लेमन की बदहाली कथा

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: लेमन न्यूज में न्यूज एडिटर रहे रवि पारीख की जुबानी इस चैनल के अंदर की असली कहानी : स्टाफरों व स्ट्रिंगरों की 50 लाख रुपये से ज्यादा की सेलरी डकार गया है आरकेबी :  अपनी बीवी को 25 लाख रुपये की कार गिफ्ट देकर भूखे कर्मियों के जले पर नमक छिड़का : झूठ बोलने में महाउस्ताद आरकेबी ने स्टाफरों व स्ट्रिंगरों को रुलाया :

: चार-चार महीने से बिना सेलरी के काम कर रहे हैं लोग : जिसकी भी नियुक्ति हुई, उसे कभी न नियुक्ति पत्र मिला और न सेलरी स्लिप : टीडीएस हर महीने काटते रहे पर सर्टिफिकेट कभी नहीं दिया : लेमन के आफिस की कई बार बिजली कटी, फोन लाइन ठप, आफिस का किराया देना बंद : ये कंपनी नहीं, आरकेबी की दुकान है जिससे सिर्फ आरकेबी का घर भरता है :

ये लेमन टीवी की कहानी है. उस लेमन टीवी की कहानी जिसके बारे में कभी आपके यहां अच्छी-अच्छी खबरें और इस चैनल का विज्ञापन छपा करता था. मुझे पता है आपके रिश्ते आरकेबी से बेहद अच्छे हैं लेकिन यह पत्र मैं इस उम्मीद से भेज रहा हूं कि आप इसे जरूर प्रकाशित करेंगे ताकि लेमन टीवी के पीड़ितों को न्याय मिल सके, उनका हक मिल सके, उनका दुख कम हो सके और उन्हें ये महसूस हो सके कि उनके साथ दुख के इस दौर में कोई खड़ा है.

लेमन टीवी या कहो लेमन न्यूज, अब तक लोगों की आंखों में धूल झोंकता आ रहा है. क्या है ये सारी बात. लेमन की दास्तान हम आपको बताते हैं. लेमन के दो बास हैं. एक- जहीर अहमद और दूसरे राजीव बजाज जिन्हें आरकेबी कहा जाता है.  आन पेपर सिर्फ जहीर अहमद चैनल के मालिक हैं पर हकीकत तो ये है कि जहीर सर सिर्फ कागजों पर चैनल के मालिक हैं, असल में लेमन में सारे निर्णय लेते हैं मिस्टर बजार और लेमन की सारी जिम्मेदारी है मिस्टर बजाज की. जहीर सर लेमन के लिए एक भी निर्णय नहीं लेते. आरकेबी ने कहीं से फाइनेंस (तकरीबन 20 करोड़ रुपये) का जुगाड़ किया और हो गया चैनल शुरू. जिसकी बदौलत ये चैनल शुरू हुआ, मतलब जिसने इस चैनल में पैसा लगाया, वो आज भी रो रहा है. उसके बाद जितने भी लोगों ने मिस्टर बजाज को फाइनेंस किया, शायद ही किसी का पैसा वापस मिला होगा. चलो, ये तो बड़े लोगों की बात हो गई, बात करते हैं चैनल में काम करने वाले कर्मचारियों की.

लेमन न्यूज में लोगों की नियुक्ति का दौर शुरू हुआ और लोगों का आना भी शुरू हो गया. मिस्टर बजाज ने मार्केट से ज्यादा सेलरी आफर कर लोगों को लेमन में नियुक्त किया. सभी लोगों को पहली दो-चार सेलरी समय पर मिली, बाकी बाद के दिनों में सेलरी की जगह वादे मिलना शुरू हुआ. नवंबर 2009 में तो ऐसी नौबत आ गई कि कोई कर्मचारी काम करने को तैयार नहीं था. तब जहीर अहमद और राजीव बजाज, दोनों बहुत टेन्शन में थे. पर तकदीर ने एक बार फिर साथ दिया और एक बार फिर से फाइनेंस का जुगाड़ हो गया. एक धर्मगुरु के अनुयायी की कंपनी से फाइनेंस मिला और स्टाफ को सेलरी मिली. यहां तक तो सब ठीक था. जितने पैसे आए, आपस में बांट लिए. फरवरी 2010 से सेलरी लटकाने का दौर फिर शुरू हो गया. फरवरी 2010 से दो-तीन महीने काम कराने के बाद एक महीने की सेलरी दी जाने लगी, ताकि कोई काम छोड़कर चला न जाए.

