नीतीश के सुशासन के गीत गा रहा है ईटीवी

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: इसीलिए बिहार-झारखंड में लगातार साबित हो रहा है फिसड्डी, अरुण अशेष के आते ही हुआ बंटाधार : ईटीवी बिहार-झारखंड में अरुण अशेष की वापसी बड़े ही धूमधाम के साथ हुई थी लेकिन उनके आने के साथ ही चैनल की टीआरपी धड़ाम से गिर गई है. चैनल बिहार-झारखंड में नंबर एक से गिरकर चौथे-पांचवे स्थान पर जा खड़ा हुआ है. हाल में शुरू हुए मौर्य और महुआ उससे काफी आगे निकल आए हैं. जब तक पटना में कमान कुमार प्रबोध के हाथ में था, चैनल लगातार आगे चल रहा था.

यहां तक कि पटना में चार सीनियर रिपोर्टरों के छोड़ने के बाद भी ईटीवी नंबर एक था. लेकिन जगदीश कातिल ने जैसे ही नीतीश कुमार के करीबी अरुण अशेष को चैनल का काम सौंपा, चैनल लगातार पिछड़ता जा रहा है. खबरों का पैनापन लगातार कम हो रहा है और तथाकथित सुशासन का गीत ईटीवी गा रहा है. प्रबोध बीच-बीच में स्थिति संभालने की कोशिश करते हैं लेकिन उसमें वे सफल नहीं हो पा रहे हैं. अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता. अविनाश, राजेश और विमल जैसे लोग प्रबोध की गति बाधित करने में लगे हुए हैं.

लेकिन जगदीश चंद्रा को चैनल की इस हालत से शायद कोई मतलब नहीं है. उन्हें तो बस रेवेन्यू चाहिए. कमोवेश यही हाल झारखंड का है. यहां राजेश कुमार अपने दम पर चैनल को खींचने में लगे हैं. ईटीवी की लांचिंग टीम के सदस्य रहे कृष्ण बिहारी मिश्र, प्रदीप कुमार सिंह पहले ही चैनल के रवैये को देखते हुए अलविदा कह चुके हैं. दोनों झारखंड के मंझे हुए संवाददाता थे. कृष्ण बिहारी की सच्ची पत्रकारिता के कायल सत्ता के गलियारे के लोग भी हैं, वहीं प्रदीप सिंह की छवि झारखंड के तेज-तर्रार पत्रकारों में होती है. वहीं पीवी नरेंद्र से प्रभार लेने के बाद से बिहार-झारखंड पर हैदराबाद की निगरानी नहीं है. जल्द ही यहां चैनल शून्य में विलीन हो जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए.

ईटीवी में कार्यरत रहे एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. अगर उपर उल्लखित तथ्यों में कोई कमी-बेसी दिखे तो उसका खंडन-मंडन नीचे दिए गए कमेंट बाक्स के जरिए कर सकते हैं.


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