कैग ने बनाई रेल, निशंक जा सकते हैं जेल

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दीपक आजादहरिद्वार कुंभ के लिए नोबेल प्राइज पाने की लालसा रखने वाले मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक के दावों की पोल खुल गई है। कैग की रिपोर्ट से खुलासा हुआ है कि किस तरह आंख मूंदकर कुंभ के नाम पर निशंक की छत्रछाया में उनके चहेते नौकरशाहों ने करोड़ों के वारे-न्यारे किए। न केवल कुंभ में अनाप-शनाप खर्च किया गया, बल्कि कमीशनखोरी के लिए ठेकेदारों को करोड़ों का लाभ पहुंचाया गया।

बेशर्मी की हद ऐसी कि अब तक करोड़ों का चूना लगाने वाले भ्रश्ट नौकरशाहों के खिलाफ निशंक सरकार ने चूं तक नहीं की। लेकिन अब यह मामला निशंक के गले की फांस बनता दिख रहा है। कैग की रिपोर्ट को ही आधार बनाकर तिवारी सरकार में अपर महाधिवक्ता रहे जेडी जैन ने निशंक के साथ ही कुंभ मंत्री मदन कौशिक और इन दिनों केन्द्र में प्रतिनियुक्ति पर नौकरी बजा रहे आईएएस आनंद बर्द्धन के खिलाफ कोर्ट में केस फाइल किया है।

भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट के मुख्य अंश : कुंभ-2010 के लिए केन्द्र सरकार ने 565 करोड़ रुपये की सहायता दी। बावजूद इसके निशंक सरकार पैसा का रोना रोते हुए केन्द्र सरकार पर उपेक्षा का आरोप लगाती रही। निशंक सरकार ने कितनी ईमानदारी से कुंभ को मिली केन्द्रीय सहायता का उपयोग किया, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि केन्द्र को उपयोगिता प्रमाणपत्र तक उपलब्ध नहीं कराया गया।

कुंभ मेले के तहत 2007-08 से 2009-10 के मध्य 590.01 करोड़ की लागत के 311 कार्य अनुमोदित किए गए थे। इसमें से 527.09 करोड़ लागत के 273 कार्य दिसम्बर 2009 तक स्वीकृत किए गए थे। इन स्वीकृत कार्यों को 31 दिसम्बर तक पूर्ण हो जाना चाहिए था, लेकिन इस तिथि तक मात्र 82 कार्य ही पूर्ण हो पाए थे। सरकार की लेटलतीफी के चलते इस तरह समय पर ज्यादातर काम पूरा न हो पाने के कारण नौकरशाहों ने अनाप-शनाप तरीके से खर्च किया और निर्माण कार्यों में गुणवत्ता की अनदेखी की। सीएजी के अनुसार जुलाई 2010 तक 180 करोड़ लागत के 54 निर्माण कार्य मेला खत्म होने के बाद भी अधूरे पड़े हुए थे।

इस तरह हुई धांधली :  बिना स्वीकृति के मनमानी से किए कार्य- ग्यारह कार्यदायी संस्थाओं सिंचाई विभाग, लोक निर्माण विभाग, राजाजी राश्टीय उद्यान, उत्तर प्रदेश सेतु निगम, स्वास्थ्य विभाग, मेला प्रशासन, पर्यटन विभाग, सूचना एवं लोक संपर्क विभाग, सुलभ इंटरनेशनल और पेयजल निगम ने 19.39 करोड़ के कार्य बिना सरकार की मंजूरी के गलत-शलत तरीके से कर दिए। सीएजी की जांच में पता चला कि करोड़ों रुपयों की यह बंदरबांट मेला अधिकारी आनंद बर्द्धन के मौखिक आदेशों पर किए गए। इस पर सीएजी ने सरकार की आलोचना करते हुए कहा  है कि यह वित्तीय नियमों का उल्लंघन है।

गैर कुंभ कार्यों पर फूंके 17.40 करोड़ :  मेला अधिकारी द्वारा निर्माण खंड लोनिवि रुड़की, निर्माण शाखा पेयजल, ऋशिकेश, जल संस्थान हरिद्वार और पेयजल निगम हरिद्वार से 17.40 करोड़ रुपये के ऐसे काम करवाये गए जिनका कुंभ मेले से कोई संबंध नहीं था। मेलाधिकारी द्वारा इसके लिए सरकार से भी कोई मंजूरी नहीं ली गई।

