खबरिया चैनलों की मजबूरी

E-mail Print PDF

एनके सिंहभारत में कुल 23.1 करोड़ परिवार हैं, जिनमें से 14.1 करोड़ परिवारों के पास टीवी सेट हैं. इन टीवी सेट रखने वाले परिवारों में 6.8 करोड़ परिवार शहरों में हैं और 7.3 करोड़ परिवार देहातों में. पर आपको यह जानकर ताज्‍जुब होगा कि ग्रामीण भारत में भले ही ज्‍यादा टीवी हों, आज एक भी टैम मीटर (या पीपुल मीटर), जिसमें दर्शकों की पसंद नापी जाती हो, ग्रामीण भारत में नहीं है. कारण, ग्रामीण भारत के पास पेप्‍सी, फ्रीज या महंगी कार खरीदने के पैसे नहीं हैं.

आपको कुछ और चौंकाने वाले तथ्‍य देते हैं. अहमदाबाद में, जिसकी आबादी महज 60 लाख है, टीवी कार्यक्रमों प्रति जन अभिरुचि नापने के लिए 180 मीटर हैं, जबकि समूचे बिहार (11 करोड़ आबादी) के लिए महज 165 मीटर और वह भी पिछले नौ माह में लगाए गए हैं. दस साल बिहार की जनता की रुचि को नजरअंदाज किया गया क्‍योंकि वहां की जनता के पास उपभोक्‍ता सामग्री खरीदने के लिए पैसा नहीं है.

आज स्थिति यह है कि देश के बड़े मेट्रोपोलिटन शहरों में कुल 2690 मीटर लगे हैं, जबकि पूरे भारत के 119 करोड़ लोगों के लिए केवल 5670 मीटर.

खबरिया चैनलों के संपादकों की समस्‍या यह है कि उनकी सफलता इस बात से आंकी जाती है कि उनके नेतृत्‍व में टीआपी (टेलीफोन रेटिंग प्‍वाइंट), जो इन मीटरों से नापी जाती है, कितनी बढ़ी है. जहां एक ओर वह ग्रामीण भारत की समस्‍या, किसानों की आत्‍महत्‍या, गरीबी, भुखमरी या फिर सरकार के अच्‍छे-बुरे कार्यक्रमों को दिखाना चाहता है, उसका प्रयास निरर्थक साबित होता है क्‍योंकि बड़े शहरों के उपभोक्‍ता संस्‍कृति से प्रभावित लोग राखी सांवत या लाइफ स्‍टाइल या लैक्‍मे फैशन शो से ऊपर अपनी अभिरुचि बढ़ा ही नहीं रहे हैं.

सूचना व प्रसारण मंत्रालय ने एक सार्थक कदम उठाते हुए एक समिति बनाई, जिसकी ताजा रपट में स्‍पष्‍ट रूप से कहा गया है कि इन मीटरों को ग्रामीण भारत में ले जाएं और इनकी वर्तमान संख्‍या 8000 से बढ़ाकर 30000 करें. यह एक सराहनीय कदम है. सरकार स्‍वयं नियंत्रण करने की जगह उद्योग को ही यह कार्य करने को बाध्‍य कर रही है. समूची दुनिया में टेलीविजन इंडस्‍ट्री का कुल राजस्‍व लगभग 45 लाख करोड़ रुपये या यूं कहिए कि पूरे विश्‍व के कुल जीडीपी का लगभग दो फीसदी है. उम्‍मीद है कि अगले तीन वर्षों में यह तीन गुना हो जाएगा. अर्थात भारत की कुल जीडीपी का लगभग तीन गुना और विश्‍व जीडीपी का लगभग छह फीसदी.

विश्‍व की सात प्रमुख कंपनियों न्‍यूज कॉरपोरेशन, एओएल टर्नर, वायकॉम, विवान्‍डी, बेर्टल्‍समैन, सोनी और डिज्‍नीलैंड का दुनिया के लगभग 75 फीसदी दर्शकों पर परोक्ष या प्रत्‍यक्ष रूप से कब्‍जा है. भारत के कई बड़े चैनलों में इनका स्‍वामित्‍व विभिन्‍न तरीकों से है.

बड़ी उपभोक्‍ता उत्‍पाद बनाने वाली कंपनियों से इनकी साठगांठ है और नजर है विकासशील देशों पर जहां की वृहत आबादी एक बड़े उपभोक्‍ता बाजार के रूप में इन कंपनियों को लुभा रही है. इनकी कोशिश है कि करीब 400 करोड़ की आबादी वाला विकासशील विश्‍व महज उपभोक्‍ता बनकर रह जाए.