कई लोग चले गए पर उन लोगों को उनकी पेंडिंग सेलरी आजतक नहीं दी गई. सभी मिस्टर बजाज को अपनी सेलरी के लिए रिक्वेस्ट करते रहे और बदले में बजाज की तरफ से पाजिटिव जबानी रिप्लाई मिलता रहा, लोगों को आस थी कि मिलेगी सेलरी पर नतीजा जीरो. एक बात कहता हूं कि लेमन के सभी स्टाफ ने अपनी दीवाली और ईद लाचारी से मनाई है और ये सच्चाई है, दूसरों से लोन लेकर स्टाफ ने अपने त्योहार मनाये हैं. जिसका फेमिली बैकग्राउंड अच्छा है, वो इस उम्मीद से इस चैनल में बने रहे कि आज नहीं तो कल, कभी ना कभी तो पेमेंट मिलेगा. पर ऐसा हुआ नहीं. लोगों को गुस्सा तब आया जब राजीव बजाज ने 25 लाख की गाड़ी खरीदी और अपनी बीवी को गिफ्ट दे दी. जो लोग लेमन के आफिस में काम कर रहे हैं, उनकी बहुत बुरी आर्थिक स्थिति है, जो स्ट्रिंगर हैं, उनकी हालत तो इनसे भी बुरी है क्योंकि स्टाफ को तो कभी-कभी पांच हजार रुपये की किश्त मिल जाती थी पर स्ट्रिंगर को कभी पैसा नहीं मिला. ये कहानी हर जगह है. चाहें महाराष्ट्र हो या उत्तर प्रदेश या पंजाब हो या गुजरात.

किसी भी स्टेट के प्रतिनिधि को अपना पेमेंट नहीं मिला है. स्टाफरों व स्ट्रिंगरों का कुल पेमेंट जोड़ दिया जाए तो लगभग 50 लाख रुपये से उपर ये फीगर पहुंच जाएगी. कहने को लेमन न्यूज चैनल है पर यहां दो बार नान-पेमेंट की वजह से बिजली काट दी गई थी. टेलीफोन तो कई बार पंद्रह-पंद्रह दिन तक काटे गए. आजकल भी सभी फोन लाइनें काट दी गई हैं. चैनल में लगे सभी फोन्स के इनकमिंग और आउटगोइंग बंद है. ड्राइवर और प्यून तक की सेलरी ये खा गए हैं. मिस्टर बजाज सिर्फ बातें करते हैं और बातों से ही दूसरों को चुप रखते हैं. इसी कारण कोई उनके सामने तो बोलता नहीं पर अंदर ही अंदर सब उन्हें गालियां देते हैं. मिस्टर बजाज के रहने की स्टाइल देखो, रुआब देखो तो ऐसा लगता है कि देश का सबसे बड़ा नागरिक हो, पर इनसे अच्छा तो एक पान वाला है जो अपना व्यापार ईमानदारी से करता है. आप सोचो, पचास लाख रुपये से ज्यादा का वेतन ये बजाज खा गया और डकार भी नहीं ले रहा है. उपर से लोगों को अभी भी भरोसा दिला रहा है कि मैं सेलरी दूंगा. कब दोगे, जवाब मिलता है- कल. पर ये कल कभी आता ही नहीं है.

राजीव बजाज पांच हजार रुपये की सेलरी वाले कर्मचारी को छुट्टियों के दिन में चैनल में रुकने और काम करने को कहते हैं और जब घर जाने का समय आता है यानि रात 12 बजे तो उससे कह देते हैं कि पैसा कल मिलेगा. सुबह से आया इंसान रात तक रुक कर बिना सेलरी के ही घर जाता है. दो-तीन घंटा आफिस के बाहर बिठाकर रखने की तो राजीव बजाज की पुरानी स्टाइल है. चैनल के लिए जिन लोगों ने इक्विपमेंट रेंट पर दिए हैं, वे लोग भी परेशान हैं. कुछ तो इक्विपमेंट वापस उठा ले गए हैं. दीवाली में दूधवाले ने दूध देना बंद कर दिया था. इतना सब होता रहा पर मिस्टर बजाज को कोई फर्क नहीं पड़ता था, उनकी एय्याशी बरकरार थी. इसी चैनल में काम करने वाली एक लड़की को 45 हजार रुपये प्रति माह पगार दिया जाता है. वो क्या काम करती है, ये आज तक किसी को नहीं पता. संभवतः सिर्फ बजाज साहब को मालूम होगा कि वो क्या काम करती है. हां, उस लड़की को हर महीने की सेलरी मिलती रही है, चाहे वो आफिसियल तरीके से मिले या अनआफिसियल तरीके से.

