आजाद न्‍यूज में हड़ताल फिर शुरू, नहीं आए चेयरमैन

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आजाद न्‍यूज के कर्मचारी एक बार फिर हड़ताल पर चले गए हैं. कल आश्‍वासन दिए जाने के बावजूद चेयरमैन के न आने पर सारे कर्मचारी गेट के सामने जमा हो गए हैं. काम पूरी तरह ठप हो गया है. चैनल के वरिष्‍ठ भी अब अपने केबिन से बाहर नहीं निकल रहे हैं. कर्मचारी आक्रोशित हैं. मौके पर तनाव की स्थिति बनी हुई है. चैनल को व्‍हील पर डाल दिया गया है, लिहाजा प्रसारण चालू है.

आजाद न्‍यूज के कर्मचारी कल शाम दो महीने के वेतन तथा पीएफ का मामला स्‍पष्‍ट किए जाने को लेकर हड़ताल पर चले गए थे. इस दौरान चैनल भी ब्‍लैक आउट रहा. आक्रोशित कर्मचारी किसी भी सीनियर की बात मानने को तैयार नहीं थे. बाद में चेयरमैन एमएस वालिया के पिता जी के समझाने तथा आज दोपहर बारह से दो बजे के बीच में चेयरमैन के मिलने के आश्‍वासन के बाद सभी कर्मचारी हड़ताल खतम कर काम पर वापस लौट गए थे.

ताजा जानकारी यह है कि आज तीन बजे तक चेयरमैन के न आने पर आजाद न्‍यूज के सभी कर्मी फिर हड़ताल पर चले गए हैं. उन्‍हें आश्‍वासन दिया गया कि चेयरमैन छह बजे तक आएंगे. पर कर्मचारी मानने को तैयार नहीं हैं. खबर दिए जाने तक सभी विभागों के कर्मचारी हड़ताल जारी रखे हुए हैं. इन लोगों का कहना है कि जब तक चेयरमैन नहीं आएंगे, हड़ताल जारी रहेगा.


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Comments (8)Add Comment
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written by Aman, March 23, 2011
Gd Gd..... ye sab to hona hi chahiye.... agar sab me dam ho aur kisi ki na phate to........

