वरना बंद हो जाएंगे ज्यादातर चैनल

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: 365 दिन चैनल ने तो शुरुआत भर की है : चैनल चलाने के लिए कुछ टिप्स : सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार से मामूली खानापूर्ति एवं चंद पूंजी निवेश के बाद कोई भी व्यक्ति या संस्था आज अपना चैनल शुरू करने के लिए स्वतंत्र है. ऐसे व्यक्ति या संस्था को चैनल चलाने के लिए जरूरी सामान्य ज्ञान की भी जरूरत नहीं है.

एक जिद्दी या नटखट बच्चे की तरह अपनी जिद पूरी करने के लिए चैनल की शुरुआत तो कर दी जाती है, लेकिन इसे सुचारू रूप से चलाने के लिए किसी भी तरह के रिसर्च, डाटा कलेक्शन, भविष्य की सुदृढ़ योजना इनके पास नहीं होती है. अगर बात बिहार एवं झारखण्ड के सन्दर्भ में करें तो पिछले चार महीनों में तीन नए समाचार चैनल की शुरुआत हो चुकी है. (इनका नाम लेना शायद जरूरी नहीं है) इनमे दो चैनल सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए प्रसारित हो रहे हैं. आने वाले समय में (2011 के बचे हुए महीनो में) तीन और नए चैनलों को इस प्रदेश से लांच करने की तैयारी हो रही है.

यह शायद ऐसा ही है "उसकी साड़ी मेरी साड़ी से सफ़ेद कैसे", इस पूरे प्रकरण में अंततः मौत होती है इन चैनलों के कर्मचारियों की. इन चैनलों के प्रमोटर यह मानने लगते हैं या फिर उन्हें सपना दिखा दिया जाता है कि चैनल की अपलिंकिंग शुरू हुई नहीं की उनके पास विज्ञापनों का भरमार लग जाएगा जिससे वह दूसरा चैनल शुरू करेंगे, फिर तीसरा, फिर चौथा...... मुंगेरी लाल के हसीन सपने........ इन्हें समझना होगा एक चैनल को चलाने के लिए जरूरी अर्थगणित. अर्थगणित जितना कमजोर होगा, चैनल उतना ही गड़बड़ होगा.

इस अर्थगणित को समझा "महुआ" के मालिकानों ने. इसका नतीजा सबके सामने है और जिन मालिकानों ने इस अर्थगणित को नहीं समझा उनके नाम बताने की जरूरत नहीं है. आये दिन आपको उनकी खबर मिलती रहती होगी. कितनी बेचारगी झलकती है जब खबर बनानेवालों के बारे में खुद खबर बनने लगे. किसी भी चैनल को चलाने के लिए जरूरी है कम से कम एक साल की पुख्ता प्लानिंग और दो साल की फॉरवर्ड प्लानिंग. कंटेंट, फॉर्मेट, स्पेशलाइजेशन, डिस्ट्रीब्यूशन, विज्ञापन... सभी विभागों की पुख्ता प्लानिंग.

साथ ही साथ जरूरी है महानगरों में पहुंच. डीटीएच सेवा के जरिये या फिर ट्रेडिशनल माध्यम से क्योंकि इन महानगरों से आता है विज्ञापन का एकमुश्त पैसा. चैनल चलाने के लिए चिन्दीचोरी से काम नहीं चलता है..... ऐसे में जरूरत होती है लगातार एकमुश्त लम्बे-चौड़े विज्ञापन कैम्पेन की.... नहीं तो फिर जारी होगा रिपोर्टर पर विज्ञापन लाने का दबाव..... विज्ञापन के लोगों पर गैर-जरूरी दबाव......... और फिर इन सबों के बाद शुरू होती है ब्लैक मेलिंग..........

ऐसे जितने भी चैनल होंगे (वर्तमान या भविष्य) जिनके पास महानगरों से रेवेन्यू लाने का जरिया होगा, वही चैनल आनेवालों दिनों में सफल हो पायेगा अन्यथा ''365 दिन'' चैनल ने तो शुरुआत की है....... यह तो बस एक ट्रेलर भर है........पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त.......

लेखक कुंदन कृतज्ञ मौर्या टीवी, रांची में सहायक महाप्रबंधक-विज्ञापन के पद पर कार्यरत हैं.


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