लन्दन में प्रणव रॉय

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प्रणब रॉयप्रणव रॉय को आज कौन नहीं जानता, एनडीटीवी के मालिक, अंग्रेजी के अत्यंत कुशल समाचार वाचक, चुनावी सर्वेक्षण के जनक और इस देश के सर्वाधिक चर्चित पत्रकारों में से एक प्रणव रॉय एक ऐसी हस्ती हैं जिनके बारे में संभवतः पूरा हिंदुस्तान जानता है. आम तौर पर उनके जैसा बड़ा व्यक्तित्व सड़क चलते नहीं टकराया करता.

जब मैंने लन्दन के हीथ्रो हवाई अड्डे पर सफ़ेद दाढ़ी वाले एक खूबसूरत अधेड़ व्यक्ति को देखा तो मुझे यह तो महसूस हुआ कि यह चेहरा कुछ जाना पहचाना सा लग रहा है पर मैं इससे आगे कुछ समझ नहीं सका. पर इसके तुरंत बाद मैं उस समय आश्चर्य में पड़ गया जब वहाँ उपस्थित कुछ लोगों के मुंह से प्रणव रॉय शब्द सुना. पहले किसी एक ने यह नाम लिया और फिर तो जैसे तांता सा लग गया. लगभग हर दूसरा व्यक्ति यही नाम ले रहा था और कुछ कौतूहल भरे आतुर आवाज में बोल रहा था.

अब मैंने एक बार फिर उस शख्स को देखा जिसे छोटे परदे पर तो तब से देख रहा था,  जब मैं आआईटी कानपुर में था और अस्सी के दशक के आखिरी दिनों में प्रणव रॉय और विनोद दुआ नामक दो युवा हमारे देश की पत्रकारिता और राजनीति को पूरी तरह से बदलते हुए चुनावी सर्वेक्षण और चुनावी नतीजों पर अपने विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे थे. उस समय तक यह क्षेत्र अपने देश में लगभग अनजाना सा था और इसीलिए जब इन युवा तुर्कों द्वारा इस तरह की बातें और ऐसे तथ्य प्रस्तुत किये जा रहे थे तो पूरा देश हैरान और मंत्रमुग्ध हो कर उन्हें देख रहा था.

यही हैरानी मुझे उस दिन भी हुई जब लंदन में हवाई जहाज से निकल कर इमिग्रेशन काउंटर पर अपने नंबर की प्रतीक्षा करते समय मैंने प्रणव रॉय को देखा. वैसे सच पूछा जाए तो इसमें हैरानी जैसी कोई बात नहीं होनी चाहिए थी, क्योंकि बड़े लोग अक्सर लन्दन आते ही रहते हैं, यदि किसी आदमी को लन्दन आना है तो वह हवाई हजाह से ही आएगा और यदि हवाई जहाज़ से आया है,  तो उसे इमिग्रेशन चेक के लिए खड़ा होना ही होगा. पर इसके बाद भी यदि कोई इस हैसियत का आदमी अचानक से आम लोगों की लाइन में खड़ा दिख जाता है तो अकस्मात हैरानी सी होती ही है.

मैंने इस बार फिर प्रणव रॉय को देखा और अबकी अधिक ध्यान से. वे इस बहुत लंबी लाइन में हमसे काफी आगे खड़े थे पर चूँकि लाइन आगे-पीछे घूमती थी इसीलिए दूरी अधिक नहीं थी. कुछ बातें जो बहुत साफ़ दिखती थीं वह यह कि प्रणव साहब के चेहरे और व्यक्तित्व पर एक अलग किस्म की भव्यता और खूबसूरती थी जो उस भीड़-भाड़ में भी उन्हें अपना एक अलग आयाम प्रदान कर रही थीं. दूसरी जो सबसे बड़ी बात दिख रहती थी वह थी उनकी सहजता. जैसे-जैसे लोगों, खास कर अंग्रेजी बोलने वाले और हवाई जहाज़ों में सफर करने वाले भारतीय लोगों, को एहसास हो रहा था कि प्रणव रॉय उनके बीच हैं,  वैसे ही वे उपस्थित सभी लोगों की निगाहों में आ गए थे. फिर उन में से कई कम उम्र के लड़के-लड़कियां तनिक रोमांच में जोर-जोर से उनका नाम ले कर उनकी तरफ देख भी रहे थे और उनकी तथा एनडीटीवी की चर्चा भी कर रहे थे. प्रणव रॉय भी बड़े आराम से इन सभी को देखते हुए आराम से मुस्कुरा रहे थे.

करीब पांच-सात मिनट बाद उनका नंबर आ गया और वे वहाँ से चले गए पर इनका चेहरा, उनकी भावप्रणव आँखें, उनकी खिली हुई मुस्कान और उनकी सहजता वहाँ उपस्थित सभी लोगों पर देर तक असर डालती रहीं. मैं यह बात दावे से इसीलिए कह सकता हूँ कि वहाँ हम कई आईपीएस अधिकारी भी मौजूद थे जो अपने मिड कैरियर ट्रेनिंग प्रोग्राम के लिए लन्दन आये थे और आपस में हम सभी इन बातों पर सहमत दिख रहे थे.

एक दूसरी बात मैं यह भी कहना चाहूँगा कि लन्दन के हवाई अड्डे पर प्रणव रॉय की लोकप्रियता उनके व्यक्ग्तिगत सम्मान के साथ पूरे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की असीम लोकप्रियता और स्वीकार्यता का भी परिचायक है. जब उन्होंने डीडी पर अपना प्रोग्राम 'द वर्ल्ड डिस वीक'  शुरू किया था उस समय के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और आज के इलेक्ट्रानिक मीडिया में सचमुच जमीन और आसमान का अंतर है. आज यह एक-एक घर में घुस कर हमारे-आपके जेहन और हमारी जिंदगी का हिस्सा बन गया है. शायद यही कारण है कि आज के समय कोई भी फीचर फिल्म किसी खास न्यूज़ चैनल के साथ सहभागिता किये बिना नहीं बनती.

कई बार तो इससे आगे बढ़ कर टीवी न्यूज़ रिपोर्टिंग के माध्यम से फिल्मों को आगे बढ़ाया जाता है और बहुत बार अतिशय चर्चित वास्तविक जीवन के टीवी न्यूज़ रिपोर्टरों को फिल्मों में भूमिका दी जाती है. मेरी दृष्टि में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की सफलता की यह सबसे बड़ी निशानी है,  क्योंकि फिल्म वालों से बढ़ कर जमाने की बदलती दृष्टि पर नज़र रखने वाले लोग कोई नहीं अमिताभ होते. उन्हें तो वही दिखाना होता है जो वक्त की आवाज़ हो और आज इलेक्ट्रॉनिक मीडिया वक्त की आवाज़ बन चुकी है तथा उसके साथ प्रणव रॉय जैसे उसके पुरोधा आज के वक्त की चुनिन्दा तस्वीरें.

लेखक अमिताभ यूपी कैडर के आईपीएस अधिकारी हैं और मेरठ में आर्थिक अपराध अनुसंधान शाखा में बतौर पुलिस अधीक्षक पदस्थ हैं. इन दिनों पुलिस प्रशिक्षण के लिए इंग्‍लैंड में हैं.


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