दीपक चौरसिया ने अन्ना का अपमान किया!

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जगमोहन फुटेलासन अस्सी के दशक के शुरू में मेरी पहली नौकरी लगी तो मैं उपसंपादक था और मेरी पहली तालीम ये कि जब भी किसी मसले पर किसी भी संस्था का सहमति या विरोध में कोई प्रेस नोट आए तो उसमें लिखे नामों में से कम से कम आधे ज़रूर छाप देना. बाकी आधे अगली बार.

इसके पीछे सोच ये कि कल कम से कम पांच अखबार वो हर आदमी खरीदेगा, अपनों में दिखाने बांटने के लिए और कुछ फिर वो भी जिन्हें वो फोन कर कहेगा कि देखो आज के अखबार में मेरा नाम छपा है. मुझे याद है कि ऐसे कुछ लोगों को उनका नाम छप रहा होने की जानकारी फोन से रात को ही दे दी जाती थी. ताकि वे अपने लिए अपनी आवश्यकता की प्रतियां हाकर से कह के पहले ही सुनिश्चित और सुरक्षित कर लें.

समय के प्रवाह के साथ वो अखबार बहुत बड़ा हो गया और मेरा ये यकीन पक्का कि अखबार मुद्दों नहीं, नामों के सहारे भी छपते और बिकते हैं. फिर नब्बे के दशक में मैं इस देश के पहले प्राईवेट टीवी चैनल में रिपोर्टर हुआ तो देखा कि मीडिया अपनी सुविधा और ज़रूरत के लिए खबरें कवर ही नहीं करता, उन्हें गढ़ता भी है. मुझे एक घटना याद आती है... मैं ब्यूरो देखता था एक न्यूज़ चैनल में. कहीं किसी शहर में एक हत्या हुई.

मुझे जनसत्ता के दिनों से इंडियन एक्सप्रेस के मेरे एक मित्र ने फोन किया. बताया कि हमारा स्ट्रिंगर मृतक की पत्नी से ऐसे बैठने वैसे बैठने, इधर देखने उधर देखने, और फिर जैसे ही इशारा करे वैसे ही रोना शुरू कर देने की हिदायतें दे रहा था. मेरे मित्र जैसे प्रिंट मीडिया के लोगों ने इस पर आपत्ति की तो उसने कहा कि भाई समझो, हम विजुअल मीडिया में हैं. आपने आंसू हों न हों लिखने हैं, मुझे दिखाने भी पड़ेंगे. अम्बाला में पुलिस एक ऐसे पत्रकार की धुनाई कर चुकी है जिसने रिपोर्ट दर्ज न होने से दुखी थाने में आई एक महिला से कहा कि तू अपने कपड़े फाड़ ले, इन सबकी वर्दियां तो मैं उतरवा दूंगा. आपने पढ़ा सुना ही होगा कि कैसे एक बड़ी खबर के चक्कर में एक महिला को उकसा कर कुछ टीवी पत्रकारों ने जिंदा जला दिया था.

मेरा ये अनुभव है कि पत्रकारों के मौके पर पंहुचने से पहले लोग खामोश और उनके कैमरे देखते ही चिल्लाने लगते हैं. वे अगर चिल्ला चिल्ला के थक चुके हों तो बाद में पंहुचे कैमरों के लिए उन्हें फिर से चिल्लाना पड़ता है. और अगर उसके भी बाद पंहुचे कैमरों को मौके से सब जा चुके मिलें तो फिर खुद कुछ लोग जुटा कर चिल्लाहट करानी पड़ती है. कभी कभार तो उनकी भी बाईट ली, भेजी और चलाई जाती है जिनका उस मुद्दे या उस संस्था से कोई ताल्लुक ही नहीं होता.

छोटी खबर को बड़ा करना व्यावसायिक मजबूरी हो गई है और बड़ी खबर को उस से भी बड़ी बताना खुद को बड़ा बताने की कोशिश. जैसा दीपक चौरसिया ने संसद पर हुए हमले के दौरान किया. वे दो घंटे तक चीख चीख के बताते रहे कि संसद परिसर में बम फटा है. बड़ी जोर का धमाका हुआ है. उनने खुद सुना है. उनने खुद देखा है. धुंआ है. भगदड़ है. पुलिस है. बम निरोधी दस्ते हैं. भय का माहौल है. वगैरह वगैरह... अब आप ज़रा दिल्ली पुलिस, खुद संसद या बाद में अदालत में चली कारवाई का रिकार्ड उठा के देख लीजिये. उसमें संसद पे हमले का ज़िक्र तो है. बाहर किसी बम के फटने का कोई ज़िक्र कहीं नहीं है.

तब दीपक आजतक में थे. अब स्टार में हैं. वे वही हैं. उनकी सोच, आदत और समझ भी वही है. ज़ाहिर है पत्रकारिता का स्तर भी. अन्ना की रिहाई वाले दिन 'हमने बीस कैमरे' लगाने का दम भरने और बरसात के बावजूद सुबह शाम तिहाड़ से लेकर वाया राजघाट रामलीला मैदान तक डटे रहने और निरवरत अन्ना के कसीदे पढ़ने वाले श्रीमान दीपक चौरसिया बीती रात अभिषेक मनु सिंघवी के घर पर थे. वन टू वन कर ये दिखाने कि जिसे बरखा, राजदीप या अरनब गोस्वामी तक नहीं पकड़ पाए, वे उन अभिषेक मनु के साथ उनके घर, उनके सोफे पे, उनके साथ बैठे हैं. और फिर जैसा मैंने कहा, खबर अगर न हो तो बनानी पड़ती है. खबर यहाँ भी नहीं बन रही थी. वो ही न बने तो मज़ा ही क्या. सो लगे दीपक चौरसिया अभिषेक मनु के मुंह में शब्द ठूंसने.

