सारी दुनिया के सामने इस्लामाबाद के सारे खेल का खुलासा

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: पाकिस्तान की और फजीहत अभी बाकी है :  आतंकवादी ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के साथ जहां पश्चिमी दुनिया में खुशी की लहर है, वहीं आने वाले वक्त में अमेरिकी रुख के और उत्साहित और आक्रामक होने के आसार हैं. वाशिंगटन ने पिछले एक साल से इस बाबत संकेत देने भी शुरू कर दिए थे लेकिन पिछले महीने से और खासकर कुछ दिनों पूर्व से ऐसी संभावना थी कि जल्दी ही खुफिया सूचनाओं के आधार पर कुछ बड़ा घटित होने वाला है.

तभी तो सीआईए ने विज्ञप्ति जारी करके आईएसआई से खुफिया जानकारियों के आदान-प्रदान तक पर रोक लगा दी थी. अमेरिकी अधिकारियों ने आईएसआई पर 'डबल गेम' खेलने का आरोप लगाया था. बहरहाल, अब जबकि लादेन मारा जा चुका है कृपया निम्नलिखित बयानों पर नजर डालें. पहला यह कि घटना के बाद पाकिस्तान ने अपने पहले आधिकारिक बयान में कहा है कि उसे लादेन को लेकर हुए ऑपरेशन की कोई जानकारी नहीं दी गई. और, इस ऑपरेशन में सिर्फ अमेरिकी एजेंसियां ही शामिल थीं यानी कि लादेन को मार गिराने का काम सिर्फ अमेरिकियों ने ही किया. पाकिस्तानी सेना या सुरक्षाबलों का इसमें कोई हाथ नहीं है. दूसरा, घटना के बाद व्हाइट हाउस के बाहर राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा कि हमें पक्की खुफिया जानकारी मिलने पर हमने लादेन को खत्म करने का निर्देश दिया. लेकिन इसमें पाकिस्तान का भी सहयोग मिला क्योंकि अमेरिका की तरह पाकिस्तान भी दूसरे देशों की तरह आतंक से पीड़ित है. ओबामा ने राष्ट्रपति जरदारी से फोन पर बात करने और उन्हें तथा उनकी टीम को सहयोग के लिए धन्यवाद देने की बात भी कही.

तीसरा बयान आया भारत के गृहमंत्री पी. चिदंबरम का, उन्होंने आतंक पर अपनी पुरानी बातों को दुहराते हुए कहा कि मुंबई में 26/11 के आतंकी हमले में शामिल लोगों को पाकिस्तान तुरंत भारत के हवाले करे. यह बात दिल्ली ने इस मौके पर प्रमुखता से इसलिए कही क्योंकि पाकिस्तान हमेशा से आतंकियों की केंद्रस्थली होने से इनकार करता रहा है लेकिन इस्लामाबाद से लगभग सौ किलोमीटर की दूरी पर एबटाबाद में लादेन का रहना खुद ही वस्तुस्थिति को साबित करता है. एबटाबाद में न केवल सेना का बडा गढ है, बल्कि वहां पाक सेना के अफसरों का दफ्तर भी है. वहां से 60-70 किलोमीटर की दूरी पर लश्करे तैयबा के कैंप भी बताए जाते हैं.

बहरहाल, इन बयानों और स्थितियों से जहां पाकिस्तान की कलई खुल गई है, वहीं ये भी साबित हुआ है कि लंदन के गार्जियन, अमेरिका के न्यूयार्क टाइम्स और अनेक पाकिस्तानी अखबारों में छपी ये रिपोर्ट भी सही थी कि वाशिंगटन अब पाकिस्तान पर भरोसा नहीं कर रहा है और दोनों के रिश्ते जितने आज खराब हैं, उतने 9/11 हमले के बाद से कभी नहीं रहे. मजे की बात तो यह है कि 9/11 के बाद से अब तक पाकिस्तान को 12 अरब डालर की सैन्य सहायता समेत 21 अरब डालर की मदद मिल चुकी है. लेकिन उसका प्रयोग वो मनचाहे तरीके से करता रहा है, इसमें भारत के खिलाफ इनका प्रयोग भी शामिल है. वाशिंगटन की चिंता सिर्फ पाकिस्तान के सामान्य 'डबल गेम' को लेकर ही नहीं थी. ओबामा ने तो यहां तक कहा था कि पाकिस्तानी सेना, प्रतिष्ठानों और वहां के परमाणु केंद्रों तक में आतंकियों की घुसपैठ संभावित है.

