कापियों को एडिट करते हुए मैं इसके उज्जवल भविष्य के बारे में सोचा करता था. और, शलभ ने उसे सच साबित कर दिखाया. शलभ के अंदर जो साहस, जो धार, जो जज्बा रहा है, वह कायम है, और अगर उसे वे बचाए रखें तो वह दिन दूर नहीं जब यह शख्स पत्रकारिता में मील का पत्थर साबित होगा.

उस दौर में जब ज्यादातर पत्रकार अपने छोटे छोटे स्वार्थों के कारण सिस्टम से लड़ने से मुंह मोड़ चुके हों, स्पष्ट बोलने से इनकार कर चुके हों, आर-पार वाले मुद्दों पर चुप्पी साधे हों, खुलकर सामने आने में गुणा-भाग लगाते हों, शलभ का लगातार बड़ी खबरें ब्रेक करते जाना, सिस्टम से टकराते जाना बताता है कि वे औरों से अलग हैं. मैं शलभ या शलभ जैसे उन सभी पत्रकारों के साथ हूं जो लड़ते हैं, डरते नहीं हैं, जो खुलकर सामने रहते हैं, छुपकर वार नहीं करते. भड़ास4मीडिया ने समय समय पर लड़ाकू पत्रकारों का पक्ष लेकर यह दिखाया भी है कि यह पोर्टल सिर्फ और सिर्फ धारधार लोगों के साथ खड़ा होता है, वह चाहे जरनैल सिंह हों या शलभ मणि त्रिपाठी.

अभी कुछ दिनों पहले ही रांची में एक छात्र नेता ने जब कपिल सिब्बल की प्रेस कांफ्रेंस में उनसे थोड़ा तीखा सवाल कर दिया तो कांग्रेसियों ने उसे पीटना शुरू कर दिया. दिल्ली में कांग्रेसी नेता के प्रेस कांफ्रेंस में जूता दिखाने वाले शिक्षक की पिटाई की घटना सबको पता ही है. तो मतलब यही है कि अगर आप सिस्टम से लड़ेंगे, सवाल पूछेंगे तो या तो आप पीट दिए जाएंगे या अगर आपको पीटने की औकात किसी में नहीं है तो आपको बदनाम करना शुरू कर दिया जाएगा.

यशवंत
एडिटर
भड़ास4मीडिया


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