सुरेश कलमाड़ी गिरफ्तार, मीडिया और जनता जीती

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भ्रष्टाचार के कुछ मामलों में सुरेश कलमाड़ी की गिरफ्तारी देश में चल रहे भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान को ज़बरदस्त ताक़त देगा. आम तौर पर होता यह रहा है कि किसी भी केस में सत्ताधारी राजनीतिक पार्टी अपने सदस्यों या सहयोगियों को गिरफ्तार नहीं करती. कहीं से बलि के बकरे तलाशे जाते हैं और उन्हें ही शील्ड की तरह इस्तेमाल करके नेता को बचा लिया जाता है. ऐसे सैकड़ों मामले हैं.

१९७४ में पांडिचेरी लाइसेंस घोटाले में एक एमपी, तुलमोहन राम को पकड़ लिया गया था. जबकि सबको मालूम था कि खेल उस वक़्त के युवराज संजय गाँधी और उनकी प्रधानमंत्री माँ के फायदे के लिए हुआ था. उस वक़्त देश की लोक सभा में विपक्ष की बेंचों पर बहुत ही बेहतरीन लोग होते थे. मधु लिमये, ज्योतिर्मय बसु, इन्द्रजीत गुप्ता, हरि विष्णु कामथ, अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेता विपक्ष की शोभा थे. इंदिरा गाँधी के पास १९७१ वाला दो तिहाई बहुमत था लेकिन मामला उजागर हुआ और पूरी दुनिया को मालूम हुआ कि भ्रष्टाचार की जड़ें कहाँ तक थीं. लेकिन असली अपराधियों को सज़ा नहीं मिली. उसके बाद तो अरुण नेहरू का दबदबा बना और भ्रष्टाचार को एक संस्थागत रूप दे दिया गया. बाद की सभी सरकारों ने भ्रष्टाचार के मामलों को दबाने में ही भलाई समझी.

राजीव गाँधी, वीपी सिंह, पीवी नरसिम्हा राव, एचडी देवेगौडा, इन्दर कुमार गुजराल, अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह की सरकारों के दौरान सत्ता पक्ष के नेताओं ने तबियत से भ्रष्टाचार किया और देश में ऐसा माहौल बना कि बेईमानी को बुरा मानने का रिवाज़ की ख़त्म हो गया. लेकिन अब देख जा रहा है कि भ्रष्ट आदमियों को पकड़कर जेल भेजा जा रहा है. राजनेता कैसा भी हो जेलों की हवा खाने को मजबूर हो रहा है. दरअसल जैन हवाला काण्ड के बाद नेता बेख़ौफ़ हो गए थे. उस रिश्वत काण्ड में कम्युनिस्ट पार्टियों के अलावा लगभग सभी पार्टियों के नेता शामिल थे, बीजेपी के आडवाणी थे तो कांग्रेस के सतीश शर्मा. शरद यादव थे तो सीताराम केसरी. आरोप भी बिकुल सही पाए गए थे लेकिन सभी नेताओं ने मिलकर ऐसी खिचडी पकाई कि कोई बता ही नहीं सकता कि मामला दफ़न किस रसातल में कर दिया गया.

उसके बाद के भी भ्रष्टाचारों को दबाया ही गया. एक से एक भ्रष्ट नेता और मंत्री आते रहे और जाते रहे, किसी के भ्रष्टाचार का ज़िक्र तक नहीं हुआ. जांच की बात तो सोचने  का कोई मतलब ही नहीं है. सब नेताओं को मालूम था कि लूटो और खाओ, किसी कानून से डरने की ज़रुरत नहीं है. लेकिन अब देखने में आ रहा है कि बड़े बड़े नेताओं के करीबी लोग जेलों की सैर कर रहे हैं. ऐसा शायद इसलिए हो रहा है कि मीडिया अलर्ट है और सूचना का अधिकार कानून प्रभावी तरीके से चल रहा है. वेब मीडिया के चलते मीडिया को मैनेज करने की नेताओं की कोशिशें भी बेकार साबित हो रही हैं. आज कोई नेता एक चोरी करता है और अगर किसी ब्लॉगर के हाथ सूचना लग गयी तो लगभग उसी क्षण वह सूचना दुनिया भर के लिए उपलब्ध हो जाती है. जिस लोकपाल बिल को पिछले ४० साल से सरकारें ठंडे बस्ते में डाले हुए थीं वह अब देश की जनता की अदालत में है.

