पब्लिक को बेवकूफ बनाने में लगे रहे दोनों रीजनल चैनल

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गत दिनों छत्तीसगढ मे नक्सलियों द्वारा अगवा जवानों को छोड़े जाने पर मध्‍य प्रदेश-छत्तीसगढ के दो रीजनल चैनल आपस में भिड़ गये. अपने को सर्वश्रेष्ठ बताने के लिये लग गए ढिंढोरा पीट कर दर्शकों को बेबकूफ़ बनाने में. एक ओर पहला चैनल जिसे अपनी मुहिम बता कर दर्शकों का भरोसा तोड़ रहा था तो दूसरा चैनल भी कहां पीछे रहता भला, तो उसने भी ठान लिया कि हमें भी यही करना होगा नहीं तो टीआरपी दूसरा ले जायेगा.

बस फ़िर क्या था लग गये अपने मुंह मिया मिठठू बनने में. जवानों को रिहा कराने में लगे खुद अपना पीठ ठोंकने. अपने आप को चौथा स्तंभ बता लोगों के हक की लड़ाई लड़ने का दावा करने वाले इन चैनलों का क्या यही सच है. अब लोग भला कैसे न्याय की उम्मीद करें इनसे..। खास बात तो ये रही कि दोनों चैनल एक ही समय पर ये करतूत कर जनता का भरोसा तोड़ रहे थे. यही वजह है कि आज टीआरपी की दौड़ में चैनल भले ही ऊपर हो जायें पर दर्शकों की नज़रों में वे लगातार पिछड़ रहे हैं. मजबूरी है जनता की कि उसे अंधों में काने राजा से ही काम चलाना पड़ रहा है. आखिर वह किसे सच माने और किसे झूठ.

साधनासहारा


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