''शीला, मुन्‍नी ही बड़ी खबर नहीं होती हैं राणा यशवंत जी''

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: इस्‍तीफा देने वाले पुराने कर्मचारियों का पैसा काट रहा है प्रबंधन : पीएफ का भी कोई हिसाब किताब नहीं दिया गया : यशवंतजी, एडिटर भड़ास4मीडिया,  महुआ न्यूज़ से लगातार पुराने मजदूरों ( यानी कर्मचारियों ) का जाना जारी है.  इस बात से बौखलाए महुआ न्यूज़ के ग्रुप एडिटर राणा यशवंत अपना गुस्‍सा पुराने कर्मचारियों की सैलरी पर उतार रहे हैं... नोटिस के बाद अगर आपकी तबीयत खराब हो जाए, अन्यथा आपके किसी निकट संबंधी का इंतकाल हो जाए... चाहे आपकी बीस दिन की छुट्टियां क्यों न बची हो...

इस स्थिति में राणा जी जरा भी देर नहीं करते और एचआर को बुलाकर निर्देश दे देते हैं कि उनकी सैलरी पूरी की पूरी काट लो... ताकि उनके नए चमचे जो आएंगे उनके सैलरी में जोड़कर उन्हें खुश कर लेंगे... हाल की बात है मैंने ग्यारह मई को महुआ न्यूज़ को नोटिस दिया कि मुझे इस संस्था से कार्यमुक्त किया जाए...

दरअसल, हमारे इस कार्यमुक्त के पीछे पहली वजह ये थी कि पिछले तीन साल में मेरी साप्ताहिक छुट्टियां तय नहीं थी... कभी छुट्टी ले भी लिया तो दफ्तर से बुलावा आ जाया करता था... दूसरी वजह, ये थी कि गंभीर पत्रकारिता की बात करने वाले राणा जी, शीला, मुन्नी और चिंटू-पिंटू वाली खबरों पर जोर देने लगे थे... उनकी नज़र में देश और दुनिया की सबसे बड़ी खबर शीला, मुन्नी और जलेबी बाई ही थी... ऐसी स्थिति में बार-बार दिल से यही आवाज निकल रही थी कि अब महुआ न्यूज़ में रहने का मतलब अपने जमीर को गिरवी रखना है. उन उसूलों के खिलाफ है जिससे प्रभावित होकर पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा था..

खैर, जो भी हो, राणा जी एक बड़े न्यूज़ चैनल से आए हैं... राणाजी से एक टूक बात कहना चाहूंगा... कि शीला और मुन्नी के ही बीच एक फिल्म आई थी थ्री इडियट्स जिसे हिंदुस्तान के लोगों ने सिर आंखों पर बिठाया था... कहने का मतलब ये है कि शीला, मुन्नी के बीच अच्छी खबरों को भी लोग पसंद करते हैं... बात प्रबंधन को लेकर हो रही थी... 21 जुलाई को जब मैं अपनी सैलरी लेने गया तो प्रबंधन द्वारा मुझे सिर्फ बाइस दिन की सैलरी थमाकर ये कह दिया गया कि हम इसमें कुछ नहीं कह सकते... ये ऊपर से आया हुआ आदेश है जो आपके चैकबुक पर है... ज्यादा नहीं कहूंगा.

हां,  इतना अपने साथियों को जरुर बता देना चाहूंगा कि इस संस्था में मैं जबतक था तबतक ना तो कोई पीएफ काटा गया है और ना ही मेरी पिछली छुट्टियों का कोई हिसाब बताया गया है... काम के नाम पर महुआ न्यूज़ में नौ घंटे का शिफ्ट सिर्फ आउटपुट में लगता है जबकि प्रोग्रामिंग में एसोसिएट प्रोड्यूसर जैसे मजदूरों की शिफ्ट तकरीबन 12 घंटे की होती है... हालांकि, 12 घंटे काम करने का कोई निर्देश जारी नहीं है बल्कि आपको अपने काम में इस तरह उलझा दिया जाता है कि आप 12 घंटे से पहले दफ्तर से घर के लिए निकल ही नहीं सकते...

महुआ न्यूज़ के नए निजाम़ में किस तरह पुराने और गैरतमंद पत्रकारों का टिकना मुश्किल है. इसकी एक और बानगी यहां दी जा रही है. नीचे मरे सहयोगी रहे राम मुरारी का पत्र है, जो उन्‍होंने  महुआ न्यूज़ से रिजाइन के लिए दिया  था. ये नोटिस  राणा यशवंत के आने के कुछ ही दिनों बाद दिया गया था. आप खुद पढ़ें और सोंचे कि पत्रकारिता के नाम पर महुआ न्यूज क्या कर रहा है. और वहां के कर्मचारियों के साथ कैसा सुलूक हो रहा है.  नीचे  राम मुरारी द्वारा एडिटर को लिखा गया पत्र..

