स्टिंग का एक्सक्लूसिव राइट लेने वाला न्यूज चैनल डबल गेम कर गया

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: नोट-वोट कांड : भाजपा का स्टिंग आपरेशन के लिए कांग्रेसी रुझान वाले राजदीप सरदेसाई और उनके चैनल सीएनएन आईबीएन को चुनना सबसे बड़ी गलती : बीजेपी को नहीं पता था कि मीडिया में नपुंसक पैदा हो गए हैं : यह मामला राजनीति के अपराध और पैसे के खेल में बेशर्मी से घुलमिल जाने और चश्मदीद मीडिया के दुबक जाने की मिसाल है : पुलिस के पास असली दांत बचे ही नहीं, होते तो मामले में तीन बरस पहले ही पैसे के स्रोत का खुलासा कर दिया गया होता :

आलोक कुमार

आलोक कुमार

खुली आंखों से समाज का देखा-परखा सच सामने हो, तो जांच में पुलिस की मुश्किल बढ जाती है। मुश्किल तब और बढ जाती है जब दागदार दिख रही सरकार की पुलिस के मुलाजिमों से उम्मीद रहे कि जांच में उसे बेदाग निकला जाए। 'नोट के बदले वोट'' या सांसद रिश्वत कांड की जांच में पुलिस को इन्हीं दोहरी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। एक तरफ सुप्रीम कोर्ट का हथौड़ा है, तो दूसरी तरफ कांड से फायदा उठाने वाली केंद्र सरकार का भय। भय की भयावहता से बनी मजबूरी को कांड की तीसरी बरसी के दिन देश और समाज के लोगों ने फिर खुली आंखों से देखा। वैक्स बेगन की लग्जरी कार दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा के दफ्तर पर रुकी।

मीडिया के मजमा के बीच दनदनाकर भूरे सफारी पहने फुर्तीला, छबीला सुरक्षा गार्ड कार से बाहर निकला और पूरे प्रोटोकॉल का निर्वाह करते हुए कार की पिछली बांई गेट खोलकर हाजिर हो गया। कार से कांड के मुख्य आरोपी अमर सिंह रईसाना अंदाज में बाहर आए और निजी सुरक्षा गार्ड कमर पर रखे असलाह को सम्हालने का आभास देता हुआ आरोपी अमर सिंह को स्कॉट करता हुआ दिल्ली पुलिस के जांच अधिकारी (आईओ) तक ले गया। हम पत्रकारों ने पहली बार अपराध शाखा के दफ्तर पर किसी आरोपी को महंगी लग्जरी कार से ठाठ से निकलकर आते देखा था। तीन घंटे के इंतजार के बाद मीडिया को खबर दी गई कि अमर सिंह ने लंबी पूछताछ में कांड के दो अन्य आरोपियों सुहैल हिन्दुस्तानी और संजीव सक्सेना से किसी तरह के सरोकार से साफ इंकार कर दिया। अमर सिंह की इंकार भरी इस सफलता के बाद अब पुराने आका मुलायम सिंह यादव का बयान आया है कि अमर सिंह के साथ नाइंसाफी हो रही है।

यह मामला राजनीति के अपराध और पैसे के खेल में बेशर्मी से घुलमिल जाने और चश्मदीद मीडिया के दुबककर छिप जाने की अदभुत मिसाल है। तीन साल पहले का वक्त बखूबी याद है। न्यूज चैनलों की गलाकाट प्रतियोगिता में राजदीप सरदेसाई का चैनल बाजी मार गया। सांसदों को वोट के लिए नकद रिश्वत देकर खरीदने की व्यूहरचना तय करते वक्त भारतीय जनता पार्टी के सूत्रधारों ने बाकी न्यूज चैनलों को चकमा दिया था। विश्वसनीयता बढाने के मकसद से स्टिंग आपरेशन के लिए कांग्रेसी रुझान वाले राजदीप सरदेसाई के चैनल सीएनएन आईबीएन को चुन लिया। प्रतिद्वंदी चैनल में काम करने वाले हम जैसे खोजी पत्रकार ठगे से महसूस करते रहे। ग्लानि से भर गए और बीजेपी के सूत्रधारों को पानी पी पीकर कोसते रहे कि नासपीटों को एक्सक्लूसिव राईट ही देनी थी तो बाकी चैनल मर गए थे क्या? भारतीय जनता पार्टी होशियार होती कि स्टिंग ऑपरेशन का एक्सक्लूसिव राईट देने की बेवकूफी नहीं करती। खैर, कोसने से क्या होता है? उनको भी तो नहीं पता था कि मीडिया में भी साख के बजाय डबल गेम करने वाले नपुंसक पैदा हो गए हैं।

