जैसे मेरी दिवाली नाश हुई, वैसे कभी पीके तिवारी की भी होगी

E-mail Print PDF

संजीव कुमार (काल्‍पनिक नाम, क्‍योंकि ये नहीं चाहते इनका और विभाग का नाम सामने आए) प्रज्ञा टीवी (महुआ ग्रुप का धार्मिक चैनल) में कार्यरत थे. चैनल में काफी समय से नौकरी कर रहे थे. अपने काम में माहिर थे. हालांकि चैनल के अंदर की स्थितियों से उनके मन में एक भय सा हमेशा बना रहता था, पर अपने काम और लंबे जुड़ाव के चलते उन्‍हें ये उम्‍मीद थी कि कोई भी निर्णय लिए जाने के पहले उन्‍हें बताया-पूछा जरूर जाएगा. ऐसा ही एक अंजाना सा डर और उम्‍मीद प्रज्ञा में काम करने वाले लगभग हर कर्मचारी के मन में है.

खैर, इन सब डरों से इतर संजीव और उनके जैसे कई लोग आने वाले त्‍योहारों को लेकर उत्‍साहित भी थे. दशहरा ठीक ठाक बीत गया था. उम्‍मीद थी कि दीपावली भी अच्‍छी होगी. उन्‍होंने तैयारी कर रखी थी कि दीपावली में क्‍या-क्‍या करना है. उनके बच्‍चों ने भी दीपावली पर कौन-कौन से पटाखे चाहिए, इसकी लिस्‍ट थमा दी थी. पत्‍नी ने भी नए चादर और पूजा के सामान लेने के बारे में अभी से बता दिया था. किसी ने अपने परिवार के साथ कहीं जाने का कार्यक्रम बना लिया था. प्रज्ञा में काम करने वाले लगभग सभी कर्मचारियों के घर में ऐसा ही माहौल था. सबने अपने परिवार वालों के साथ दीपावली मनाने के लिए योजनाएं तैयार कर ली थीं.

दीपावली को धूमधाम से मनाने की उधेड़बुन में लगे प्रज्ञा के ज्‍यादातर कर्मचारी उस रोज भी समय से अपने काम पर पहुंचे थे. आफिस में सब कुछ सामान्‍य लग रहा था. दोस्‍तों-सहकर्मियों से हाय-हैलो करते अपने-अपने डेस्‍क पर पहुंच गए थे. पर अभी वे ठीक से बैठे भी नहीं थे कि एचआर से बुलावा आ गया. यह घबराहट पैदा करने वाली बात थी. बारी-बारी से बुलाया जा रहा था. पहले जिसे बुलाया गया, उसकी सासें तेज हो चुकी थीं. कांपते कदमों से वो कांफ्रेंस रूम में बैठे एचआर हेड के पास पहुंचा. पहुंचते ही बताया गया कि मैनेजमेंट का आर्डर है, कास्‍ट कटिंग करनी है, इसलिए एक फार्मेट दिया जा रहा है, इसे भरकर मेल कर दीजिए, आपको रिजाइन करना है. उसने खुद को निकाले जाने का कारण पूछने की कोशिश की परन्‍तु एचआर कुछ भी सुनने-बताने को तैयार नहीं. मन में गुस्‍सा था, पर नौकर होने का डर भी दिल के किसी कोने में पनपे आवेग को बाहर लावा बनकर निकलने से रोक दिया. बल्कि ये लावा गर्म आंसू की शक्‍ल में आंखों के कोरों से टपक पड़े. कुछ जगहों पर शर्ट गीली हो चुकी थी. वो कांफ्रेंस रूम से बाहर निकल आया.  मन ही मन बोल चुका था- जैसे मेरी दिवाली खराब हुई है, वैसे ही कभी पीके तिवारी की भी होगी, ये मेरी बददुआ है.

तभी दूसरे का नाम बुलाया गया. फिर से वही कहानी. इधर एचआर और मैनेजमेंट के फैसले का तीखा नस्‍तर झेलकर आ चुके कर्मी से अंदर हुई बात जानने की अफरातफरी मच गई. सब जानने को बेचैन थे कि अंदर क्‍या हुआ होगा. थोड़ी देर संयत रहने की कोशिशों के बीच उसने कंपकपाती आवाज में बता दिया मैनेजमेंट का फरमान है विदाई का. सभी के चेहरे फक्‍क पड़ गए और निगाहें कांफ्रेंस रूम की तरफ टिक गईं. दूसरा शख्‍स भी गीली आंखों के साथ बाहर आ रहा था. एक-एक करके ग्यारह लोगों की बलि एचआर ने कास्‍ट कटिंग के नाम पर ले ली थी. इसके पहले भी कई लोग इस बेदी पर चढ़ चुके थे. किसी ने विरोध भी करने की कोशिश की तो उसके सामने अपनी मजबूरियों का पहाड़ आ गया. शायद यही सच है कि मीडिया में आवाज उठाने वाले इतने निरीह हैं कि अपने समर्थन में आवाज नहीं उठा सकते. कारण परिवार, बच्‍चे, माता-पिता, आगे की तमाम आर्थिक मजबूरियां और पचड़े न फंसने की मन:स्थिति.