नीरज कुमार

पूर्व पत्रकार

महुआ न्‍यूज


सर,

हर किसी की ख्वाहिश होती है आगे बढ़ने और उन्नति करने की... लेकिन तकरीबन पौने तीन साल काम करने के बाद आज ये एहसास हो रहा है कि यहां न तो आपकी प्रतिभा का कोई मोल है और न ही ईमानदारी का... मैं ये तो नहीं कहता कि मैं सबकुछ जानता हूं या मेरे अंदर कोई कमी नहीं है... लेकिन अपने बारे में ये तो जरुर जानता हूं कि मैं कैसा लिखता-पढ़ता हूं और कैसा समझता हूं... मेरी सीमाएं क्या है ये मुझे पता है... अपने आत्मावलोकन और अपने जानने वालों से जिनमें संस्थान के सहकर्मी भी हैं और बाहर के लोग भी भी मुझे अपनी काबिलियत और कमियों का पता चलता रहता है... और अपने बारे में इन जानकारियों के दम पर इतना तो मैं कह ही सकता हूं कि मुझे यहां उस लिहाज से कुछ हासिल नहीं है... और सबसे बड़ी बात ये कि अब तो जो मेरी अबतक की ताकत रही है उसी पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं... मेरी समझ, मेरी लेखन शैली पर सवाल उठाए जा रहे हैं... सीधे-सीधे उसे खारिज किया जा रहा है...

मैं मानता हूं कि इंसान होने के नाते कमियां होंगी और हैं भी... लेकिन इस क्षेत्र में खारिज करने की हद तक... ये मैं नहीं मानता और न मान सकता हूं...और ऐसे हालात में यहां रहने का मतलब है खुद पर से अपने भरोसे का कम होना... और मैं नहीं चाहता कि मेरा भरोसा मुझ पर से कम हो... इसके अलावा अब यहां खबरों की प्रस्तुति को लेकर जो डिमांड है, वो मैं कर नहीं पाउंगा... बेचने की कला मुझे आती नहीं... न खबरों को न खुद को... लिहाजा मैं चाहता हूं कि मुझे कार्यमुक्त किया जाय... हालांकि घर परिवार और जिंदगी के खर्चों के लिहाज से दिमाग से ये फैसला लेना मुश्किल था, लेकिन दिल हालात से समझौता करने से इनकार कर रहा है... वैसे बार बार घुटने से बेहतर है एक आखिरी फैसला लेना... लिहाजा मैं अपना इस्तीफा भेज रहा हूं... और चाहता हूं कि 11 मई 2011 की तारीख के बाद मुझे यहां से कार्यमुक्त कर दिया जाय...

धन्यवाद

राम मुरारी

एसोसिएट प्रोड्यूसर

महुआ न्यूज़


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Comments (3)Add Comment
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written by suchitra saran, July 25, 2011
Is desh ke adhikansh patrakaron ki yahi sthiti hai.. Upar wale kisi Bhi keemat me neechea walon ko aage badhne nahi dete, Lihaja choton ko hamesha shoshit hona padta hai..Electronic media me in dino jyada hi vyavsayik soch panapne laga hai yahi wajah hai hi yahan sthirata nahi hai..mujhe dono patrakaro ke prati sahanubhuti hai...
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written by gazaj singh, July 24, 2011
bhai ye bandhu apneaap ko purva patrakar keyon likh rakha hai....mahua keya patrakar banane ka karkhana hai. jo waha kam keya ptrakar hai...jo waha nahi hai oh patrakar nahin hai...yeh aam...jamun...mahua...papita...nibu...aur kukurmutta jaise channels ke prati itne moh nahi rakhni chaheya....agar apne app ko patrakar mante hain to age badhey....tamam tarike hain....kisi rana wana type ke gurughantal ke chakkar me keyon pade hain...darasal apne biodata me ye log likhte hain ke "i have strong leadership"...leadership ka matlab hota hai aap jaha bhi jaye apni personality ke zarey apne saath kisi ko bhi kam karne per majboor kar de...lekin een so called leaders ko apni leadership dikhane ke leye apne kafille ke jaroorat padti hai..jo oh kar raha hai.
rana gaazar singh...news director, jalebi news. agra.
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written by ravi kumar, July 24, 2011
ये इलैक्ट्रोनिक मीडिया का दुर्भाग्य है कि चैनल के मालिकान को या तो अच्छे लोग मिलते नहीं हैं,या वो अच्छे लोगों को चुनते नहीं हैं।क्या आजतक में काम करने का अनुभव ही योग्यता का पैमाना है।छोटे चैनलों में भी योग्य पत्रकार मिल सकते हैं।राणा यशवंत छपरा के रहने वाले हैं।लिहाजा भाषाई अशुद्धि उनके लेखन में भी ज़रूर होगी।राणा जी संभल जाइए।वक्त बड़ा बेरहम होता है..मशहूर शायर फिराक गोरखपुरी का एक शेऱ है..अभी भी वक्त है संभल जा ओ हिन्दोसतां वाले..तेरी बर्बादी के मशविरे हैं आसमानों में..किसी के पेट में लात मत मारिए..वर्ना बद्दुआओं का ऐसा असर होगा कि दोज़ख(नर्क) में भी जगह नहीं मिलेगी

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