नेता खुश हुआ क्योंकि उसकी खींची लकीर पर मीडिया चल पड़ा

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पुण्य प्रसून वाजपेयीमीडिया न हो, तो अन्ना का आंदोलन क्या फ़ुस्स हो जायेगा. मीडिया न होता, तो क्या रामदेव की रामलीला पर सरकारी कहर सामने आ नही पाता. और, सरकार जो खेल महंगाई, भ्रष्टाचार या कालेधन को लेकर खेल रही है, वह खेल बिना मीडिया के सामने आ नहीं पाता. पर जो कुछ इस दौर में न्यूज चैनलों ने दिखाया और जिस तरह सरकार ने एक मोड़ पर आकर यह कह दिया कि अन्ना की टीम संसद के समानांतर सत्ता बनाना चाहती है...

तो सवाल निकला कि अब आगे का रास्ता है क्या? और जो सरकार कहे और जो अन्ना की टीम कहे, इससे इतर न्यूज चैनल दिखायें क्या? यह सवाल अगर 14 बरस पहले कोई एसपी सिंह से पूछता, तो जवाब यही आता कि इसमें खबर कहां है? 1995 में आज तक शुरू करनेवाले एसपी सिंह ने माना, जो कैमरा पकड़े, वह तकनीक है. जो नेता कहे, वह सूचना है. और, इन दोनों के पीछे की जो कहानी पत्रकार कहे, वह खबर है. तो क्या इस दौर में खबर गायब है और सिर्फ़ सूचना या तकनीक ही रेंग रही है. अगर ईमानदारी की जमीन बनाने में भिड़े आंदोलनों के दौर को परखें, तो एसपी के मिजाज में अब के न्यूज चैनल क्या- क्या कर सकते हैं, यह तसवीर धुंघली ही सही, उभर तो सकती है.

इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि अन्ना के आंदोलन की जमीन आम-आदमी के आक्रोश से बनी और फ़ैल रही है, जिसमें संसद, सरकार की नाकामी है. इसमें मंत्रियों के कामकाज के सरोकार आम-आदमी से न जुड़ कर कारपोरेट और निजी कंपनियों से जुड़ रहे हैं. तो फ़िर मीडिया क्या करे? संसद में जनता के उठते मुद्दों को लेकर राजनीतिक दलों का टकराव चरम पर पहंचता है, तो न्यूज चैनलों को टीआरपी दिखायी देती है. टकराव खत्म होता है, तो किसी दूसरे टकराव की खोज में मीडिया निकल पड़ता है या फ़िर राजनेता भी मीडिया की टीआरपी की सोच के अनुसार टकराव भरे वक्तव्य देकर खुद की अहमियत बनाये रखने का स्क्रीनिंग बोल बोलते हैं, तो मीडिया उसे जश्न के साथ दिखाता है. नेता खुश होता है, क्योंकि उसकी खींची लकीर पर मीडिया चल पड़ता है और उन्माद के दो पल राजनीति को जगाये रखते हैं. हर पार्टी का नेता हर सुबह उठ कर अखबार यही सोच कर टटोलता है कि शाम होते-होते कितने न्यूज चैनलों के माइक उसके मुंह में ठुंसे होंगे और रात के प्राइम टाइम में किस पार्टी के कौन से नेता या प्रवक्ता की बात गूंजेगी.

कह सकते है मीडिया यहीं आकर ठहर गया है और राजनीतिज्ञ इसी ठहरे हए स्क्रीन में एक-एक कंकड़ फ़ेंक कर अपनी हलचल का मजा लेने से नहीं कतराते है. अगर अन्ना के आंदोलन से ठीक पहले महंगाई और भ्रष्टाचार के सवालों को लेकर संसद, नेता और मीडिया की पहल देखें, तो अब उस दौर की हर आवाज जश्न में डूबी हई सी लगती है. पहले महंगाई के दर्द ने ही टीस दी. संसद में पांच दिन तक महंगाई का रोना रोया गया. कृषि मंत्री शरद पवार निशाने पर आये. कांग्रेस ने राजनीति साधी. लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने तो पवार के हंसने को आम-आदमी के दर्द पर मिर्च डालना तक कहा. और, मीडिया ने इसे नीतियों का फ़ेल होना बताया. चिल्ला- चिल्ला कर महंगाई पर लोगों के दर्द को शब्दों में घोल कर न्यूज चैनलों ने पिलाया, लेकिन हआ क्या. वित्त मंत्री तो छोड़िए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने महंगाई थमने का टारगेट पांच बार तय किया.

