बिना कमाएं भला क्‍या क्‍या दिखाएं!

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तमाम खबरिया चैनलों का ध्यान अब पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़ और हिमाचल प्रदेश पर लग गया है। इसकी वजह से इन राज्यों में स्थानीय और क्षेत्रीय समाचार चैनलों की तादाद तेजी से बढ़ी है। इनमें केबल टीवी नेटवर्क के जरिये चलने वाले स्थानीय चैनल बिल्कुल अलग नजर आते हैं।

इन चैनलों के लिए कमाई का सबसे बड़ा जरिया स्थानीय स्तर पर मिलने वाले विज्ञापन ही होते हैं। इन्हें बटोरने की फिराक में इन चैनलों का पूरा ध्यान भी स्थानीय सामग्री और कार्यक्रमों पर ही रहता है। इस इलाके में फिलहाल 12 से 15 क्षेत्रीय चैनल हैं, जिनमें पीटीसी न्यूज, पीटीसी पंजाबी, जी पंजाबी, हरियाणा न्यूज, पीटीसी हरियाणा, एमएच1, टोटल टीवी (हरियाणा) प्रमुख हैं।

छोटे खबरिया चैनलों के इस काफिले में हाल ही में डे ऐंड नाइट न्यूज भी शामिल हो गया है। चंडीगढ़ से अगस्त 2010 में शुरू हुए इस चैनल पर अंग्रेजी, हिंदी और पंजाबी में बुलेटिन आते हैं और इसे कंसन न्यूज प्राइवेट लिमिटेड चला रही है। मजे की बात है कि चैनल शुरू होने के साथ ही इसने मीडिया संस्थान भी खोल लिया है। इस चैनल के प्रबंध निदेशक कंवर संधू ने कहा, 'मुझे हमेशा लगता था कि इस क्षेत्र की खबरों को गहराई और प्रमुखता से दिखाने के लिए क्षेत्रीय समाचार चैनल की बहुत जरूरत है। इसीलिए विश्वसनीय और अच्छी खबरें दिखाने के लिए हमने यह चैनल शुरू किया।'

हालांकि इन चैनलों के लिए सबसे बड़ी दिक्कत कमाई है। विज्ञापन विशेषज्ञों का कहना है कि इस इलाके में चैनलों की संख्या जिस तरह बढ़ रही है, उसमें विज्ञापन से होने वाली कमाई दिक्कत करेगी।देश के इस इलाके में विज्ञापन से आने वाले राजस्व के चलते भी क्षेत्रीय चैनलों की संख्या बढ़ाई है। हरियाणा के एक प्रमुख चैनल के विज्ञापन प्रमुख ने कहा, 'दरअसल इस इलाके में बाजार बहुत बड़ा नहीं है। इस बाजार में अगर कुल विज्ञापनों की बात करें तो उससे 55 करोड़ रुपये तक की कमाई हो पाती है। लेकिन इस कमाई में क्षेत्रीय और राष्ट्रीय चैनल दोनों ही हिस्सा लेते हैं। स्थानीय चैनलों का अलग इंतजाम होता है।'

उन्होंने कहा, 'कमाई में इजाफा भी अधिक नहीं होता है। पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़ और हिमाचल प्रदेश में 12 से 15 चैनल काम कर रहे हैं। ऐसे में आप आसानी से अंदाजा लगा सकते हैं कि बाजार से कितनी कमाई हो पाती है। विज्ञापन से होने वाली कमाई में इजाफा अभी दहाई के अंक तक भी नहीं पहुंच पाया है। ऐसे में आगे भी इन चैनलों को विज्ञापनों के लिए जूझना पड़ेगा।' विज्ञापन घट रहे हैं और जानकारों के मुताबिक ऐसे में कमजोर चैनल या स्थानीय चैनल धीरे-धीरे खत्म होते जाएंगे। साभार : बीएस


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