ठेकेदारों को अग्रिमों का अनधिकृत भुगतान : राज्य सरकार के नियमों में ठेकेदारों को किसी भी तरह ब्याज रहित अग्रिम भुगतान का कोई प्रावधान नहीं है। इसके बावजूद गंगा प्रदूशण नियंत्रण इकाई, हरिद्वार और नगर पालिका, हरिद्वार को 1.55 करोड़ रुपये का अग्रिम भुगतान कर दिया गया। इन दोनों ही संस्थाओं द्वारा ठेकेदारों को यह धनराशि बिना ब्याज के ही अग्रिम तौर पर दे दी गई। इस तरह देहरादून की एक फर्म  को भी 1.90 करोड़ की प्रतिभूति अग्रिम का भुगतान कर दिया गया।

राजस्व का नुकसान : कुंभ मेले के लिए भारत सरकार से राज्य को मिले 565 करोड़ रुपये पर जून 2010 तक राज्य सरकार ने 86.54 लाख का ब्याज प्राप्त किया। इसी तरह हरिद्वार जल निगम द्वारा भी 11 लाख रुपये का ब्याज अर्जित किया गया। राज्य सरकार द्वारा ब्याज की इस धनराशि को भारत सरकार से छुपाया गया। इस तरह सरकार ने इस पैसे का क्या किया, यह भी संदेह के घेरे में है।

पार्किंग स्थलों से राजस्व का नुकसान : यह भी कितना अजीब खेल है कि मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल कुंभ मेले में रिकॉर्ड श्रद्धालुओं के आगमन का ढोल पीटते नहीं थकते, लेकिन दूसरी ओर करोड़ों की लागत से बने पार्किंग स्थलों के ठेके नहीं छूटे और कुछ छूटे भी उनसे राजस्व की वसूली नहीं की गई। कुंभ मेले के दौरान पार्किंग सुविधा के लिए शहर में 38 निशंकपार्किंग स्थल तैयार किए गए। इसके मुकाबले 35 पार्किंग स्थल के लिए ठेकेदारों ने 1.71 करोड़ की निविदा डाली। इस पर मेला प्रशासन ने 1.29 करोड़ की ही वसूली की। कुछ पार्किंग स्थल के लिए ठेके निरस्त किए जाने के चलते कुल मिलाकर इससे सरकार को 70 लाख रुपये का चूना लगाया गया। सीएजी ने सरकार की खिचाई करते हुए कहा कि एक ओर जहां मेला अधिकारी पांच करोड़ श्रद्धालुओं के आगमन का दावा करते रहे, वहीं पार्किंग स्थलों से राजस्व का नुकसान होना चिंताजनक है। इससे सरकार के दावों पर भी सवाल उठते हैं।

अस्थाई दुकानों में भी धांधली : मेला प्रशासन ने हरिद्वार की फर्म लल्लू जी एंड सन्स के माध्यम से 32 लाख की लागत से  467 अस्थाई दुकानों का निर्माण कराया। सीएजी की जांच में पाया गया कि बिना किसी आवश्यकता के ही इन दुकानों का निर्माण कराया गया। पूरी दुकानों की नीलामी भी मेला प्रशासन नहीं कर पाया। मेला प्रशासन केवल 234 दुकानों की 47 लाख में ही नीलामी करा पाया।  इस तरह 233 दुकानें बनी तो सही, लेकिन उनकी नीलामी न होने से सरकार को लाखों के राजस्व का नुकसान उठाना पड़ा। जो दुकाने नीलाम हुई हुई उनसे भी प्रशासन डेढ़ लाख रुपये की वसूली नहीं कर पाया।

स्टालों से किराये और जल प्रभार की वसूली न होने से करोड़ों का नुकसान : कुंभ मेले में प्रदर्शनी के लिए पर्यटन विभाग की ओर से सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं को स्टॉलों का आवंटन में भी गड़बड़ी पाई गई। अधिकारियों द्वारा मनमाने ढंग से स्टॉल आवंटित किए जाने से  करीब 7 लाख रुपये के राजस्व का नुकसान हुआ। इसी तरह पेयजल निगम द्वारा भी जल संयोजन की वसूली न किए जाने से सरकार को करीब एक करोड़ रुपये राजस्व का नुकसान उठाना पड़ा। इसी तरह मेले में धार्मिंक संस्थाओं व अखाड़ों को टेंट, फर्नीचर और भूमि उपलब्ध कराने के एवज में करीब एक करोड़ की वसूली की जानी थी, लेकिन एक भी रुपये वसूल नहीं किया गया।

जल संस्थान की करनी : मेले में पेयजल उपलब्ध कराने के लिए सरकार ने जल संस्थान को 4.97 करोड़ रुपये उपलब्ध कराये थे। जल संस्थान की ओर से केन्द्रीय भंडार शाखा, देहरादून से 1.18 करोड़ की सामग्री खरीदी गई। इस पर सीएजी की जांच में पता चला कि जल संस्थान ने 1.18 करोड़ के स्थान पर सरकार के सामने बढ़ा-चढ़ाकर 1.29 करोड़ की खरीद का दावा किया गया। इसके साथ ही प्रतिशत प्रभार के रूप में 9 प्रतिशत के बजाय 22.71 प्रतिशत प्रभार का भुगतान किया गया, जिससे 13 लाख का अधिक भुगतान किया गया। इस तरह जल संस्थान द्वारा झूठ बोल कर लाखों का गोलमाल किया गया।