सितंबर 2010, फ़िर नवंबर 2010, फ़िर दिसंबर 2010, फ़िर फ़रवरी 2011, फ़िर मार्च 2011. प्रधानमंत्री ने जो कहा, हेडलाइन बना. तीन बार तो टारगेट संसद में तय किया. तो क्या मीडिया ने यह सवाल उठाया कि संसद की जिम्मेदारी क्या होनी चाहिए? यानी मनमोहन सिंह ने देश को बतौर पीएम धोखा दिया, यह कहने की हिम्मत तो दूर मीडिया मार्च के बाद यह भी नहीं कह पाया कि प्रधानमंत्री ने कीमतें बढ़ा कर किन-किन कारपोरेट सेक्टर की हथेली पर मुनाफ़ा समेटा. गैस के मामले पर कैग की रिपोर्ट ने रिलांयस को घेरा और पीएमओ ने मुकेश अंबानी पर अंगुली उठाने की बजाय तुरंत मिलने का वक्त दे दिया. क्या मीडिया ने यह सवाल उठाया कि जिस पर आरोप लगे हैं, उससे पीएम की मुलाकात का मतलब क्या है? जबकि एक वक्त राजीव गांधी ने पीएमओ का दरवाजा धीरूभाई अंबानी के लिए इसलिए बंद कर दिया था कि सरकार पाक-साफ़ दिखायी दे. तब मीडिया ने कारपोरेट की लड़ाई और सरकार के भीतर बैठे मंत्रियों के कच्चे-चिट्ठे भी जम कर छापे थे, लेकिन अब मीडिया यह हिम्मत क्यों नहीं दिखा पाता है.

याद कीजिए संसद में भ्रष्टाचार के खिलाफ़ पहली आवाज आइपीएल को लेकर ही उठी. क्या- क्या संसद में नहीं कहा गया. लेकिन हआ क्या ? आइपीएल को कॉमनवेल्थ घोटाला यानी सीडब्ल्यूजी निगल गया. सीडब्ल्यूजी को आदर्श घोटाला निगल गया. आदर्श को येदियुरप्पा के घोटाले निगल गये. और, इन घोटालों ने महंगाई की टीस को ही दबा दिया. लेकिन हर घोटाले के साथ मीडिया सोये हए शेर की तरह जागा. उसने अखबारों के पन्नो से लेकर न्यूज स्क्रीन तक रंग दिये. लेकिन लोकतंत्र का प्रहरी है कौन? यह सवाल हर उठती-बैठती खबर के साथ उसी जनता के दिमाग में कौंधा, जिसने नेताओं को संसद पहंचाया और जिसने मीडिया को टीआरपी दे रखी है.

देश के इतिहास में पहली बार कोई चीफ़ जस्टिस घोटाले के घेरे में भी आया और सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार किसी घोटाले में कैबिनेट मंत्री, सांसद, नौकरशाह, कारपोरेट कंपनी के कर्ता-धर्ताओं को जेल भी भेजा. लेकिन इस पूरे दौर में यह सवाल कभी नहीं खड़ा हआ कि संसद चूक रही है. प्रधानमंत्री का पद गरिमा खो रहा है. लोकतंत्र के तीनों पाये चेक-एंड-बैलेंस खोकर एक-दूसरे को संभालने में लगे है. और, ऐसे में चौथा पाया क्या करे. असल में अन्ना हजारे के आंदोलन को कवर करते मीडिया के सामने यही चुनौती है कि वह कैसे लोकतंत्र के इन पायों पर निगरानी भी करे और आंदोलन की जमीन को भी उभारे, जहां ऐसे सवाल दबे हए हैं, जिनका जवाब सरकार या राजनेता यह सोच कर देना नहीं चाहेंगे कि संसद मूल्यहीन न ठहरा दी जाये और सिविल सोसाइटी यह सोच कर टकराव नहीं लेगी कि कहीं उसे राजनीतिक न ठहरा दिया जाये.

