नवभारत टाइम्स ने किया पी7 न्यूज वाली कंपनी पीएसीएल का भंडाफोड़

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आज के नवभारत टाइम्स के बिजनेस पेज पर प्रकाशित लीड स्टोरी 'एक कंपनी और 50 लाख लोगों की जमीनी हकीकत ', दरअसल 'पी7 न्यूज' चैनल की मदर कंसर्न पीएसीएल की करतूतों का भंडाफोड़ है। ये कंपनी हिन्दी समाचार पत्रिका 'शुक्रवार' और महिलाओं पर आधारित पत्रिका 'बिंदिया' भी निकालती है। वरिष्ठ पत्रकार श्रतुजीत केके की इस स्टोरी के मुताबित पश्चिम दिल्ली सहित देश भर में फैले 280 आफिसों से पीएसीएल जो कारोबार करता है, सेबी उसे अवैध मानती है।

सेबी का मानना है कि जिस 'कलेक्टिव इनवेस्टमेंट स्कीम' को रियल एस्टेट कंपनी के तौर पर चलाया जा रहा है, वो गलत है। पूरा मामला आठ साल से सुप्रीम कोर्ट में है और सेबी को उम्मीद है कि फैसले के बाद पीएसीएल के चिट फंड कारोबार का खुलासा हो जाएगा। अगर सुप्रीम कोर्ट सेबी के पक्ष में फैसला देता है तो पीएसीएल के लाखों निवेशकों को कंपनी में जमा कराई गई अपनी पूंजी के हाथ धोना पड़ सकता है। पी7 न्यूज की इस मदर कंसर्न के खिलाफ कई बार इनकम टैक्स के छापे डाले जा चुके हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक पी-7 न्यूज की मदर कंसर्न पीएसीएल देश भर में फैले आठ लाख एजेंटों के जरिए छोटे छोटे इनवेस्टरों को प्लाट की रजिस्ट्री दिखाकर धन को पांच साल में दुगुना या करीब 12.5 फीसदी रिटर्न का लालच देती है। लोग एजेंटों के बिछाए जाल में फंसकर ऐसे प्लॉटों में इनवेस्ट करते हैं, जिसे उन्होंने कभी देखा नहीं है और जिसका कोई दस्तावेज उनको नहीं दिया जाता। कंपनी के लिए मुंबई, दिल्ली, या मध्य प्रदेश के दूरदराज इलाकों की जमीन की कीमत एक ही है। भोले भाले निवेशकों की रुचि अपने धन को दुगुना या तिगुना करने में होती है, इसलिए वो जमीन के फर्जीवाड़े पर ध्यान नहीं देते। सेबी ने इसी को लेकर कंपनी पर शिकंजा कस दिया है। पंजाब के निर्मल सिंह भंगू की कंपनी पीएसीएल ने बतौर गुरवंत एग्रोटेक लिमिटेड के नामसे 1996 में कारोबार शुरू किया था और बाद में पर्ल्स एग्रोटेक कॉरपोरेशन कर दिया गया।

पर्ल्स ब्राडकास्टिंग कॉरपोरेशन के नाम से कंपनी ने 2009 में टेलीविजन चैनल लांच किया। इसके लिए सबसे पहले पटियाला में काम करने वाले एक लोकल चैनल को खरीदा गया, जिसका नाम पीबीसी यानी पटियाला ब्रडकास्टिंग कॉरपोरेशन था। नाम में समानता के कारण उस चैनल का लाइसेंस लिया गया और फिर उसे नोएडा शिफ्ट करके पी-7 न्यूज के नाम से हिन्दी चैनल लांच किया गया, जो शुरू से मैनेजमेन्ट में उठापटक को लेकर विवादों में रहा। चैनल खोलने के पीछे कंपनी की मंशा सेबी और इनकम टैक्स के दबाव को कम करने के साथ ही राजनीतिकों से रिश्ते बनाने की चाहत थी। इसीलिए पी-7 न्यूज चैनल में वरिष्ठ पदों पर काम करने वाले कई लोग राजनीतिज्ञों की सिफारिश पर सीधे भर्ती कर लिए गए। इनपुट में काम करने वाले एक शख्स को मध्य प्रदेश सरकार के एक मंत्री की सिफारिश पर नौकरी पर रखा गया।

ये शख्स मध्य प्रदेश से जुड़े एक रीजनल चैनल में महत्वपूर्ण पद पर था और वहां से निकाले जाने के बाद तब के बनाए संबंधों का लाभ लेकर पी-7 न्यूज में आ गया। पीएसीएल का मध्य प्रदेश में बड़ा बिजनेस है और इसलिए वो बड़े मंत्रियों की सिफारिशों को खारिज नहीं कर पाती। इसी तरह हाल ही में सहारा समय से निकाई गई एक रिपोर्टर बीजेपी में अपने संबंधों का लाभ लेकर महत्वपूर्ण पद पर आ गई। सीबीआई में अपने रिश्तेदार की सिफारिश पर सहारा समय एनसीआर से निकाला गया एक रिपोर्टर बड़े पैकेज पर आ गया। ऐसे लोग कोई भी काम न करें, लेकिन डायरेक्टर केसर सिंह के चहेते बने हुए हैं। पी-7 से जुड़े लोगों का मानना है कि किसी भी महत्वपूर्ण नेता की सिफारिश लगाकर पी-7 में अच्छे पद और पैकेज पर नौकरी पाना बेहद आसान है। चूंकि कंपनी को अपना कारोबार बचाने के लिए चैनल की आड़ चाहिए, इसलिए कंपनी लगातार घाटा सहने के बावजूद चैनल बंद करने की पोजीशन में नहीं है और केवल तगड़ी सिफारिश के कारण ही नौकरी भी सुरक्षित रहती है।


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