न्यूज चैनलों के पागलपन से दहशत में हैं अरुंधति

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अमेरिका की पोलिटिकल और सोशल मैग्जीन 'गेरनिका' के फरवरी, 2011 के अंक में अरुंधति राय का एक लंबा इंटरव्यू छपा है. इंटरव्यू लेखक हैं अमिताव कुमार. कई मामलों में ये शानदार इंटरव्यू है. इस इंटरव्यू को बेहद सरल, सहज तरीके से पेश किया गया है, और पढ़ते हुए लगता है कि जैसे आंखों के सामने इंटरव्यू चल रहा हो. अरुंधति राय बहुत शानदार महिला हैं, बहुत उम्दा चिंतक हैं, बेहद संवेदनशील मनुष्य हैं, इसमें कोई दो राय नहीं है.

इसमें दो-राय वही रखेगा जिसकी समझदानी औसत या संकीर्ण है. और ये औसत व संकीर्ण टाइप के जीव हर समाज में भारी मात्रा में पाए जाते हैं क्योंकि कालजयी होना कुछ एक लोगों का काम होता है, और ऐसे कालजयी लोगों में से हैं अरुंधति. तभी कालजयी अरुंधति आजकल के फर्जी दरो-दीवारों, सोच-विचारों से परे एक बेहतर, सेंसटिव दुनिया और समाज के बारे में सोच-बोल-लिख पाती हैं, और बदले में, जैसा कि हर दौर में होता रहा है, बहुत आगे सोचने वालों को तत्कालीन बौना समाज फूंकताप गरिया लतिया कर बराबर कर देता है, वही अरुंधति राय के साथ भी होता रहा है और इसी टाइप का उत्पीड़न वह आजकल की अपढ़ मीडिया, सौदागर नेता, कम दिमाग जनता से झेल रहीं हैं.

इस मनःस्थिति का बयान पूरी शिद्दत से इस इंटरव्यू में किया गया है. अरुंधति इस इंटरव्यू में वर्तमान समाज, मीडिया से मिले सदमों के बारे में काफी कुछ कहती हैं. वे टाइम्स नाऊ न्यूज चैनल को पागल, सनकी चैनल मानती हैं जिसका दक्षिणपंथी संपादक भावनाओं को भड़काकर कुछ भी कराने को तत्पर रहता है और हर पल एक ओबी वैन उनके घर के सामने खड़ा रखता है ताकि वह मूर्खतापूर्ण सवाल पूछ-पुछवा कर अरुंधति को देश विरोधी और भावनाओं को भड़काने वाली महिला साबित कर सके. और ऐसा करके  देश में एक उन्माद पैदा कर सके जिसके नतीजे में मुद्दों पर संवेदनशील ढंग से बहस कम हो पाए, और मरने-मारने का माहौल ज्यादा क्रिएट हो.

कई अंतरराष्ट्रीय चैनलों के अपने अनुभवों को अरुंधति शेयर करती हैं और बताती हैं कि कितने बेहूदा बेहूदा किस्म के सवाल पूछे जाते हैं जिनका कोई उत्तर हो ही नहीं सकता. वे बताती हैं कि किस तरह धर्मांध मीडिया वाले, धर्मांध नेता और लुटेरे आपस में मिले हुए हैं और सबकी दुकानें संयुक्त रूप से चलती है लेकिन जनता के सामने ये अलग-अलग रूप में प्रकट होकर नैतिकता की बातें करते हैं.

इस इंटरव्यू में एक जगह अरुंधति राय बताती हैं कि दो वर्ष की उम्र में उन्होंने एक बार अपने पिता को 'चूतिया' कह दिया था. अरुंधति को यह प्रकरण उनके पिता ने ही बताया था. तब उनके पिता असम के एक चाय बागान में नौकरी करते थे और एक दिन अचानक दुर्घटनावश उनका सिगेरट छू गया जिससे तमतमाई अरुंधति ने पिता को चूतिया कह डाला. हालांकि दो वर्ष की उम्र में अरुंधति को देखने वाले उनके पिता दुबारा उनसे तब मिले जब वो 25 साल की हो चुकी थीं और मिलते ही उन्होंने अरुंधति से पूछा था कि क्या तुम अब भी उतनी ही गंदी भाषा का इस्तेमाल करती हो? ऐसे अनेकों किस्से और यादें हैं, जो अरुंधति ने इंटरव्यू में बयान किया है. पूरा इंटरव्यू इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं- The Un-Victim


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