पर पुरुष कर्मचारियों की बात करें तो ऐसा कोई नहीं है जिसकी भावनाओं के राजीव बजाज ने खिलवाड़ न किया हो. बल्कि कहें कि दूसरों की भावनाओं से खेलना राजीव बजाज का पेशा है तो गलत नहीं होगा. चैनल से जितने लोग गए हैं, वो सभी पेमेंट नहीं मिलने की वजह से छोड़ गए हैं. एक और बात सुनिए. यहां किसी की नियुक्ति आन पेपर नहीं है. किसी को कोई लेटर नहीं मिलता. न ही सेलरी स्लिप मिलती है. अब तक जितनी भी सेलरी दी गई है उसमें टीडीएस काटा गया है पर टीडीएस सर्टिफिकेट किसी को भी नहीं दिया जाता. कुछ लोगों का, जिनको ये अपना कहते हैं, उनका नाम सेलरी लिस्ट तक में भी शामिल नहीं किया जाता. उनको आफिस में बुलाकर अलग से पेमेंट किया जाता है. कोई हिसाब नहीं है इन बातों का.  ऐसा नहीं लगता कि ये एक कंपनी है. ऐसा लगता है कि किसी व्यक्ति (मिस्टर बजाज) के यहां हम निजी काम कर रहे हैं, उनके लिए मेहनत करो, सुबह से रात तक, 14 से 18 घंटे मेहनत करो और सेलरी जो मिलनी चाहिए वो भी ये मालिक खा जाए तो कैसा लगेगा, बस यही लगता है कि यहां पर.....

मेहनत करो और मिस्टर बजाज का घर भरो. दिवाली में शिरडी के स्ट्रिंगर भुजबल राजेंद्र को आफिस बुलाया गया, वो आफिस भी आया. उसके पास आने के लिए भी पैसे नहीं थे तो किसी से लोन लेकर आया. दिन भर उसे बैठाकर रखा और रात में बोल दिया कि पैसा नहीं है. उस स्ट्रिंगर के आंखों से निकल रहे आंसू भी मिस्टर बजाज को नहीं दिखे. लोगों को कहा जाता है कि अपना बैंक एकाउंट नंबर एसएमएस करो, पैसे बैंक में डाल दिया जाएगा, कसम है आज तक उन्होंने किसी का पैसा जमा करवाया हो. लेमन में आज पांच मारुति कार हैं. सभी खड़ी हैं. रिपोर्टर और कैमरामैन ना होने की वजह से ये गाड़ियां बाहर नहीं जाती हैं.

आफिस में गुजरे हुए जमाने के कंप्यूटर हैं जो मकान मालिक की देन है. आफिस रेंट पर है. उस मकान मालिक के साथ रेंट न देने के कारण कोर्ट में मामला चल रहा है. मिस्टर बजाज ने एक आफिस उसी बिल्डिंग में सेवेंथ फ्लोर पर लिया था, सिर्फ परसनल यूज के लिए. उस आफिस को भी उसके मालिक ने भाड़ा न मिलने के कारण वापस ले लिया. इस परसनल आफिस के बारे में शायद बहुत कम लोगों को पता होगा. यहां सिर्फ बड़े और खास (दिल बहलाने वाले) लोगों को ले जाया करते थे. क्या किया जाए ऐसे झूठे और नीयत में खोट रखने वाले इंसान का. मर्यादा में लिख रहा हूं वरना यहां बुरे से बुरे शब्द भी कम पड़ जाते.

बेरोजगार इतने हैं कि नए लोग यहां आते रहेंगे और बुरे-दुखद अनुभवों के साथ अपनी मुंडी कटवाकर चले जाएंगे. ये सब कब बंद होगा? क्या कोई है? इंसान एक बार फंसता है, पर सच्चाई ये भी है कि फंसने वालों की किधर कमी है, पर मुझे भगवान पर पूरा भरोसा है कि उसकी लाठी और मजबूरों की बद-दुवाएं जब पड़ेगी तो उसमें आवज तक न आएगी. मिस्टर बजाज की ऐय्याश लाइफ के बारे में लिखना उचित नहीं है, इसलिए नहीं लिखा. पर कहानी यहीं खत्म नहीं होती है दोस्तों. फिर मिलेंगे, जल्द ही. इसी जगह.

आभार
रवि पारीख
पूर्व न्यूज एडिटर
लेमन न्यूज
मुंबई

संपर्क : This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it


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