डीडी न्यूज़ में सुधार की कोशिश अब शायद ही हो

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: यहां मामला 25 एंकरों-करस्पाडेंटों के सामने सिर्फ नौकरी जाने, रोज़ी-रोटी का संकट या सड़क पर आ जाने का नहीं, बल्कि उस ज़िल्लत का भी है जो उन्हें झेलना पड़ रहा है : न्याय इसी सिद्धांत पर टिका होता है कि भले ही सौ मुजरिम छूट जाए, लेकिन किसी एक निर्दोष को सज़ा नहीं होनी चाहिए। क्या न्याय का ये सिद्धांत अमली जामा पहनने की हैसियत रखता है? मीडिया अपने तमाम उपलब्धियों पर खुश हो ले, लेकिन अपने पत्रकारों की दुर्दशा पर वो क्या कान देने को तैयार है?

ढूंढने जाएं तो पत्रकारों की दुर्दशा के ढेरों किस्से हर चैनल, हर अखबार में मिलेगें। ये भूमिका उस अदालती मामले के संदर्भ में है जो दूरदर्शन समाचार के 25 पत्रकारों पर पिछले दो सालों से थोप सा दिया गया है। पिछले 13 सितंबर को माननीय केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (कैट) की मुख्य बेंच ने ठेके पर लिए गए 25 एंकर-करस्पौंडेंट की नियुक्ति को समाप्त करने का फैसला दिया, मामला हाईकोर्ट गया। लेकिन, पीड़ित पक्ष (एंकर-करस्पौंडेंट) ने मामले की पूरी सुनवाई कि समीक्षा करने का अनुरोध कैट से किया। आधार था कि 25 में से 20 एंकर-करस्पौंडेंट को नोटिस तक नहीं मिला, न ही दूरदर्शन समाचार ने कोई औपचारिक सूचना देने की ज़रूरत समझी।

वो भी तब जब ठेके के लोगों को एक नियत समय अवधि के लिए नियुक्त करने वाले पेशेवर कैट के न्यायिक दायरे में आते हैं कि नहीं, इसे शायद नज़रअंदाज ही कर दिया गया। मामला था प्रसार-भारती जैसी स्वायत्त संस्था द्वारा हायर-एंड-फायर पद्धति पर पेशेवरों को ठेके पर नियुक्त करना। जहां आपको सिर्फ काम के बदले फीस दी जा रही है, बिना किसी अन्य सुविधा के। फरवरी, 2009 को नियुक्त हुए एंकर-करस्पौंडेंट की नियुक्ति को ऐसे व्यक्ति चुनौती देते हैं जो खुद सारी नियुक्ति प्रक्रिया से गुज़रते हैं, अपने लिए सिफारिशों और पैरवी की पुरज़ोर कोशिश करते हैं, लेकिन उच्चारण में ‘स’ ‘श’ में भेद न कर पाने वाला व्यक्ति प्रतिष्ठित दूरदर्शन में पेशेवरों की नियुक्ति को चुनौती देता है। यहां बता दूं, कि इस नियुक्ति को चुनौती देने वाले ऐसे लोग हैं, जिन्होंने अपनी याचिक में अपनी पहचान गलत बताई, गलत तथ्य बताएं। ताकि न्यायाधिकरण को गुमराह किया जा सके। इसमें वो काफी हद तक सफल भी रहे।

गौर करने वाली बात ये भी है कि सितंबर 2008 में प्रसार-भारती ने पहली बार एक ऐसी खुली प्रक्रिया की शुरुआत की जिससे पेशेवर और सक्षम लोग राष्ट्रीय प्रसारक दूरदर्शन समाचार की समाचार वाचन और रिपोर्टिंग की गुणवत्ता को बढ़ा सके। क्योंकि ऐसी तमाम चिंताएं थी कि संस्थान के पास सिर्फ शिफ्ट व्यवस्था से एंकरों को बुलाया जाता था। जिनकी कोई ज़िम्मेदारी न तो खबरों को लेकर थी न ही संस्थान की गुणवत्ता से। क्योंकि फरवरी, 2009 के पहले मौजूद ज्यादातर एंकर खबरों की रेलमपेल में उस क्षमता का प्रदर्शन नहीं कर पा रहे थे जिसकी न्यूनतम ज़रुरत होती है (जैसे की लाइव समाचार बुलेटिन में संवाददाता/विशेषज्ञों से सवाल करना, फील्ड में खबर तलाशना या मुद्दे की समझ और सामान्य ज्ञान की जानकारी होना।)।