सच है कि स्टिंग का एक्सक्लूसिव राईट लेने वाला न्यूज चैनल डबल गेम कर गया और वक्त पड़ने पर दुम दबाकर बैठ जाएगा। बतौर पत्रकार मानता हूं कि वोट के बदले नोट वाले के कुकर्म से दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्र को लज्जित करने वाले इस कांड में ओछी हरकत करने वाली मीडिया समान रूप से कसूरवार है। लंदन ने मिसाल दी है कि इस किस्म के कुकर्म करने वाली मीडिया के साथ क्या सलूक किया जाना चाहिए?

कुकर्म, कुकर्म... के अलाप पर किसी किस्म का रोदन भैंस के आगे बीन बजाने जैसा लग रहा है। मन कहता है कि एक स्थापित व्यवस्था है। इसी व्यवस्था की जड़ता में पुलिस भी जकड़ी है। जिसकी निष्क्रियता भरी मदद से 2008 में अल्पमत की यूपीए-1 की सरकार बचा ली गई। उस सफलता के बाद से ही कांड में शामिल लोगों को बचाने की जिम्मेदारी पुलिस पर बनी रही है। तीन साल तक पुलिस यह काम बखूबी होता रहा। सुप्रीम कोर्ट के एक पीआईएल पर फैसले ने दिल्ली पुलिस को परेशान कर दिया। अब उनींद की खुमारी खत्म करने का नाटक रचना पड़ रहा है। बेहतर तो होता कि जांच को नीचे दबा गद्दा बनाकर बैठे रहने वालों की जवाबदेही तय की जाती। इससे आगे किसी पॉलिटिकल ड्रामे के जरिए होने वाले भ्रष्टाचार के खेल को दबाने की जुर्रत पुलिस में कोई नहीं कर पाता।

नोट से वोट खरीदने की जरूरत वामपंथी दलों के अमेरिका विरोधी रुख की वजह से आई थी। कांड के जरिए माहौल बनाकर फायदा अमेरिका को पहुंचा दिया गया। एक तथ्य यह भी है कि तब सोनिया गांधी की कांग्रेस पार्टी से ज्यादा बडा फायदा अमेरिकी कांग्रेस के मुखिया राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश को हुआ। वामपंथियों के समर्थन वापसी से अल्पमत में आई सरकार को उसी बीजेपी ने मदद की। सदन में विपक्ष की मदद से मनमोहन सिंह ने  एटमी करार पास कराया। अमेरिका से जा रहे जार्ज बुश की तरफ से अमेरिका को आर्थिक बोझ से उबारने की यह आखिरी कोशिश थी। संसद में नाक कट जाने के बाद भी यूपीए-1 की सरकार ने अमेरिकी परस्त करार पर हामी भरकर अमेरिका के एटमी उद्योग को सीधा फायदा पहुंचाया गया। इसी गणित के तहत प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह दावा कर गए कि वोट के बदले नोट कांड में कांग्रेस पार्टी शामिल नहीं है।

इससे लाजिम सवाल उठता है, तो क्या भारतीय संसद में बिकने के लिए आए करो़ड़ों की गड्डियों को लहराने का मुजाहिरा अमेरिकी ताकतों के बूते होता रहा? रकम देसी नेताओं ने नहीं, अमेरिकी आकाओं ने भिजवाई। इस पहलू की पड़ताल विकिलिक्स के खुलासे के बाद ज्यादा जरूरी है। अफसोस के साथ इस समझ को बयां कर रहा हूं कि शायद ही पुलिस तंत्र इसका खुलासा कर पाएगी कि सांसदों को खरीदने के लिए बंटा करोड़ों रुपए आखिर आया कहां से था। इन रुपयों को संसद की कार्यवाही के प्रसारण के क्रम में तमाम दर्शकों को दिखाया गया। उससे अंतर्राष्ट्रीय पटल पर भारतीय संसदीय परंपरा की काफी किरकिरी हुई है।