इसी बीच जब राणा और हेडली की गिरफ्तारी के बाद आए बयान से स्थिति और उलझी कि 26/11 के मुंबई हमले में उन्होंने जो कुछ किया वो पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी और वहां की सरकार के इशारे पर किया. इसके बाद आइएसआइ प्रमुख शुजा पाशा की मुलाकात भी सीआइए के निदेशक लियोन पेनेटा से हुई लेकिन पाकिस्तान की भूमिका को लेकर तस्वीर साफ नहीं हो सकी. फिर जब अफगानिस्तान के साथ ही पाकिस्तान के सीमावर्ती आदिवासी इलाकों में द्रोण हमले होने लगे तो पाक सेनाध्यक्ष कयानी और प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताया. दरअसल इस पृष्ठभूमि में कुछ ही हफ्तों/महीनों में स्थिति ने आक्रामक रुख लेना शुरू कर दिया था और अमेरिका को यकीन हो गया था कि उसे जो करना है, गुप्त और ठोस रूप में करना है.

तभी तो पूर्व राष्ट्रपति क्लिंटन, बुश और अब ओबामा के समय भी जो समस्या बनी हुई थी और जिसे वाशिंगटन अपने दस प्रमुख वांछितों में मानता था, उसे मार गिराने में सफलता हासिल की गई है. बात सिर्फ 9/11 की ही नहीं है, तंजानिया, कीनिया जैसे विदेशों में स्थित अनेक अमेरिकी दूतावासों पर हमले की भी है. 1995 के रियाद के एक बम हमले की भी है, जिसमें दो भारतीयों समेत पांच अमेरिकी मारे गए थे. 1999 में राष्ट्रपति क्लिंटन ने संयुक्त राष्ट्र से अफगानिस्तान पर प्रतिबंध लगाने की मांग इसी बिना पर की थी कि वो लादेन को प्रत्यर्पित करे. फिर 2001 में 9/11 की घटना होने के बाद भी लादेन का प्रत्यर्पण नहीं हुआ. फिर जब अमेरिका ने अफगानिस्तान में बमबारी शुरू की तो अफगान सरकार ने किसी तीसरे देश में मुकदमा चलाने की अनुमति देने की बात कही, लेकिन शर्त रख दी कि लादेन को लेकर सबूत दिखाए जाएं और अफगानिस्तान में बमबारी भी रोकी जाए पर राष्ट्रपति बुश ने इस शर्त को मानने से इनकार कर दिया.

बहरहाल, इन सारी स्थितियों के मद्देनजर अब पाकिस्तान इस बात से बचना चाह रहा है कि लादेन के मारे जाने में उसका हाथ है, जबकि अमेरिका उसे धन्यवाद कह रहा है. स्पष्ट है कि इस्लामाबाद आतंकी समूहों की नाराजगी से बचना चाह रहा है. वो सारी तोहमत वाशिंगटन पर थोपना चाहता है. वैसे इन हालातों में अमेरिका ही नहीं, सारी दुनिया के सामने इस्लामाबाद के सारे खेल का खुलासा हो गया है, वर्ना सैकडों बार अंतरराष्ट्रीय आश्वासनों और इनकार के बाद भी लादेन का राजधानी इस्लामाबाद के पास और वो भी सेना के ठिकानों के निकट मिलना कोई मामूली बात नहीं है.

ऐसे में कोई ताज्जुब नहीं कि पाकिस्तान की फजीहत के बीच अमेरिकी अगुवाई में पश्चिमी खेमे का रुख और भी सख्त हो. दिलचस्प तो ये है कि लाख खुलासों और विडंबनाओं के बीच भी न तो अमेरिका पाकिस्तान को छोडने वाला है और न ही पाकिस्तानी हुक्मरान अमेरिका को! वैसे लादेन के मारे जाने की अफवाह आंख मिचौली की तरह पिछले अनेक वर्षों से रह-रह कर उठती रही थी, लेकिन अब जब उसका वाकई अवसान हो चुका है तो जहां खून की होली खेलने वालों को बडा झटका लगा है, वहीं कोई ताज्जुब नहीं कि ओबामा और उनकी पार्टी को बड़ा चुनावी फायदा मिले तथा दुनिया में शांतिवादी ताकतें और मजबूत हो सकें.

लेखक गिरीश मिश्र लोकमत समाचार के संपादक हैं.


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