दूरदर्शन ठीक है, बाकी न्यूज चैनल खबर की आत्मा मार डालते हैं

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: अंकुश से भागता क्यों है हमारा मीडिया : न्यूज ऑफ द वर्ल्ड स्कैण्डल से सारी दुनिया को सबक लेनी चाहिए. गैरकानूनी और अनैतिक ढंग से दूसरों की निजता भंग करने के गम्भीर अपराध के कारण यह अखबार तो बंद हो चुका है फिर भी मर्डोक का मीडिया साम्राज्य बरकरार है. अलबत्ता, उनके इस साम्राज्य की विश्वसनीयता बुरी तरह प्रभावित हुई है और इसका असर दुनिया की मीडिया पर भी देखने को आएगा.

मर्डोक का यह बेलौस बयान कि 'न्यूज ऑफ द वर्ल्ड दूसरों को जवाबदेह रखने के कारोबार में था, लेकिन जब अपनी बारी आयी तो वह नाकाम रहा" उनके काम नहीं आने वाला. वे अपनी जवाबदेही से नहीं बच सकते. उनका पूरा साम्राज्य जांच के घेरे में है, जाहिर है आगे कुछ और चौंकाऊ तथ्य सामने आ सकते हैं.   अपने देश को तो खासतौर से सबक लेने की जरूरत है. हमारे यहां मीडिया का तीव्र विकास हो रहा है, लेकिन इसकी दिशा-दशा नियंत्रित करने वाला कोई तंत्र नहीं है. हमारे यहां मीडिया पर निगरानी के लिए सार्वजनिक प्रसारण व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं है और इसके समकक्ष जो इस जैसी चीज है भी तो वह पंगु है. निगरानी के लिए ब्रॉडकॉस्टर्स एसोसिएशन जैसी संस्था अभी शैशवावस्था में ही है. फिर उसका दायरा भी सीमित है. ऐसा नहीं है कि मीडिया पर कानूनी नियमन की बात नहीं हुई है लेकिन मीडियाकर्मियों ने इसका इस तर्क पर जोरदार विरोध किया है कि इससे मीडिया की स्वतंत्रता पर आंच आएगी.

मैं समझता हूं यह तर्कसंगत बात नहीं है. जितना खतरा कानून नियमन में हैं करीब उतना ही कानून नियमन के अभाव में है. हमारे यहां न्यूज के जितने चैनल हैं उनकी सामग्रियों पर देखें तो पाएंगे कि न्यूज दबा हुआ है और उसकी जगह या तो राय थोपी जा रही है या फिर ऐसी चीजें दिखायी जा रही है जिनसे मीडियों को वास्ता रखना ही नहीं चाहिए. चैनलों की प्रतिस्पर्द्धा भी अक्सर गलत तरीके से सामने आती है. उत्तेजक व सनसनीखेज एंकरिंग, अंधविश्वास फैलाने वाली खबरें, सबसे पहले ब्रेक करने के झूठे दावे, मीडिया ट्रायल, निजता उघारने वाली खबरें देखकर मीडिया पर नियंत्रण करने की जरूरत गम्भीरता से जान पड़ती है. आज देश में जितने भी न्यूज चैनल हैं उनमें दूरदर्शन ही सही मायनों में सीधी सपाट खबरें रखता है, बाकी सारे मिर्च-मसाले लगाकर खबरों का कारोबार करते हैं, जिससे खबर की आत्मा मर जाती है.

मर्डोक प्रकरण पर वापस लौटें तो हमारे लिए यह चेतावनी है. हमें याद रखना चाहिए कि हमने संसदीय लोकतंत्र के साथ-साथ स्वतंत्र प्रेस की संस्तुति भी मुख्य रूप से ब्रिटेन से ग्रहण की है. असल में ब्रिटेन की ताजा घटनाओं में दुनिया भर में मीडिया के उभरते नए चरित्र की झलक मिलती है. खबर के कारोबार में बढ़ती प्रतिस्पर्द्धा के साथ 'ब्रेकिंग न्यूज" लाने का दबाव आज कुछ इस कदर बढ़ गया है कि मीडिया समूह को यह याद नहीं रहता कि वे बेलगाम नहीं हैं और उनके लिए भी कुछ 'लक्ष्मण रेखा" बनायी गयी है. आखिर मीडिया को समाज में प्रतिष्ठा इसलिए मिली होती है कि वह सत्ताधारी लोगों को जवाबदेह बनाने में पहरेदार की भूमिका निभाता है. मगर मीडिया अपने वैध विशेषाधिकारों का दुरुपयोग करने लगे, तो वह एक सामाजिक संकट का स्रोत बन जाता है.

जो यह सोचते हैं कि मीडिया समूह कॉरपोरेट कल्चर का हिस्सा है जिसके लिए मुनाफा कमाना सबसे अहम काम है, वे गलत हैं. मीडिया समूहों की मूल प्रवृत्ति ऐसी है कि उनके साथ जनता का विश्वास जुड़ा है. मीडिया केवल लोकतंत्र का चौथा खम्भा भर नहीं है बल्कि यह सामाजिक उत्प्रेरक के तौर पर काम करता है. जनता की राय बनाने और उसे आकार देने का यह एक अहम जरिया है. मीडिया की जिम्मेदारी और जवाबदेही बहुत मायने रखती है, यह चीज आज सरकार से अधिक मीडिया को समझने की जरूरत है.

लेखक बीजी वर्गीज वरिष्ठ पत्रकार हैं और रेमन मैग्सेसे पुरस्कार विजेता हैं.

प्रस्तुति : प्रवीण कुमार

साभार : सहारा समय


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Comments (1)Add Comment
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written by rajkumar sahu, janjgir chhattisgarh, August 01, 2011
sahi baat ko aapne rekhankit kiya hai. badhaai.

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