मायावती मानसिक तौर पर असुरक्षाबोध की शिकार हैं : सुनीता चौधरी

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सुनीता चौधरी: दिल्ली की पहली महिला आटो चालक 'न्यूज एक्सप्रेस' वर्कशाप में जर्नलिस्टों से रूबरू हुईं : सुनीता बोलीं- महिलाएं तभी मजबूत हों सकेंगी जब पुरुषों की सोच बदलेगी : मीडिया से उम्मीद- कुछ ऐसा जरूर कीजिए कि लोगों का भला हो : दिल्ली की पहली महिला ऑटो चालक सुनीता चौधरी जब ऐसी दलीलें सामने रखती हैं तो उनमें गजब का आत्मविश्वास और हालात को परखने की ताकत दिखाई देती है।

न्यूज़ एक्सप्रेस चैनल के 'मंथन' कार्यक्रम में पत्रकारों से रूबरू होते हुए उन्होंने समाज की कड़वी सच्चाइयों के तमाम किस्से साझा किए। सुनीता अपने अतीत को पीछे छोड़ कर सिर्फ आगे बढ़ने की बात करती हैं। यूपी के एक छोटे से गांव से निकली इस लड़की ने जीवन के फलसफे किताबों से नहीं सीखे। पढ़ाई तो हाईस्कूल में ही छूट गई पर हिम्मत है कि अब तक साथ देती चली आ रही है। रूढ़ियां, दकियानूसी सोच और ऊपर से लड़की होना रास्ते में न जाने कितनी बाधाएं थी पर उसने सबको मात दी और जीवन का रास्ता तैयार किया ताकि खुद उस पर फासले भी तय कर सके।

ये महज़ इत्तेफाक ही था मंथन में सुनीता का आना और उसी दिन अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस का पड़ना। महिला सशक्तिकरण का मसला उठा और सुनीता के जवाब से सभी चकित हो गए। जवाब था कि इससे क्या होने वाला है, सारे प्रयास धरे के धरे रह जाएंगे अगर पुरुषों की मानसिकता में बदलाव नहीं आता।  उसे महिला का सम्मान करना सीखना होगा। उन्होंने कहा कि महिलाओं को राजनीति में सक्रिय होना चाहिए और समाज की बेहतरी के लिए काम करना चाहिए। मायावती आपको कैसी राजनेता लगती हैं। सुनीता के दिमाग में पहले से ही इस सवाल का जवाब मौजूद था किसी सधी सोच के साथ जैसा जवाब मिलना चाहिए वैसा ही मिला। जवाब था मायावती मानसिक तौर पर असुरक्षाबोध की शिकार हैं। जो काम बाद की पीढ़ी को करना चाहिए वे भी कर डालना चाहती हैं। इशारा अपनी मूर्तियां लगाने की तरफ था। फिर धीमे से ही ये भी कह डाला कि जनता के पैसे की बर्बादी है। उन्होंने कहा कि मायावती भी तभी आगे बढ़ पाई क्योंकि उन्हें कांशी राम का साथ मिला।

सुनीता हालांकि दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की प्रशंसक हैं लेकिन दिल्ली के हालात से वे बेहद खफा हैं। उन्होंने कहा कि एक अकेली लड़की के लिए दिल्ली में रहना बेहद मुश्किल है। लोग जीने नहीं देते। जब उनसे सवाल किया गया कि मुश्किल हालात में आपके साथ कौन खड़ा हुआ? तो उनका जवाब बेहद दार्शनिक लगा, पर था सटीक। वे बोलीं- मुसीबत में कोई भी साथ खड़ा नहीं होता। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही था। कार्यक्रम से जाते जाते सुनीता पत्रकारों को नसीहत देते गई कि कुछ ऐसा जरूर कीजिए कि लोगों का भला हो। प्रेस विज्ञप्ति


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