'देवा' ने कल रवीश कुमार की ज़िंदगी बख्श दी!

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मैं देवा हूं। यहां का देवा। चल कैमरा दे। टेप निकाल। ऐ आकर घेरे इनको। बाहर मत जाने देना। किससे पूछ कर अंदर आए। किसलिए शूट कर रहे हो। चल निकाल टेप और कैमरा दे। यहां से अब तू बाहर नहीं जाएगा। तू जानता नहीं मैं कौन हूं। मैं देवा हूं। मैंने बसाया है इनलोगों को। उजाड़ा नहीं है किसी। जाकर बाहर बोल देना कि देवा ने कैमरा ले लिया। लंबे कद का लोकल गुंडा। दोनों हथेलियां मरहम पट्टियों से ढंकी थीं। लगा कि पिछली रात उस्तरेबाज़ी में दोनों हाथ ज़ख़्मी हुए हैं। मैंने बोला कि इसमे चिप है,टेप नहीं है। आपके किसी काम का नहीं है। आप एक बार चला कर देख लो। कई लोगों ने मुझे घेर लिया था। देवा बार-बार बोल रहा था कि इनको बाहर मत जाने देना। मीडिया और सरकार ने नहीं मैंने तुम लोगों को बसाया है।

लोग भी हां में हां मिला रहे थे। आखिर देवा मान गया। मैंने कैमरे का चिप रिवाइंड कर दिया। अब टेप का इस्तमाल कम होता है। चिप पर रिकार्डिंग होती है। देवा ने हेडफोन पहन लिया। ध्यान से सुना। मैं बोल रहा था कि क्या हम कभी शहरी ग़रीबों की रहने की जगह को कानून-ग़ैर कानूनी दायरे से निकल कर मानवीय या अमानवीय संदर्भों में देखने की कोशिश करेंगे? इनके पास शौच के लिए जगह नहीं है। दो किमी से पानी भर कर लाते हैं। घर तक पहुंचने के रास्ते नहीं हैं। यह सुनकर देवा की आंखें चमक गईं बोला तू अच्छा इंसान मालूम होता है। बढ़िया पत्रकार है। चल इसे कैमरा दे दे। ये हमारी बात कर रहा है। इसको चाय पिला। फिर मुझे अपने कमरे में ले जाने लगा। बोला आओ कभी ग़रीबों के साथ चाय पी लो। मेरा नंबर ले जाओ। जो दिखाना है, दिखाओ। तुम्हारे इस कैमरे से देवा का कुछ नहीं बिगड़ेगा। बच गए तुम। हम लौट आए। देवा किसी बी टाइप फिल्म के दादा की तरह सबको बाय बोलकर अपने कमरे की तरफ चला गया। हमने चाय नहीं पी। मेरा नंबर ले लिया। अपना भी दे दिया।

फ़रीदाबाद के खोरी गांव में शूट कर रहा था। धीरे-धीरे अरावली के चट्टानों के नीचे मकानों की तरफ बढ़ गया। बिना सड़क की बस्ती थी। काफी अंदर चला गया। पीछे-पीछे लोग चले आ रहे थे। मना कर रहा था कि पीछे न आएं। रहने की मजबूरी आदमी को कहां-कहां ले जाकर बसा दे रही है। जिसके लिए आज भी देवा टाइप लोग पैदा हो रहे हैं। एक किस्म को अघोषित टैक्स दे रहे हैं ये लोग। गुंडों को। यहां तक कि वोटर आई कार्ड के नाम पर भी पैसे वसूल हो जाते हैं। डराया जाता है कि यह नहीं बनेगा तो झुग्गी परमानेंट नहीं होगी। दिल्ली साइड आया तो पता चला कि डीडीए और पुलिस मिलकर हर झुग्गी से दस-दस हज़ार रुपये वसूलते हैं। लोगों ने कहा कि हम यह झुग्गी खरींदें तो भी इन्हें इतने पैसे देने पड़ते हैं वर्ना ये आकर लैट्रिन तोड़ देते हैं और नया लैट्रिन का रेट ही दस हज़ार है। तभी हम अपने घरों में लैट्रिन बनवा सकते हैं। वर्ना जाइये खुले में। इनको कोई फर्क नहीं पड़ता है जी। डीडीए में भी देवा हैं। पुलिस में भी देवा है। मीडिया में भी देवा हैं। फंस जाते हैं कुछ हम जैसे फटीचर पत्रकार जिन्हें हर तरह के मानकों पर कस कर गरिया जाता रहता है।