एकाध नहीं कई बार पूछा, क्या आपको नहीं लगता कि अन्ना टकराव पैदा कर रहे हैं संसद के साथ? अब अभिषेक सिंघवी भी आखिर अभिषेक सिंघवी हैं. राजनीति और शब्दों के चयन का सलीका उन्हें पहली बार अपने पिता का अंगूठा चूसने के समय से तब से है जब शायद दीपक के पिता जी की शादी भी नहीं हुई होगी. वे नहीं बोले अन्ना के खिलाफ एक शब्द भी. दीपक ने बहुत कोशिश की. अभिषेक ने हर बार कहा, आप स्वतंत्र हैं, कुछ भी कह सकते हैं, मैं वैसा नहीं कहूँगा.

और फिर दीपक 'स्वतंत्र' हो गए. चाय वो शायद पहले पी चुके होंगे. उसके साथ शायद कुछ नमकीन और उस नमक का असर रहा हो. वो उन पे तारी हुआ. और वे बोले," मुझे तो ये अन्ना का मज़ाक लगता है". अभिषेक फिर कुछ नहीं बोले. वकालत के पेशे ने उन्हें बखूबी समझा दिया है कि जब सामने वाला ज्यादा बोलने के चक्कर में अपने पैरों पे खुद कुल्हाड़ी मार लेने पे आमादा हो तो उसे मार ही लेने देनी चाहिए. वे चुप रहे. दीपक को लगा मैदान खाली है. एक शाट और मारो. बोले, "मुझे तो लगता है, अन्ना आन्दोलन नहीं मखौल कर रहे हैं".

जब ये इंटरव्यू चैनल पे चला तो इसके आगे उसने काट दिया. मुझे नहीं मालूम इसके आगे दीपक ने अन्ना को और क्या क्या कह कर निरादरित किया होगा. कोई पूछे इन भाईसाहब से कि भैया, आप इंटरव्यू लेने गए थे कि देने? और अगर आपको लगता है कि अन्ना भारतीय संविधान, संसद या जनता के साथ मज़ाक कर रहे हैं तो आप क्या कर रहे हैं उनके साथ तिहाड़ से लेकर रामलीला मैदान तक? इन से भी बड़ा सवाल ये है कि जब आप अपनी बुद्धि, दिमाग, सोच और प्रतिबद्धता से हैं ही नहीं अन्ना या उनकी सोच के साथ तो उनके लिए सुबह सुबह बिना नहाए धोये रामलीला मैदान आ के सिटी रिपोर्टर की तरह उनकी रिपोर्टिंग क्यों कर रहे हो?

पी7 न्यूज़ के एक रिपोर्टर को मैंने देखा टीवी पर. पीस टू कर रहा था. कल. सर पे 'मैं अन्ना' वाली टोपी लगा के. अरे भैया, इतना ही शौक है अन्ना का साथी दिखने का तो पहले वही कर लो. चैनल की नौकरी और रिपोर्टिंग बाद में कभी कर लेना... तुम्हीं बताओ कैसे भरोसा करें तुम्हारी रिपोर्ट पर? क्या भरोसा है कि जो तुम बोल और बता रहे हो वो सब निष्पक्ष है. कैसे मान लें कि तुम आस पास वैसी टोपी वालों को खुश करने के लिए या फिर उनसे डर के नहीं बोल रहे हो?

कल रात आशुतोष ने और भी गज़ब किया. एक कमाल का शो करते हैं करन थापर उनके चैनल IBNCNN पर. आशुतोष चूंकि चैनल के सम्पादक मंडल में हैं सो आशुतोष को आजकल बिठाना ही पड़ रहा है कार्यक्रम में. कल का प्रोग्राम अन्ना आन्दोलन में मीडिया की भूमिका पर था. करन ने पूछा आशुतोष से कि क्या मीडिया ने अपनी ज़रूरतों के लिए कुछ ज्यादा ही बढ़ा चढ़ा कर पेश नहीं किया है आन्दोलन को?... अब पत्रकारिता में करन थापर का कद देखिए, आशुतोष का भी और फिर आशुतोष का जवाब देखिए. पलट कर बोले, "ये उन अंग्रेजीदां पत्रकारों की सोच है जिन्हें पत्रकारिता के बाद सरकार की मदद से कोई पी.आर.ओ. टाईप नौकरी चाहिए." उनके ये कह लेने के बाद आशुतोष का मुंह हमेशा की तरह काफी देर तक खुला ही रहा कि जैसे करन थापर को अभी के अभी निगल ही जाएंगे. हद हो गई है. हम रसातल में ले गए हैं पत्रकारिता को. और फिर अपने भी लोगों को सुनने को तैयार नहीं हैं!!

लेखक जगमोहन फुटेला चंडीगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार हैं, जर्नलिस्टकम्युनिटी.कॉम के संपातक हैं. इनसे संपर्क This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है.


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