नजरों से दिखे सच को बयां करूं तो, ये रुपए कहां से सप्लाई हुए? किसने, किसको और किस लिए दिया? ये बातें घटना के चंद घंटों के अंदर ही साफ हो गया था। स्टिंग ऑपरेशन को आंशिक तौर पर दिखाने की मजबूरी में जो कुछ क्लिपिंग्स बाहर आए उसमें साफ दिखा कि अमर सिंह के लोधी रोड आवास पर काम करने वाले एक शख्स संजीव सक्सेना ने बीजेपी के तीन सांसदों तक पहुंचवाया। बिकने को तैयार हुए सांसदों को अमर सिंह के पार्टी के ही दूसरे बुजुर्गवार सांसद रेवती रमण सिंह के साथ अमर सिंह के लोधी रोड आवास में आते जाते देखा गया।

अगर यह शानदार स्टिंग ऑपरेशन किसी कमजोर के खिलाफ होता तो स्टिंग करने वाला न्यूज चैनल इसे इतने चटकारे लेकर दिखा रहा होता कि वह टीआरपी और लोगों के भरोसे के खेल में सबसे अव्वल करार दिया जाता। लेकिन तब मुमकिन था कि स्टिंग ऑपरेशन के सीना ठोंककर प्रसारित करने वाले न्यूज चैनल के साथ वही सब हुआ होता जैसे कि आज सहयोगी बालकृष्ण की गिरफ्तारी के भय से घिग्घी बांधे बैठे रामदेव बाबा की हो रही है। कहावत है ना जिसके घर शीशे के बने होते हैं वो दूसरों की घर पर पत्थर नहीं फेंका करते।

ये बातें इसलिए कि जांच को लेकर पुलिस की चुनौती को समझा जा सके। पुलिस अगर दबंग होती तो हाल में रिलीज हुई फिल्म सिंघम के अजय देवगन जैसी होती। लेकिन अफसोस कि समाज के कोढ को मिटाने की कोशिश को हमने रुपहले परदे तक सीमित कर दी है और हमारी खुशी फिल्मी कोशिशों पर ही ताली बजाने तक सिमट गई हैं। सांसद रिश्वत खरीद कांड के आरोपी अमर सिंह के दिल्ली पुलिस अपराध शाखा के दौरे के साथ इतिहास का अजीब संयोग सामने था। ठीक तीन साल पहले 22 जुलाई 2008 को जिस वक्त लोकसभा में नोट की गड्डियां लहराई जा रही थी ऐन उसी वक्त शुक्रवार, 22 जुलाई 2011 को अमर सिंह का कांड के दोनों गिरफ्तार आरोपियों से सामना कराया जा रहा था। हां, थोड़ा फर्क जरूर था, जगह संसद नहीं, दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा के पूछताछ का कमरा था।

यहां जो हुआ उसके बारे में मेरे एक जानकार अजीज की राय है कि यह पूछताछ नहीं। आरोपियों का अमर सिंह से सामना नहीं। बल्कि दिल्ली पुलिस की दक्षता की परख थी। तीन घंटे की पूछताछ से निकले नतीजे का संकेत देते हुए पुलिस सिर्फ इतना कह पाई कि अमर सिंह ने कांड के खुलासे के वक्त निजी सचिव बताए गए संजीव सक्सेना तक को पहचानने से इंकार कर दिया और सुहैल हिंदुस्तानी से किसी सरोकार की बात नहीं कबूली। अमर सिंह के इस इंकार से दिल्ली पुलिस खुश है क्योंकि जांच को सरकार के मनमाफिक मोड़ लेने का रास्ता मिल सकता है।

जांच की दिशा को लेकर जो बात आ रही है उसमें कहा जा रहा है कि वोट के लिए सांसद खरीदने की कोई जरूरत नहीं थी बल्कि भारतीय जनता पार्टी की युवा इकाई से वास्ता रखने वाले सुहैल हिंदुस्तानी ने ही सांसदों के खरीददार ढूढने का काम किया था और उसके लपेटे में बेचारे अमर सिंह का दफ्तर फंस गया। असली मुजरिम तो अमर सिंह को फंसाने वाला सुहैल हिंदुस्तानी और फंस जाने वाला अक्षम सचिव संजीव सक्सेना है।