Bt har koi kaha karta hai.... most of to fattu hi hoti hai......
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written by मधुकर राजपूत, March 17, 2011
16 मार्च की रात को पता लगा कि आज़ाद न्यूज़ में क्रांति का बिगुल फूंक दिया गया। सुनकर अचंभा हुआ तो खुशी भी। आखिर हमारे पत्रकार साथियों को ट्यूनीशिया और मिस्र की आज़ादी की ख़बरें लिखते-लिखते जोश आ ही गया। इस 'औचक क्रांति' के लिए सभी साथियों को बधाई। मैं इस घटना को औचक क्रांति ही कहूंगा क्योंकि जिस तरह यह दमनकारी प्रयत्नों के बिना अपने आप घुट गई इससे यह एक क्रांति कम और उन्माद ज्यादा लगती है। सुसंगठित होकर न्यूज़ रूम से निकले हमारे साथियों ने आख़िर दमनकारी प्रशासन के खिलाफ स्वतःस्फूर्त क्रिया छोड़कर एक भीड़ की शक्ल कैसे अपना ली? क्यों असंगठित हो गए? जिन साथियों ने ज्यादतियों के खिलाफ मुखर स्वर में विरोध दर्ज किया वो बाहर आने के बाद क्यों चुप हो गए ? मेरी जानकारी में आए घटनाक्रम के मुताबिक यह शर्मनाक रहा कि इस क्रांति के प्रणेता ही पूंजीपति के केबिन में जाने के बाद उनकी दारू और मुर्गे में तल्लीन हो गए। एक कहावत है कि ज़ुबान खाए और आंख लचे। तो क्या इस क्रांति के दमन के पीछे महज़ यही एक कहावत रही है? अपना पलड़ा भारी होने के बावजूद एकता क्यों चरमरा गई? हालात फिर वैसे ही हैं। दमनकारी प्रशासन ने उन्माद को दारू और मुर्गे से ठंडा करके सबकी एक-एक कर ख़बर ली। क्योंकि, मेरी जानकारी में आए तथ्यों के मुताबिक चैनल की वाइस प्रेसिडेंट तानया वालिया ने सबके मोबाइल स्विच ऑफ कराकर अपने टेबिल पर रखा लिए और उसके बाद हमारे उन्मादी क्रांतिकारियों से बात की।
सवाल यह है कि हमारे साथी उनकी शर्तों को मानने के लिए कुर्सी छो़डकर क्रांति करने उठे थे या अपने हक़ मांगने के लिए? ये 'तहरीर चौक' पहुंचे भी और शासन के सामने सशर्त झुककर उसी की तहरीर मान बैठे। मुझे इस चैनल के चेयरमैन की प्रतिक्रिया भी बताई गई। जिसने आते ही कहा कि, 'तुमने हमारा क्या उखाड़ लिया हड़ताल करके'। मुझे अफसोस है कि आज भी मेरे साथियों के पास कोरे आश्वासनों के अलावा कुछ नहीं है। हालांकि उनको वेतन तो दिया गया लेकिन कर्मचारी कल्याण के नाम पर आज भी संस्था उनसे छलावा ही कर रही है। सही है कि पैसा जीवन के लिए सबसे जरूरी चीज़ है लेकिन ये पैसा भी इसी औचक क्रांति की बदौलत हासिल हुआ था जिसका दामन मेरे दोस्तों ने उसकी जवानी में ही छोड़ दिया। फौरी फायदों में खुश होने की वज़हें तो हैं लेकिन आगे फिर इन्हीं हालात का सामना करने को मजबूर होना पड़ेगा। क्योंकि इस संस्था के प्रशासन और अफसरों की तानाशाही से आप सब वाकिफ़ हैं।
यह समीक्षा का वक्त है और इसलिए बेहतर है दोस्तों की इसी जज़्बे को कायम रखा जाए और अपने हक़ के लिए इस लोकतांत्रिक अधिकार का इस्तेमाल किया जाए। जो जज़्बा आपने दिखाया है उसके लिए मेरा सलाम।
बस अब ज़रूरत है जूझने की और जूझने की सनक पैदा करने की। मेरी शुभकामनाएं।
अंत यह भी कहता चलूं कि इससे पहले 'मधुकर' के नाम से दी गईं टिप्पणियां किसी 'मधुकर' की ही होंगी मधुकर राजपूत की नहीं।
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written by Raj, March 16, 2011
In lo budget ke channels me to ye roj-roj ke kahani hai, lekin sawal ye hai ke agar channelk chalana bus ke batt nahi to is dukaan ko band kyun nahi kar dete ho, khood or samaj ko kyaun dhoka de rahe ho maalik
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written by RAKESH RANJAN, March 16, 2011
चेयरमैन का चमचा साला पतला सूखा मूंछों वाला बहुत बदमाश है ,एक एक पल की जानकारी चेयरमैन के परिवार को दे रहा था मेरा ये गद्दार भाई
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written by ur friend, March 16, 2011
azad news ke karmchaiyo ne hadtal par ja kar bahut achcha kiya hai.lekin bandhuoo keval hadtal se kaam nahi chalega iss tarah ke malikon ke khilaf FIR darj karani hogi aur inhe muhtod jawab dena hoga kyoki brodcostaro ne patrakaron ko kamjor samajhliya hai aur issi liye ye aisa baar baar karte hai keval channel ka naam badalta hai lekin harkate nahi badalti.... inhe ye pata hai ki labor kanoon jurnalisto par lagu nahi hota hai aur na ye itni dur tak jayenge 10 din ki salary pakda do phir daud kar chale aayenge ..brodcostar ko ye pata hai ki dusaoo ki awaz ko uthane wale ye journalist khud apni awaz nahi utha pate hai aur na hi samne kuch boolte hai...issiliye journalisto ko kaam ke badle paise na dena malikon ki niyat banti ja rahi hai isse sabhi prabhavit hai lekin boolta koi bhi nahi hai..jabki ye keval azad news ka mamla nahi hai ye sabhi journalist bhaiyon ka mamla hai aur isme sabhi ko journaliston ko inlongo ka saath dena chahiye.....
media me upar baithe longo ko bhi ye yaad rakhna chahiye ki aaj agar brodcastar(channal malik) aisa kar raha hai to uske peeche kahi na kahi upar baithe journalist ka dimag hai jo malik se kahta hai ki keval mujhe meri salary dedijiye sir ye niche wale kuch nahi kar payenge aur niche baitha aadmi sochta hai ki sir hai na yaha paisa nahi mila to kya hua sir kahi aur jayenge to hame naukary to de hi denge....
senior journalisto se anugrah hai ki vo isstarah ke chalan ko aage na badhaye isse unhi ko taklif hoge aur aap issbaat se parchit bhi hai top post par ye wada karke aate hai ki mai 10 saste admiyon me channel chal dunga ye bool kar aate jarur hai lekin kitne dino ke liye sayad 10 din ya phir 10 week ya adhik se adhik 10 maheena ....ye field to aise hi aisthir thee aap longo ne itni teji se anajana kiya ki kissi layak hi nahi rah gayi hai....thoda sochiye aur azad news ki iss ladai ko patrakaron ke astitva ki ladai ke roop me dekhiye....
dhanyawad...
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written by awadhesh kumar, March 16, 2011
It’s clear that there is nobody is lesion, who lesion everybody. Azad is the perhaps first national news channel,where the most of employee is not documented…
Strike should be continue to get own right.......
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written by raju reporter, March 16, 2011
azad k patrakaro apne hak ki larai jari rakhna.patrakaro ko dihari ka majdur samjne wale walia,nadim aur kamkant ko sabak sikhana jaruri hai..ap k hak ki awaj purjor tarike se uthaney k liye bhadas aur us k sampadak yaswant ji ki jitni tarif ki jaye wo kam hai..azad k patrakar bhaio walia and compny ko thukai karo jaisa deradun k lala manish varma ki thokai ki gai thi........aakhir me yashwant ji ap se niwedan hai ki ap isi tarah patrakaro ki awaj uthate rahe kyo ki bade channel ya samacharpatro k patrakaro ki bat to duniya sun leti hai lekin chote channel ya akhbaro me kam karne wale laogo ki awaj sirf bhadas hi uthata hai...ummid hai ki aagey bhi ap apne is mishan ko jari rakhengey
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written by C.K.TIWARI, March 16, 2011
Azad chanel ne sabhi ko azad kiya to. Free ki Azadi me assa hi hota hai.

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