प्रज्ञा में अब काम करने वाले कर्मचारी आधे मन से काम कर रहे हैं. बस वे एक दिन नौकरी बच जाने की चिंता में घर जा रहे हैं. अंदरुनी सूत्रों का कहना है कि अब पीसीआर से लगभग दो दर्जन कर्मचारियों को निकाले जाने की योजना है. इन्‍हें भी एक साथ नहीं बल्कि कई टुकड़ों में निकाला जाएगा ताकि विरोध का स्‍वर मुखर न हो सके. शूटिंग का काम बंद हो चुका है. कोई कार्यक्रम शूट नहीं हो रहा है. स्क्रिप्‍ट राइटिंग नहीं हो रही है. कॉपी राइटरों से पहले ही इतना लिखवा लिया गया है कि अगले दो महीनों तक किसी की जरूरत ही नहीं पड़े. संभावना जताई जा रही है कि पीसीआर के बाद एमसीआर तथा एडिटिंग के लोगों को भी बाहर का रास्‍ता दिखाया जाएगा. सबसे दुखद यह है कि यह सारी कार्रवाई बिल्‍कुल गैर-कानूनी तरीके से बिना कोई नोटिस या अतिरिक्‍त सेलरी दिए की जा रही है.

अब भी पीके तिवारी के इस चैनल में सब कुछ ऐसा ही चल रहा है. पत्रकारों को बंधुआ मजदूरों से भी निम्‍न समझने वाला शख्‍स कितना संवेदनहीन और भावनाशून्‍य है इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस शख्‍स ने कर्मियों को निकाले जाने के पहले उनकी दीवाली के बारे में भी नहीं सोचा. लगभग ढाई सौ कर्मचारियों वाले इस प्रज्ञा टीवी में अब आधे से कुछ ही ज्‍यादा कर्मचारी रह गए हैं. कास्‍ट कटिंग के नाम पर आए दिन छोटे-छोटे समूहों में इन लोगों को निकाला जा रहा है. कभी प्रज्ञा में चिकेन खाने के नाम पर तो कभी किसी और नाम पर कर्मचारियों की छंटनी की जा रही है. अभी भी कई दर्जन कर्मचारियों पर छंटनी की तलवार लटक रही है. सब अपनी दीवाली खराब होने के डर के बीच काम करने आ रहे हैं. इस बीच कुछ कर्मचारियों ने दूसरे ठिकानों की तलाश शुरू कर दी है, पर जिस तरह के हालात अन्‍य चैनलों में हैं, वो प्रज्ञा से कोई बहुत ज्‍यादा अच्‍छे नहीं हैं.

पीके तिवारी का पूरा ग्रुप ही अंदर से खोखला हो चुका है. पिछले दिनों पीके तिवारी के चैनलों और कंपनियों पर आईटी और ईडी के पड़े छापों के बाद से इस चैनल की स्थिति खराब है. खोखलापन सामने आ चुका है. लंदनवाली कंपनी में काफी संगीन तरीके से वित्‍तीय लेनदेन और घपलेबाजी, बैंक एवं बीमा कंपनियों से भी लेनदेन में घालमेल और गड़बड़ ट्रांजिक्‍शन की शिकायत पर यह कार्रवाई हुई थी. कई खातों को ईडी ने कुछ खातों को सील भी कर दिया था. इस मामले में जांच अभी भी जारी है. बताया जा रहा है कि इसमें पीके तिवारी की गर्दन पूरी तरह लपेटे में आने की संभावना है. अब खर्च समेटने के लिए ही पीके तिवारी अपने मानस पुत्रों के निर्देश पर चैनलों के तमाम कार्यालय बंद कर रहे हैं और कास्‍ट कटिंग के नाम पर छंटनी कर रहे हैं. बताया जा रहा है कि इन मानस पुत्रों ने लम्‍बी-लम्‍बी छोड़कर पीके को अपने शीशे में उतारा था. पूरी छूट, पूरी आजादी देने के बाद भी असली काम नहीं हो पाया और शीशा भी टूट गया है. अब इसी शीशे से कई लोग जख्‍मी किए जाने वाले हैं.

अपने नाम के अनुरूप यह पूरा ग्रुप महुआ के नशे में दिख रहा है. पत्रकारों को ताश के पत्‍तों की तरह फेंटने में माहिर पीके तिवारी अब तक कई अच्‍छे पत्रकारों को अपने हरम में रखना चाहते थे तथा उनके अपने काले-पीले-नीले धंधे के लिए लाइजिनिंग करवाना चाहते थे, परन्‍तु इन लोगों ने जब इनकार कर दिया या लाइजनिंग कर पाने में सक्षम नहीं हुए तो तिवारी जी ने बिना आव-ताव देखे एक झटके में बाहर का रास्‍त दिखवा दिया. हालांकि इनको निकाले जाने से पहले इन्‍होंने इनके हाथों छोटे पत्रकारों को निकलवाने का पाप भी करवाया. अब भी हालात ऐसे ही हैं. महुआ न्‍यूज, महुआ तथा प्रज्ञा चैनल से भी सीनियर लोगों के सिर पर हाथ रखकर छोटे लोगों को बाहर का रास्‍ता दिखवाया जा रहा है. वैसे चर्चाओं पर विश्‍वास करें तो पीके तिवारी एक बार फिर इतिहास दुहराने वाले हैं. आखिर आदत जो ठहरी.

एक पत्रकार द्वारा भेजा गया पत्र. उन्‍होंने अपना नाम और पहचान गुप्‍त रखने का अनुरोध किया है. उनके अनुरोध का सम्‍मान करते हुए उनका नाम और पहचान नहीं दिया जा रहा है.


AddThis