अमर सिंह के पूछताछ को कवर करने पहुंचे पत्रकारों में एक दोस्त ने खुली आंखों से दिख गए एक सपने की बात कह दी कि अगर पुलिस को असली दांत के इस्तेमाल की छूट मिले तो वो पहला प्रहार ठाठ से पहुंचे आरोपी के कायम ठाठ पर कर दे। एक नया मामला बनाकर पूछताछ कर ले कि इतनी मंहगी कार कैसे और कहां से आई? यह सवाल करे कि निजी सुरक्षा गार्ड के एस्कॉर्ट पुलिस पूछताछ के लिए दिल्ली पुलिस के अपराध शाखा में दाखिल होने की क्या जरूरत है? जवाब में बस इतना ही कहा जा सकता है कि पुलिस के पास असली दांत बचे ही नहीं, होते तो मामले में तीन बरस पहले ही पैसे के स्रोत का खुलासा कर दिया गया होता। पैसे लेने वाले के पीछे पड़ने के बजाय पैसा देने वाले को गिरफ्तार किया जाता।

अमर सिंह सरकार मे शामिल नहीं थे। फिर भी उनके घर सरकार बचाने का सौदा हुआ। यह सब किस सौदे की आड़ में हुआ? आखिर किसे क्या मिला या किसके क्या मिलने की उम्मीद थी, जो कांड के भंडाफोड से मुमकिन हुआ या नहीं हुआ? ऐसे ही गोया चंद कुछ और सवाल थे, इनका खुलासा हुआ होता। करोड़ों की नगदी किस खाते से निकाली गई या किस कालाबाजारी के घर से निकालकर लाई गई। इसका तहकीकात करने की हिम्मत पुलिस नहीं कर पा रही है। पुलिस की नपुंसक भय के पीछे कौन दबंग है? सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद बंद जांच की दशा और दिशा को देखकर सिर्फ इतना ही कहा जा सकता है कि दिल्ली पुलिस बुरी फंसी है। उसके काबिल जांचकर्ताओं पर बोझ है कि वो लोकतंत्र को कलंकित करने वाली करतूत से उन हैसियतदार आरोपियों को बचा ले जाए, जो सरेआम कसूरवार दिख रहे हैं।

वोट के बदले नोट से यूपीए-1 की सरकार को फायदा पहुंचना था। पुलिस के चश्मे से देखें तो फिलहाल अमर सिंह का तत्कालीन सचिव संजीव सक्सेना ही सूत्रधार है लेकिन सूत्रधार को करोड़ों की रकम उसके आका अमर सिंह ने दी या फिर कांग्रेस के अहमद पटेल ने या किसी और ने, इस पर पुलिस की जांच में चुप्पी कायम है। ये चुप्पी बताता है कि जांच सीबीआई को दी जा सकती है। दिल्ली पुलिस की पूछताछ का अगला चरण सपा के सांसद रेवती रमण सिंह से है जिनके साथ गाड़ियों में बिकने वाले सांसद अमर सिंह के लोधी कॉलोनी आवास पर लाए गए। रेवती रमण सिंह के बाद फिर अमर सिंह से दूसरे चरण की पूछताछ हो सकती है। मुलायम सिंह यादव की आपत्ति आरोप के गेंद को समाजवादी पार्टी के सांसदों के बीच ही घुमाए जाने पर है। बिकने वाले सांसद अशोक अर्गल से पूछताछ होना बाकी है। तब बीजेपी भी मुलायम सिंह यादव की धुन पर तान छेड़ेगी। इससे तैयार राजनीति में कांग्रेस के घिर जाने का खतरा है। मुमकिन है कि जांच को राजनीतिक फायदे-नुकसान से बाहर निकलने नहीं दिया जाएगा।

लेखक आलोक कुमार ने कई अखबारों और न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. उन्होंने 'आज', 'देशप्राण', 'स्पेक्टिक्स इंडिया', 'करंट न्यूज', होम टीवी, 'माया', दैनिक जागरण, ज़ी न्यूज, आजतक, सहारा समय, न्यूज़ 24, दैनिक भास्कर, नेपाल वन टीवी में अपनी सेवाएं दी हैं.  झारखंड के पहले मुख्यमंत्री के दिल्ली में मीडिया सलाहकार रहे. कुल तेरह नौकरियां करने के बाद आलोक इन दिनों मुक्त पत्रकारिता की राह पर हैं.


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