इस कार्य को अंजाम देने की पहली शर्त है कि आदमी उपभोक्‍ता और केवल उपभोक्‍ता रहे. लिहाजा इनकी सोचने की शक्ति खत्‍म करना पहला कार्य था. इन कंपनियों को मालूम है कि अगर व्‍यक्ति सोचने लगा तो प्रश्‍न करेगा- कोका कोला क्‍यों, लस्‍सी क्‍यों नहीं? क्‍यों कार, मेट्रो क्‍यों नहीं? क्‍यों ब्रांडेड कपड़े, रेडीमेड कपड़े? क्‍यों नहीं दर्जी से बढि़या सिला अच्‍छे किस्‍म का सुविधाजनक पैंट?

तब हमारे दिमाग को कुंद करने के लिए आए हैवी मनोरंजन कार्यक्रम, अफीम की गोली की तरह. प्रजातंत्र में एक पब्लिक स्‍फीयर होता है, जिसमें संवाद, पारस्‍परिक अंतर्क्रिया, वाद-विवाद के लिए संस्‍थाएं बनाई गई थीं. जैसे संसद, विधानसभाएं, सेमिनार, जनता की रैली, चाय व पान की दुकान पर चर्चा. मीडिया की मूल भूमिका किसी स्‍वस्‍थ प्रजातंत्र में यह थी कि वह मुद्दों पर प्रतिस्‍पर्धी विचार का एक प्‍लेटफार्म तैयार करता था, ताकि लोग अपने मसायल को समझें, बात करें और जनमत तैयार करें. किसी भी प्रजातंत्र के बेहतर होने की पहली शर्त थी कि शासन संवाद और जनमत के जरिए चले.

इन कंपनियों को डर था कि एक सजग जनता पब्लिक स्‍फीयर में न केवल सरकार के कार्यक्रलापों पर नजर रखती है, बल्कि अपनी अभिरुचि को भी तर्क की कसौटी पर रख कर देखती है. तब कंपनियों को डर था कि उपभोक्‍ता संस्‍कृति का पनपना मुश्किल हो जाएगा. कनॉट प्‍लेस पर एक लड़का जब तक हाथ में पेप्‍सी लेकर नहीं चलता, उसे लगता है कि वह अपूर्ण है. इसी कनॉट प्‍लेस में एक दुकान है, जहां एक लाख रुपये से ऊपर की ही घडि़यां मिलती हैं.

लिहाजा, पहला काम था पब्लिक स्‍फीयर को ब्‍लॉक करना. यह उन्‍होंने बखूबी किया. आज वह जनता जिसने रोटी जीत ली है, इस उपभोक्‍ता संस्‍कृति के कब्‍जे में है. डांस इंडिया डांस, बिग बॉस की भारी आवाज पर कुत्‍ते-बिल्लियों की तरह व्‍यवहार करने वाले तथाकथित ऑइकन्‍स को देखकर पूरा समाज सोच के स्‍तर पर पंगु हो गया है.

सोता है तो राखी सावंत का डांस या मुन्‍नी बदनाम या शीला को देखकर और उठता है तो आईपीएल में कौन बिका देखकर. संडे की छुट्टी मॉल में बिता कर. और यह सब कैसे हुआ? भारत में हमेशा से मीडिया की एक अच्‍छी भूमिका रही है. जन जागरण से जनमत तैयार करने में, मुद्दों पर सत्‍ता को कठघरे में खड़ा करने में. इन कंपनियों के लिए जरूरी हो गया कि मीडिया के नए अवतार 'टेलीविजन' में न्‍यूज की भूमिका को खत्‍म करें. बड़ी चालाकी से इसे अंजाम दिया गया. लिहाजा आज न्‍यूज के नाम पर या तो सात बड़े शहरों की खबरें हैं या चुराए हुए मनोरंजन के कार्यक्रम.

लेखक एनके सिंह ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के महासचिव तथा साधना न्‍यूज के कनसल्टिंग एडिटर हैं. उनका यह लिखा लेख दैनिक भास्कर के नेशनल एडिशन में प्रकाशित हो चुका है. वहीं से साभार लेकर यहां प्रकाशित कराया गया है.


AddThis