बजट के उपयोग में जमकर हुई धांधलीः सीएजी की जांच में पता चला कि सात विभागों ने बिना काम किए करीब 31 करोड़ का अधिक व्यय दिखाकर नई किश्त प्राप्त करने की कोशिश की। मेला अधिकारी द्वारा बिना सत्यापन के शासन को प्रतिवेदित व्यय के आकड़े, कमजोर आंतरिक नियंत्रण और अप्रभावी अनुश्रवण तंत्र को दर्शाता है। इस तरह मेलाधिकारी ने भारत सरकार को भी बढ़ा चढ़ाकर गलत तरीके से उपयोगिता प्रमाण पत्र भेजे।

सफाई कर्मचारियों के नाम पर करोड़ों का गोलमाल : कुंभ मेले में सफाई कर्मचारियों को काम पर रखने के नाम पर मेलाधिकारी स्वास्थ्य ने जमकर धांधली की। सफाई कर्मचारियों के नियोजन के लिए सरकार ने मेलाधिकारी स्वास्थ्य को 15.29 करोड़ की योजना को मंजूरी दी। मेलाधिकारी स्वास्थ्य अनिल त्यागी ने सफाई कर्मचारियों के नियोजन पर बिना मंजूरी के ही 92.69 लाख रुपये की अधिक खर्च कराना बताया। सीएजी की जांच जांच में पता चला कि सफाई कर्मचारियों की भर्ती के नाम पर करोड़ों का खेल खेला गया। जांच में खुलासा हुआ कि सरकार के स्पश्ट निर्देश थे कि प्रत्येक कर्मचारी को मजदूरी का भुगतान बैंक अकाउंट के जरिये ही किया जाना चाहिए, लेकिन त्यागी ने इसमें जमकर मनमानी की। 9000 हजार कर्मचारियों में से मात्र 352 कर्मचारियों को ही बैंक अकाउंट के जरिये भुगतान किया गया। बाकि को मस्टररोल के जरिये भुगतान करने की बात बताई गई। सीएजी की जांच में मौका मुआयना से पता चला कि त्यागी ने जिन-जिन स्थानों पर सफाई कर्मचारियों की तैनाती बताई गई, वहां पर कर्मचारी मिले ही नहीं। त्यागी की मनमानी यहीं खत्म नहीं हुई। उन्होंने मनमानी से कर्मचारियों की मजदूरी 125 रुपये बढ़ाकर 180 रुपये कर दी। इस तरह त्यागी ने मेला प्रशासन के साथ मिलीभगत कर सफाई कर्मचारियों के नाम पर करोड़ों रुपयों का गोलमाल किया। सीएजी के अनुसार मनमानी के जरिये करीब 5 करोड़ का सरकार को चूना लगाया गया।

नौकरशाहों के नाम पर भी घोटाला : मेलाधिकारी स्वास्थ्य अनिल त्यागी ने सफाई कर्मचारियों के नाम पर ही करोड़ों का गोलमाल नहीं किया, बल्कि उन्होंने नौकरशाहों की आड़ लेकर भी लाखों के वारे-न्यारे किए। मेले में अधिकारियों के लिए अस्थायी सर्किट हाउस तैयार किया गया था। इसके बावजूद त्यागी ने 40 लाख की लागत से अधिकारियों के लिए टेंट और स्विस कॉटेज किराए पर लिए, जिनका कोई उपयोग किया ही नहीं गया।

शौचालय निर्माण घोटाला : घोटालेबाज सुलभ इंटरनेशनल : सरकार ने मेलाधिकारी स्वास्थ्य के प्रस्ताव पर 7 करोड़ 32 लाख की लागत से 10010 अस्थाई  शौचालयों के निर्माण की मंजूरी दी। इसके अलावा सुलभ इंटरनेशनल को 3896 अस्थाई शौचालयों के निर्माण के लिए 2.68 करोड़ रुपये का ठेका दिया गया। लेकिन सुलभ ने मेला प्रशासन से मिलीभगत कर  97 स्थानों पर 6.32 करोड़ की लागत से बिना किसी आवश्यकता और मंजूरी के  4080 शौचालयों का निर्माण करने का दावा किया। सुलभ इंटरनेशनल ने न केवल बढ़ा चढ़ाकर शौचालयों के निर्माण का दावा किया, बल्कि स्वास्थ्य विभाग द्वारा बनाये गए शौचालयों की लागत से 9746 रुपये प्रति शौचालय की लागत अधिक बताई। स्वास्थ्य विभाग ने जिस शौचालय को 5744 रुपये में बनाया सुलभ इंटरनेशनल नाम के एनजीओ ने उसे 15490 रुपये में बनाकर सरकार को जमकर चूना लगाया। पहले बिना मंजूरी के शौचालयों का अधिक निर्माण और फिर दोगुनी से अधिक लागत पर शौचालयों का निर्माण करने के साथ ही सीएजी की जांच में खुलासा हुआ कि सुलभ ने जमीन में बहुत कम संख्या में शौचालय निर्मित किए। सीएजी ने ऋशिकेश और डामकोटी में स्थलीय निरीक्षण कर पाया कि 21 शौचालयों के दावे के विपरीत मौके पर मात्र 10 शौचालय ही पाये गए।