ये सारी बातें रवीश कुमार ने अपने ब्लाग पर लिखकर प्रकाशित की है. इस रिपोर्ट से जाहिर है कि रवीश की जान खतरे में पड़ी थी. रोज जाने कितने ईमानदार पत्रकार इन सड़क छाप देवाओं से प्रताड़ना का प्रसाद पाते हैं. पर कहीं कोई सुनवाई नहीं होती क्योंकि सुनवाई करने वाले ही इन देवाओं के आका हैं. भयानक करप्ट हो चुके इस सिस्टम में लोकल गुंडों को कौन पालता पोसता है और किस तरह बेईमान पुलिस वाले, मक्कार पत्रकार भाई लोग इन देवाओं से महीना बांधकर चुप्पी साधे रहते हैं, यह सब रवीश कुमार की रिपोर्ट से जगजाहिर हो रहा है. जैसा दौर आ रहा है, उसमें ऐसे देवा दिन ब दिन बढ़ेंगे, कम न होंगे, क्योंकि पैसे पुलिस वाले को भी बनाने हैं और मीडिया वालों को, सो, बेईमानों का बोलबाला रहेगा, पढ़े-लिखे व ईमानदारों का यूं ही हर रोज मुंह काला हुआ करेगा....


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Comments (5)Add Comment
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written by vaibhav shiv, February 08, 2011
ya duaa hai un garibo ka , jinko dikha rahe aap , kitna nek hai vichar.
aap jaiso se jinda patrkarita , imandar ptrakar .
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written by ranjit, January 16, 2011
... ek aur udaharan Sankramankal ka. Har jagah Deva baitha hai aur Ravish jaise patrakar ka banana band hote jaa raha hai...
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written by rajesh chourasia (09424910001), January 16, 2011
sahi kaha ravis ji ne har kahi deva hai.....

ravish jaise hi patrkarita ko zinda rakhe hue hai...
bachpan me maine 1 gana suna tha...?

garibon ki suno vo tumhari sunega, tum ek paisa doge vo 10 lakh dega...

ravis ji ko b garib ki 10 lakh duayen mil rahi hai or milti rahengi......

patrakarita ko naya aayam or naye disha de rahe hai ravis ji.....

ravish ji ki riport dekh kr aankhen nam ho jati hai..........

kash main bhi aisha kr pata pr kya kru ek chota sastringer houn chah kr b kuch nahi kr sakta.....

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written by Abhishek singh, January 15, 2011
sir aap sahi hai lekin ye mat bhooliyega ki har 100 corrupt patrakaro me ek sacha bhi hoga jiske dar se baki 99 bhi paisa kamate samay darenge...... smilies/smiley.gif
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written by madan kumar tiwary, January 15, 2011
चलिये रवीश भाई जान बची । वैसे इस देश की राजधानी से लेकर मुहल्ले और गाम्व तक हर जगह ये देवा मौजूद हैं। मुम्बई की चाल हो या बिहार का ईंदिरा आवास । अब तो इन देवाओं को सम्वैधानिक दर्जा भी मिल गया है । ये मुखिया और पार्षद बनकर सरकारी अधिकारियों के संरक्षण में वह सबकुछ कर रहे हैं जो रवीश भाई के देवा ने किया । अगर दुसरे देवा के हाथ नही मारा गया तो आप देखना कुछ सालों बाद आपसे मुखिया देवा मुलाकात करेगा ।

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