न्यूज चैनलों की पत्रकारिता के इस मोड़ पर 14 बरस पहले के एसपी सिंह के प्रयोग सीख दे सकते हैं. जो चल रहा है वह सूचना है, लेकिन वह खबर नहीं है. अब के न्यूज चैनल को देख कर कोई भी कह सकता है कि जो चल रहा है, वही खबर है. दिग्विजय सिंह का तोता रटंत हो या फ़िर सरकार का संसद की दुहाई देने का मंत्र. विपक्ष के तौर पर भाजपा की सियासी चाल. जो अयोध्या मुद्दे पर फ़ैसला सड़क पर चाहती है, लेकिन लोकपाल के घेरे में प्रधानमंत्री आये या नहीं, इस पर संसद के सत्र का इंतजार करना चाहती है. महंगाई और भ्रष्टाचार पर ममता के तेवर भी मनमोहन के दरवाजे पर अब नतमस्तक हो जाते है. और अन्ना की टीम इस दौर में सिर्फ़ एक गुहार लगाती है कि संसद अपना काम करने लगे. सभी मंत्री ईमानदार हो जायें. न्यायपालिका भ्रष्ट रास्ते पर ना जाये. नौकरशाही और मंत्री की सांठ-गांठ खत्म हो और प्रधानमंत्री भी जो संसद में कहें कम से कम उस पर तो टिकें. क्या इन परिस्थितियों को टटोलना खबर नहीं है. यानी सत्ता जो बात कहती है, उसका पोस्टमार्टम करने से मीडिया अब परहेज क्यों करने लगा है.

दरअसल, 1995 में एसपी सिंह ने जब सरकार की नाक तले ही ‘आज तक’ शुरू किया, तब भी साथी पत्रकारों को पहला पाठ यही दिया, सरकार जो कह रही है वह खबर नहीं हो सकती. और, हमें खबर पकड़नी है. खबर पकड़ने के ही इस हुनर ने एसपी को घर-घर का चहेता बनाया. एसपी उस वक्त भी यह कहने से नहीं चूकते थे कि टीवी से ज्यादा सशक्त माध्यम हो नहीं सकता. लेकिन तकनीक पर चलनेवाले रोबोट की जगह उसमें खबर डाल कर ही तकनीक से ज्यादा पत्रकारिता को सशक्त बनाया जा सकता है. और अगर सूचना या तकनीक के सहारे ही रिपोर्टर ने खुद को पत्रकार मान लिया, तो यह फ़ैशन करने सरीखा है. तो क्या अब न्यूज चैनल इससे चूक रहे हैं, और इसीलिए अन्ना की सादगी और केजरीवाल की तल्खी भी सिब्बल व दिग्विजय की सियासी चालों में खो जाती है. और, संपादक असल खबर को पकड़ना नहीं चाहता और रिपोर्टर झटके में कैमरे को लेकर भागता या माइक थामे हाफ़ंता ही नजर आता है.

लेखक पुण्य प्रसून बाजपेयी वरिष्ठ मशहूर टीवी जर्नलिस्ट / एंकर हैं. वे इन दिनों जी न्यूज से जुड़े हुए हैं. एसपी सिंह की स्मृति के बहाने उनका लिखा यह विश्लेषण प्रभात खबर हिंदी दैनिक में प्रकाशित हो चुका हैं. वहीं से साभार लेकर यहां प्रकाशन किया गया है.


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