छत्तीसगढ़ का न्‍यूज चैनल पुराण

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राजकुमारयह लेख किसी व्यक्ति विशेष पर केंद्रित न होकर प्रवृतियों को समझने का एक प्रयास मात्र है, फिर भी यदि किसी को बुरा लगता है तो मैं उससे फूलगोभी, आलू और मटर की सब्जी के साथ घी चुपड़ी हुई दो रोटी ज्यादा खाने का आग्रह कर सकता हूं। तो भाइयों.. जब छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण हुआ था तब सबको यही लग रहा था कि अब उनकी निकल पड़ेगी। दो-तीन अखबार वालों की दादागिरी से त्रस्त कुछ पत्रकार नुमा व्यापारियों को भी यह लगने लगा था कि बस थूंथने में अड़ाने वाला माइक और कैमरा लेकर आ जाओ सरकार हिल जाएगी।

शुरू-शुरू में ऐसा हुआ भी। भिलाई में लोहे की दलाली में जुटे एक व्यापारी ने एक प्रमुख चैनल में खबरों को भेजने के लिए कैमरा आदि को खरीद लिया। व्यापारी को इस बात से बिल्कुल भी मतलब नहीं था कि छत्तीसगढ़ किस ढंग से आकार ले रहा है। वह तो बस चैनल के सहारे भिलाई इस्पात संयंत्र से लोहे की अफरा-तफरी में लगा हुआ था। दिल्ली में चैनल के प्रमुखजनों को जब इस बात की भनक लगती तब तक देर हो चुकी थी। व्यापारी अपने मतलब के हिसाब से वारा-न्यारा कर चुका था।

राज्य निर्माण के शुरुआती दिनों में एक पत्रकार गोविंद साहू के पास एएनआई की एजेंसी थी। श्री साहू का जोर साफ्ट किस्म की स्टोरियों पर ही रहता था क्योंकि वे जिस एजेंसी के लिए काम करते थे, वह एजेंसी श्री साहू से स्टोरी लेकर ढेर सारे चैनलों को बेचने का काम करती थी। वैसे श्री साहू बेहद मेहनती पत्रकार थे ( हो सकता है कि वे कहीं और काम कर रहे हो) लेकिन उनके साथ ही यहां ईटीसी से अपने कैरियर की शुरुआत करने वाले उनके अपने एक रिश्तेदार की वह इमेज नहीं बन पाई जो बननी चाहिए थी। जब पूरे देश में एनडीटीवी की धमाकेदार शुरुआत हो रही थी तब श्री साहू के रिश्तेदार को छत्तीसगढ़ का ब्यूरो प्रमुख बनाया गया था, लेकिन खबर है कि बाद में लेनदेन संबंधी विवाद के चलते उन्हें छत्तीसगढ़ छोड़ना पड़ा।

बताया जाता है कि श्री साहू के रिश्तेदार ने अर्धशासकीय दफ्तर में कार्यरत एक महिला के कथित बयानों की सीडी हासिल कर ली थी। इस सीडी के आधार पर वे एक प्रमुख नेता के अत्यंत करीबी को ब्लैकमेल कर रहे थे। जब यह शिकायत नेताजी के पास पहुंची तो उन्होंने सीधे एनडीटीवी के दफ्तर में बात की। मामले में जांच-पड़ताल हुई और श्री साहू के रिश्तेदार को नौकरी से हाथ धोना पड़ा। नौकरी गंवाने के बाद श्री साहू के रिश्तेदार ने भोपाल के एक साप्ताहिक का संवाददाता बन अफसरों के घर में अखबारों को फिंकवाया भी, लेकिन कहते हैं न जो जलवा एक बार अपनी ईहलीला समाप्त कर लेता है वह फिर दोबारा पैदा नहीं होता। यहां भी ऐसा ही हुआ। चैनल के पत्रकार को दुआ सलाम करने वाले अफसरों ने अखबार को पलटना भी जरूरी नहीं समझा।

वैसे राज्य निर्माण से कुछ पहले प्रदेश में सबसे ज्यादा बोलबाला ओपन आइस का ही था। इस चैनल को यहां शिवसेना के छत्तीसगढ़ प्रमुख धनजंय परिहार संचालित किया करते थे। चैनल अच्छा-खासा चल रहा था कि इसमें काम करने वाले मीडियाकर्मियों ने एक धमाकेदार करतूत कर डाली। वैसे इसे करतूत कहना ही ठीक होगा क्योंकि जब कोई खबर प्रसारित होने के बजाए वर्जन के नाम पर किसी और तरह की सुविधा तलाशने लगती है तो फिर गड़बड़ी हो ही जाती है। चैनल के कर्ताधर्ताओं ने एक रेस्ट हाउस में प्रदेश के एक मंत्री और छत्तीसगढ़ी फिल्म की बेहद प्रतिभा संपन्न हिरोइन को कुछ ऐसे-वैसे अन्दाज में पकड़ लिया था।