प्रसार-भारती पहली बार एक प्रक्रिया के साथ सामने आया। इस प्रक्रिया में दूरदर्शन के बड़े अधिकारियों के अलावा बाहर से भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर के पत्रकार को भी शामिल किया गया ताकि निष्पक्षता और गुणवत्ता बनी रहे। कई ऐसे लोग चुने गए जो निजी और सरकारी दूसरे राष्ट्रीय टीवी चैनलों में अपनी सेवाएं दे रहे थें, वो भी उच्च मानकों को पूरा करते हुए। प्रसार-भारती ने भरसक कोशिश की कि अच्छे लोग आएं। ऐसा हुआ भी, लेकिन ऐसे लोग जिन्हें दूरदर्शन समाचार की व्यवस्था पहले से रास आ रही थी सकते में आ गए। क्योंकि पारदर्शी व्यवस्था में उनके हथकंडे धरे से धरे रह गए। बहरहाल, 25 एंकर-करस्पौंडेंट पिछले दो साल से चाहे लोकसभा चुनाव हो या दूसरे विधान सभा चुनाव, गंभीर चर्चा-बहस पर आधारित चर्चाएं हों, दैनिक कवरेज हो या कॉपी लिखना जैसी ज़िम्मेदारियां विपरीत परिस्थितियों में अपनी भरपूर क्षमता का परिचय देते हुए अंजाम दे रहे हैं।

लेकिन, नियुक्ति के पहले दिन से ही उन पर सौतेला और अदालती चक्कर का अनचाहा बोझ डाल दिया गया। इन सबसे पीछे कारण था, मिलने वाला वेतन या कहें फीस। संस्थान में कई बाबुओं और यथास्थिति से फायदा उठाने वाले एंकरों और रिपोर्टरों को ये ज़रा भी रास नहीं आया कि आया कि कैसे किसी एंकर-करस्पौंडेंट बेहतर पैसे (फिर भी मौजूदा मार्केट रेट से कम ही) मिल सकते हैं। जबकि उसी समय डीडी न्यूज़ में लोगों की सैलरी में 60 फीसदी तक का इज़ाफा हुआ। आज हालात ये हैं कि प्रताड़ना से शिकार कई एंकर-करस्पौंडेंट अपने भविष्य गहरी आशंका में हैं। पिछले दिनों माननीय कैट ने अपने फैसले की समीक्षा करने की याचिका खारिज कर दी। यहां मामला 25 एंकर-करेस्पांडेंटों के सामने सिर्फ नौकरी जाने, रोज़ी-रोटी का संकट या सड़क पर आ जाने का नहीं, बल्कि उस ज़िल्लत का भी है जो उन्हें झेलना पड़ रहा है।

पिछले सितंबर में जब माननीय कैट ने अपना फैसला दिया तो डीडी न्यूज़ में ही महत्वपूर्ण पद पर बैठे और खुद याचिकाकर्ता ने अपनी पहुंच का फायदा उठाते हुए एक एंकर जो स्टूडियों में खबर पढ़ने जा रही थी स्क्रिप्ट के साथ अदालत का कागज भी पहुंचवा दिया। बड़ा सवाल ये भी है कि कैसे याचिकाकर्ता जो ख़ुद ठेके पर दूरदर्शन में काम कर रहा है, कैसे संस्थान की इतनी लानत-मलानत के बाद उसी संस्थान को चुनौती दे रहा है। जहां ख़ुद वो सिफारिशों के रास्ते पहुंचा और रोज़ी-रोटी कमा रहा है। दूरदर्शन भी इस मामले पर चुप ही है।

रोज़ाना की कवरेज और ड्य़ूटी से लेकर हर जगह सौतेलेपन के शिकार इन पत्रकारों का हश्र क्या होगा कोई नहीं जानता, लेकिन इतना तो तय है, डीडी न्यूज़ में अब आगे शायद कोई सुधार की कोशिश नहीं होगी। जुगाड़ व्यवस्था चलती रहेगी। वॉयस ऑफ इंडिया के कई पत्रकारों का हाल या वहीं के वरिष्ठ पत्रकार अशोक उपाध्याय की मौत को लोग भूले नहीं होंगे। ये दवाब उस भविष्य को लेकर ही था, कि आगे क्या। बार-बार यही सवाल उठता है कि पत्रकार कैसे खुद पत्रकारों की उन्नति में बाधा डाल रहे हैं। यहां इस खबर कि कवरेज को लेकर भी कई चिंताएं हैं। इस मामले में एक पक्षीय मीडिया मैनेजमेंट खूब दिखा और दिख रहा है।

डीडी न्यूज़ में बैठे याचिकाकर्ता ने अपने संपर्कों का फायदा उठाकर सारे एंकर-करस्पोंडेंटों की खुब लानत-मलानत मीडिया में करवाई। लेकिन, इस लेख से पहले दूसरा पक्ष ग़ायब ही रहा, न किसी खबरनवीस ने ये जहमत ही उठाई। एक बार सवाल और छूटता है कि क्या कभी चैनलों में चयन प्रक्रिया का कोई तय ढांचा बन पाएगा, क्योंकि आज कोई भी चैनल अपनी नियुक्ति प्रक्रिया और पारदर्शिता को लेकर दावा करने की हालत में नहीं है। इस पूरे घटनाक्रम का संदेश यही है कि जब राष्ट्रीय प्रसारक (डीडी न्यूज़) की कोशिश को हतोत्साहित करने की सुनियोजित कोशिश हो रही है, तो अपने व्यवसायिक आग्रहों को लेकर चलने वाले निजी चैनलों में नियुक्ति प्रक्रिया की बात ही छोड़ दी जाए।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित


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