शौचालय निर्माण में स्वास्थ विभाग ने भी खूब काटी चांदी : सरकार ने मेलाधिकारी स्वास्थ्य को 10010  अस्थाई शौचालयों के निर्माण की अनुमति दी थी, लेकिन अनिल त्यागी ने मनमानी से 556 अधिक शौचालयों का निर्माण कराया। इस तरह 32 लाख रुपये का चूना लगा दिया गया। यह तब किया गया जब सरकार ने पहले ही जरूरत से अधिक दस प्रतिशत शौचालयों के निर्माण को मंजूरी दी थी। मेला खत्म होने के बाद इन अस्थाई शौचालयों में प्रयोग किए गए टिन शेड, सीट और पाइप की नीलामी भी नहीं की गई। उल्टा इसको हटाए जाने पर दस लाख रुपये खर्च किए गए।

कमीशनखोरी के लिए ठेकेदार पर लुटाए 4.77 करोड़ : मेले में टिन, टेन्टेज और फर्नीचर किराए पर लेने के लिए मेला प्रशासन ने हरिद्वार की फर्म लल्लू जी एंड सन्स पर खूब दरियादिली दिखाई। मेला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग ने कर छूट के नाम पर इस फर्म को 1.34 करोड़ रुपये का अनुचित लाभ पहुंचाया गया। लल्लूजी के नाम पर मेला प्रशासन और मेला अधिकारी स्वास्थ्य की दरियादिली यहीं खत्म नहीं हुई। सीएजी की जांच में पाया गया कि फर्म को मेला प्रशासन और मेलाधिकारी स्वास्थ्य ने अनुबंध से हटकर 3.43 करोड़ रुपये का अधिक भुगतान किया। चार माह की मेला अवधि के बजाय फर्म को घोटालेबाज नौकरशाहों ने मनमानी से कमीशनखोरी के लिए छह माह का भुगतान कर करोड़ों का खेल खेला। मेलाधिकारी स्वास्थ्य ने इसके अलावा स्वास्थ्य से संबंधित सामग्री के क्रय में भी जमकर गोलमाल किया। उन्होंने बिना किसी मंजूरी के करीब 40 लाख रुपये लागत की सामग्री की खरीद की।

इस तरह जिस कुंभ मेले के सफल आयोजन के लिए निशंक अपने चेले-चपाटों के जरिये नोबेल प्राइज पाने की इच्छा पाले हुए बयानबाजी करा रहे थे, उसकी पोल सीएजी की रिपोर्ट से खुल गई है। करोड़ों के इन घपले-घोटालों के अलावा सड़क निर्माण से लेकर गंगा नदी में प्रदूशण नियंत्रण जैसे कामों के नाम पर भी करोड़ों रुपयों की बंदरबांट की गई। सीएजी का कहना है कि कुंभ मेले में उसकी नमूना जांच से साफ होता है कि व्यापक स्तर पर घोटाले किए गए।

अगर ईमानदारी से सीएजी की रिपोर्ट के आधार पर ही कार्रवाई हो तो आनंद बर्द्धन, अनिल त्यागी जैसे कई बड़े अफसरों को जेल की सींखचों के पीछे होना चाहिए। लेकिन जिस राज्य का मुखिया कुंभ की इस घोटालागाथा के लिए नोबेल पाने की हसरत पाल रखा हो, वहां इसकी उम्मीद रखना कि जनता का करोड़ों का पैसा कमीशनखोरी के लिए अनाप-शनाप तरीके से खर्च करने वाले भ्रष्ट नौकरशाहों, ठेकेदारों और एनजीओ संचालाको के खिलाफ कोई कार्रवाई होगी, सोचना थोड़ा अटपटा लगता है। लेकिन कैग की रिपोर्ट के आधार पर टूजी घोटाले में राजा एंड कंपनी की तर्ज पर देर सबेर निशंक एंड कंपनी भी सलाखों के पीछे पहुंच सकती है।

देहरादून से दीपक आजाद की रिपोर्ट


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