बताते हैं कि मंत्री के नए तेवर को सार्वजनिक करने की धमकी-चमकी चल ही रही थी कि चैनल के दफ्तर में छापा पड़ गया और ओपन आइस अचानक आकाश चैनल में तब्दील हो गया। वैसे प्रदेश में आकाश चैनल की शुरुआत बहुत तामझाम के साथ हुई थी, लेकिन चैनल की ज्यादातर खबरें सरकार के पक्ष में ही प्रसारित होती थी। थोड़े ही समय में विपक्ष का यह आरोप भी सामने आ गया कि चैनल में कांग्रेस के प्रमुख नेता अजीत जोगी का पैसा लगा हुआ है। विपक्ष के इस आरोप के बाद भी चैनल चलता रहा। चैनल ने अपना काम तब समेटा जब अजीत जोगी का नाम विधायकों की खरीद-फरोख्त में सामने आया और भाजपा की सरकार काबिज हुई। हालांकि भाजपा की सरकार काबिज होने के बाद एक मंत्री के भाई ने भी ईरा फिल्म्‍स के संचालक संतोष जैन के साथ मिलकर सीसीएन अभीतक नाम से एक चैनल खोला। यह चैनल यहां रायपुर के रामसागरपारा में संचालित होता रहा। बाद में श्री जैन ने चैनल से नाता तोड़ लिया। उनके नाता तोड़ने के बाद एम चैनल की शुरूआत हुई। बताते हैं कि अब इस चैनल ने एक बड़े अखबार समूह के साथ पार्टनरशीप कर ली है।

राज्य निर्माण के शुरुआती दिनों में यहां जैन टीवी और रोजाना के पत्रकार भी किराए का कमरा लेकर रहते थे। जैन टीवी बंद होने के साथ ही चैनल के साथ जुड़ाव रखने वाले पत्रकारों का आशिया भी उजड़ गया। दिल्ली के एक प्रमुख कांग्रेसी नेता ने बीएलजी नाम की एक कंपनी खोल रखी थी। इस कंपनी के चैनल रोजाना के लिए दिल्ली के एक युवा पत्रकार समरेंद्र खबरें बनाया करते थे। व्यवस्था से हमेशा नाराज रहने वाले समरेंद्र ज्यादा दिनों तक छत्तीसगढ़ में नहीं रह पाए। जोगी के शासनकाल में ही स्टार न्यूज के दिनेश आकुला ने शानदार पारी खेली थी। बताते हैं कि एक रोज किसी नेता के पुत्र ने उनसे कह दिया यदि वे सरकार के पक्ष में खबर दिखाएंगे तो वे सरकार से उन्हें चंदूलाल चंद्राकर की स्मृति में गठित किया गया दो लाख रुपए का पुरस्कार दिलवा सकते हैं।

वर्ष 2003 के आसपास घटित इस वाकए को लेकर तब राजनीति के गलियारों में खूब चटखारें लगा करते थे। कुछ समय बाद उनका भी चैनल की नौकरी से मोहभंग हो गया। बीच में यह खबर आई थी कि वे अपना खुद का चैनल खोलने के बारे में सोच रहे हैं। इधर एक स्थानीय अखबार में उनकी खबरें हैदराबाद डेड लाइन से कभी-कभार देखने को मिल जाती है। ईटीवी के लिए प्रवीण सिंह ने काफी अच्छी पारी खेली। इन दिनों वे सहारा समय में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। जब उन्होंने ईटीवी को अलविदा कहा तो भोपाल के एक बड़बोले पत्रकार प्रफुल्ल पारे ने ईटीवी की जवाबदारी संभाली। वे भी लंबे समय तक ईटीवी में नहीं रहे। श्री पारे के बाद संजय शेखर ने यहां लंबी और अच्छी पारी खेली लेकिन जैसे ही उन्हें यह आभास हुआ कि अब टीवी की बागडोर राजस्थान के सेवानिवृत अफसर जगदीश कातिल संभालने वाले हैं, उन्होंने साधना का दामन थाम लिया। खबरों की विश्वसनीयता के मामले में साधना ने दो स्थानीय चैनल सहारा और ईटीवी को पीछे छोड़ दिया है।

भाजपा के दूसरी बार सत्ता में काबिज होने के कुछ दिन पहले यहां छत्तीसगढ़ में पुलिस अफसर रहे रूस्तम सिहं ने भी एक चैनल के जरिए दस्तक दी थी। इस चैनल की कमान हिंदी के प्रसिद्ध कवि गजानन माधव मुक्तिबोध के पुत्र दिवाकर मुक्तिबोध ने संभाली थी, लेकिन कुछ ही दिनों में चैनल ने दम तोड़ दिया। यहां काम करने वाले कर्मचारी कई दिनों तक तनख्वाह के लिए भटकते रहे। दिल्ली के मित्तल बंधुओं ने वाइस चैनल की शुरूआत की थी। त्रिवेणी ग्रुप का यह चैनल न तो देश में रंग जमा पाया और न ही छत्तीसगढ़ में।

प्रदेश में अब भी क्राइम न्यूज, रायपुर एक्सप्रेस, चैनल-वन, आईबीएन सेवन, टाइम्‍स नाउ, एचएम-वन, प्रखर टीवी, इंडिया टीवी, साधना चैनल, आजतक, एएनआई, न्यूज 24, ग्रांड चैनल, इनसाइट टीवी, एवी विजन सहित लगभ दो दर्जन चैनलों की दस्तक बनी हुई है, लेकिन अब भी कभार यह सुनने को मिल जाता है कि अमुक चैनल में उड़ीसा के सांसद का पैसा लगा हुआ है, तो किसी चैनल के रिपोर्टर के बारे में यह कहा जाता है कि वह सिमगा के पास आरटीओ के उड़नदस्ते की फिल्म बनाने में लगा हुआ था। एक चैनल के रिपोर्टर के बारे में तो यह कहा जाता है कि वह मात्र होली के दिन ही भांग खाता है और कपड़े फाड़-फाड़कर नाचता है। भांग खाकर तमाशे मचाने वाला रिपोर्टर जिस चैनल से जुड़ा हुआ है उस चैनल को कई पत्रकार अंतिम प्रणाम कर चुके हैं।

लेखक राजकुमार सोनी छत्‍तीसगढ़ के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं तथा इस समय रायपुर में हरिभूमि अखबार से जुड़े हुए हैं.


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