योगेश शीतल ने आईआईएमसी को भेजा अपना जवाब

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सेवा में, पाठ्यक्रम निदेशक, हिन्दी पत्रकारिता विभाग, भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली। महाशय, निवेदन पूर्वक सूचित करना है कि 9 अप्रैल की शाम मैं इंडिया गेट पर मनाई जा रही खुशियों में शामिल होने अपने कुछ दोस्तों के साथ पहुंचा था। चूंकि अन्ना हजारे के अनशन के दौरान हमलोग जंतर-मंतर पर और राम मनोहर लोहिया अस्पताल में लगातार बने रहते थे इसलिए ज्यादातर मीडियाकर्मियों से हमारा परिचय हो चुका था और उनसे एक व्यावहारिक रिश्ता बन चुका था।

इंडिया गेट पर जब हमलोग भीड़ से आपस में जंतर मंतर पर बिताई गई रातों की कहानियां साझा कर रहे थे। इसी बीच एक पत्रकार वहां आए और उन्होंने हमसे कहा कि आपलोगों को बरखा दत्त बुला रहीं हैं। उन्होंने यह भी कहा कि बरखा लड़कों से बात कर उनके विचार जानना चाहती हैं। मैं उस पत्रकार को चेहरे से जानता हूं लेकिन उनका नाम नहीं जानता। जंतर-मंतर पर मैंने उन्हें कई बार देखा था।

हमलोगों में कुछ ने बरखा के पास जाने से इनकार कर दिया और नीरा राडिया प्रकरण की चर्चा करते हुए बरखा की पत्रकारिता पर कई सवाल खड़े कर दिए। कुछ ही देर में हमलोगों में आपस में बरखा को लेकर गर्मागर्म बहस शुरू हो गयी। अन्त में आम सहमति बनी कि बरखा दत्त यहां आकर अपने दामन पर लगे दाग धोना चाहती है और बहती गंगा में हाथ धो रहीं हैं। अगर बरखा को यहां से नहीं खदेड़ा गया तो वह अपने मकसद में कामयाब हो जाएंगी।

हमलोग एक साथ वहां पहुंचे जहां बरखा एक ग्रुप प्रोग्राम कर रही थी। प्रोग्राम लाइव था। हमलोग इस आंदोलन का अन्त बरखा दत्त के शो से करने को किसी कीमत पर तैयार नहीं थे। इसी बीच हमलोगों ने वहां कुछ लोगों को नीरा राडिया प्रकरण के बारे में बताना शुरू किया। लाइव प्रोग्राम होने के कारण हमलोग सामने कैमरे के सामने आकर कुछ करने से बच रहे थे। लोगों के जागरूक होते ही हमें जनमत मिल गया और हमने नारेबाजी शुरू कर दी।

नारेबाजी शुरू करते ही एनडीटीवी के बाउंसरों ने मेरे साथ हाथापाई शुरू कर दी। उन्होंने मुझे धक्का देकर गिराना चाहा लेकिन दोस्तों ने मुझे संभाला। हाथापाई के दौरान उपर के जेब में रखी मेरी डायरी, कलम और कुछ पैसे गिर गए। हाथापाई के बाद एनडीटीवी वालों ने पुलिस की मदद से हमें पीछे धकेलना शुरू किया। इसके बाद हमलोगों ने बरखा के खिलाफ जोर-जोर से नारेबाजी शुरू कर दी।

हल्ला होते देख अफरातफरी मचने लगी और दूर खड़े लोग भी वहां आकर 'बरखा दत्त दलाल है','नीरा यादव की दलाल बरखा दत्त वापस जाआ', 'कॉरपोरेट मीडिया मुर्दाबाद', 'भारत माता की जय' जैसे नारे लगाने लगे। बरखा को लेकर लोग इतने गुस्से में थे कि बरखा को पीछे से भागना पड़ा और कैमरा समेट कर बरखा का पूरी टीम वहां से चलती बनी। इस पूरे घटनाक्रम के दौरान मैंने या मेरे किसी भी दोस्त ने कोई हिंसा नहीं की।

बरखा के भाग जाने के बाद जब मैं अपनी डायरी और कलम ढूंढ़ने अकेला घटनास्थल पर आया तो पुलिस ने मुझे पकड़ लिया और एक लड़की के पास ले गई जो वहीं पुलिस वैन के पास खड़ी थी। उस लड़की के साथ कई लड़के थे। मैंने उन्हें देखते ही पहचान लिया था कि वो एनडीटीवी के स्टॉफ थे। वो लोग काफी गुस्से में थे। बाद में मुझे ट्वीटर के माध्यम से पता चला कि उस लड़की का नाम रुबी ढींगरा है। रूबी एनडीटीवी से जुड़ी हैं।

रुबी ने पुलिस के समक्ष मुझपर कई आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि मैंने उन्हें पीटा है और उनके साथ बदसलूकी की है। रूबी के साथ खड़े लड़कों ने खुद को तुरंत प्रत्यक्षदर्शी बताते हुए रूबी के आरोप की पुष्टि भी कर दी। मैंने पुलिस वालों के समक्ष कहा कि बरखा को यहां से खदेड़ने के कारण ये लोग मुझे फंसाना चाह रहे हैं। जिस पर रूबी ढींगरा ने कहा कि उसका एनडीटीवी से कोई रिश्ता नहीं है।

इसी बीच कुछ लोग जिन्होंने बरखा के खिलाफ नारेबाजी की थी वहां जुटने लगे और वापस 'भारत माता की जय' के नारे लगाने लगे। भीड़ जुटती देख एनडीटीवी के लड़के वहां से खिसक लिए। लोगों की मदद से मैं वहां से छूट पाया। मुझे आशंका है कि एनडीटीवी मेरा और भारतीय जनसंचार संस्थान का नाम धूमिल करने के लिए एक सुनियोजित तरीके से अपनी एक महिला स्टॉफ को माध्यम बना रहा है। मेरे द्वारा उठाए गए कदम पूर्णतः संवैधानिक थे और मैंने अपने मौलिक अधिकार का इस्तेमाल किया था।
महाशय, मैं आपको सूचित करना चाहता हूं कि-

क)  इंडिया गेट पर बरखा दत्त का विरोध मैंने लोकतांत्रिक तरीके से किया था और इसका उद्देश्य किसी को व्यक्तिगत क्षति पहुंचाने का नहीं था.

ख)  मेरा विरोध अनुशासित और संतुलित था। ये आरोप आधारहीन और दुराग्रह से प्रेरित है कि मैं वहां काफी आक्रामक था.

ग)  रुबी का यह आरोप कि मैंने उन्हें पंच किया था,  उस आरोप से मेल नहीं खाता जो उन्होंने पुलिस के समक्ष दिया था। मैं उनके इस आरोप का खंडन करता  हूं.

घ) पुलिस ने अपने स्तर से जांच कर और प्रत्यक्षदशिर्यों के बयान के आधार पर मुझे जाने दिया था।

श्रीमान का विश्वासी

योगेश कुमार शीतल

हिन्दी पत्रकारिता,

क्रमांक-39


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