यानी भ्रष्टाचार से लड़ने की एक देशव्यापी लड़ाई चल रही है और केंद्र सरकार किसी भी सूचना को छुपा नहीं पा रही है और उसे एक्शन लेना पड़ रहा है. जनमत और मीडिया का दबाव इतना है कि राजनीतिक पार्टियों को कुछ करना पड़ रहा है. यह अलग बात है कि बीजेपी वालों को लग रहा है कि यह अभी कम है.  बीजेपी के एक दिल्ली दरबारी प्रवक्ता को आज टेलीविज़न पर कहते सुना गया कि सुरेश कलमाड़ी तो ठीक है लेकिन उनके सारे फैसले प्रधानमंत्री कार्यालय में लिए गए थे इसलिए उसके खिलाफ फ़ौरन गिरफ्तारी जैसी कार्रवाई होनी चाहिए. भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रहे जनता के युद्ध में बीजेपी को गंभीरता से लेने की ज़रूरत नहीं है. उनके मौजूदा दो मुख्यमंत्री आपराधिक मामलों के आरोपी हैं.

कर्नाटक के मुख्यमंत्री को जब हटाने की बात आई तो उसने धमका दिया. और दिल्ली वाले बीजेपी के नेता दुबक गए. एक बड़े नेता का बयान आया कि उस मुख्यमंत्री को इसलिए नहीं हटाया जा रहा है उसके बाद दक्षिण में उनकी पार्टी ही ख़त्म हो जायेगी. वाजपेयी सरकार के दौरान सैकड़ों ऐसे घोटाले हैं जिन पर बीजेपी के प्रवक्ताओं की नज़र नहीं जाती. उनका अध्यक्ष पूरी दुनिया के सामने नोटों की गड्डियाँ संभालते देखा गया था. और भी बहुत सारे अपराधी हैं उनकी पार्टी में लेकिन उन्हें कुछ नहीं दिखता. नरेंद्र मोदी के कृत्यों की पोल रोज़ ही खुल रही है लेकिन पूरी पार्टी उनके साथ खडी है. ऐसी हालत में कम से कम बीजेपी की औकात तो नहीं है कि वह अपने आपको भ्रष्टाचार के खिलाफ क्रूसेडर के रूप में पेश कर सके. इसका मतलब यह नहीं कि कांग्रेस वाले पाकसाफ़ है. उनके भ्रष्टाचार तो बीजेपी वालों से भी ज्यादा हैं.

और भ्रष्टाचार के खिलाफ मौजूदा अभियान और उसको मिल रही सफलता कांग्रेस की कृपा का नतीजा नहीं है. सही बात यह है कि यह सारी सफलता मीडिया की वजह से मिल रही है. एक खबर आती है और पूरी दुनिया से लोग उसके पीछे पड़ जाते हैं. अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाने इसलिए कांग्रेस सरकार को काम करना पड़ता है. इसलिए मौजूदा लड़ाई में राजनीतिक पार्टियां बिलकुल हाशिये पर हैं और जनता की लड़ाई में मीडिया क्षण क्षण का भागीदार है. इस बात में भी दो राय नहीं है कि मीडिया में बहुत सारे अपराधी हैं . राडिया टेप्स वाले पत्रकारों  को कौन नहीं जानता.

सच्ची बात यह है कि प्रिंट और टेलिविज़न के बड़े बड़े सूरमा पत्रकार भी भ्रष्ट आचरण के गुनाहगार हैं. लेकिन जो वेब मीडिया है वह सही काम कर रहा है. देखा यह जा रहा है  कि टीवी और अखबार वाले भी वेब मीडिया के दबाव में आकर ही मुद्दों को उठा रहे हैं. नतीजा यह है कि भ्रष्टाचार से ऊब चुकी जनता को अपनी बात कहने के अवसर मिल रहे हैं और भ्रष्ट लोगों की मुसीबत आई हुई है. ज़ाहिर है आने वाला वक़्त देश के आम आदमी के लिए खुशनुमा हो सकता है क्योंकि अगर सार्वजनिक सुविधाओं के लिए निर्धारित पैसा घूस खोरों से बच गया तो वह देश के की काम आयेगा.

लेखक शेष नारायण सिंह देश के जाने-माने पत्रकार और स्तंभकार हैं. एनडीटीवी समेत कई चैनलों-अखबारों में काम कर चुके हैं. विभिन्न अखबारों में नियमित रूप से लिखते हैं. कई चैनलों पर बहसों व विश्लेषणों में शरीक होते हैं. वेब माध्यम के चर्चित चेहरे हैं.


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