आश्वासन के बाद जामिया छात्रों का अनशन समाप्त

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जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के मास कम्युनिकेशन विभाग के छात्र-छात्राओं का अनशन बृहस्पतिवार को टीचरों की मध्यस्था और सकारात्मक आश्वासन के बाद खत्म हो गया। ये छात्र-छात्राएं पिछले 6 दिनों से परीक्षा दिए जाने से रोके जाने का विरोध कर रहे थे। इनके साथ ही सैकड़ों और भी छात्रों को परीक्षा देने से रोका गया है, जिसके चलते छात्रों में भरी रोष है. जामिया टीचर्स एसोसिएशन के प्रतिनिधियों ने छात्रों की मांगों पर कुलपति से उपयुक्त कार्रवाई का आश्वसन दिया है।

कुलपति के अड़ियल और तानाशाही रवैये और छात्रों के विरोध के चलते विश्वविद्यालय को काफी बदनामी झेलनी पड़ रही थी। जिसके बाद जामिया टीचर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष रिजवान कैसर ने मध्यस्था का फैसला किया। गौरतलब है कि जिन 13 छात्र-छात्राओं को परीक्षा देने से रोका गया है, उनमें 3 छात्र-छात्राओं की उपस्थिति 65 % से ऊपर,7 छात्र-छात्राओं की उपस्थिति 70% से ऊपर,2 छात्र-छात्राओं की 60 % ऊपर है। इसे देखकर कहीं से भी ऐसा नहीं लगता कि इन छात्रों में कोई भी अपनी उपस्थिति को लेकर लापरवाह था। लेकिन जामिया विश्वविद्यालय प्रशासन ने पूरे मामले में छात्र हित को सिरे खारिज कर दिया है।

दरअसल छात्रों के लिए 75 प्रतिशत की अनिवार्य उपस्थिति के नियम की मूल भावना ये है कि छात्र कक्षाओं में आएंगे तो कुछ सीखेंगे। इस नियम का अंतिम लक्ष्य यही है कि छात्र अधिक से अधिक सीखें,लेकिन पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखने वाला छात्र लेबोरेटरी में नहीं सीख सकता। उसके सारे प्रयोग समाज को जानने और समझने से संबंधित होते हैं। बिना उनके बीच जाए पत्रकारिता को समाजोपयोगी नहीं बनाया जा सकता। क्लास में रटी गई परिभाषाओं के आधार पर परीक्षा तो पास की जा सकती है लेकिन कार्यक्षेत्र में व्यवहारिक अनुभव ही काम आता है।

इस मामले में हाईकोर्ट के जज ने वाइस चांसलर से अनुरोध भी किया था कि वे अतिरिक्त कक्षाएं लगाकर समस्या का समाधान कर सकते हैं, लेकिन वाइस चांसलर ने इस सलाह को मानने से इंकार दिया। जाहिर है, वीसी अगर उपस्थिति के नियम की मूल भावना का ख्याल रखते तो हाईकोर्ट के एक जज को इस तरह की सलाह देने की जरूरत ही नहीं पड़ती। लेकिन इस पूरे मामले से साफ है कि वीसी को विद्यार्थियों के हित की कोई चिंता नहीं है और सिर्फ एक नियम की आड़ में वे विद्यार्थियों पर तानाशाही कायम करना चाहते हैं। विश्विद्यालय के बाहर शांतिपूर्ण तरीके से अनशन कर रहे छात्रों पर पुलिस और प्राइवेट सुरक्षा गार्डों से हमले भी कराए गए।

युवा पत्रकारों के संगठन जर्नलिस्ट्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टिज (जेयूसीएस) ने छात्रों के आंदोलन को समर्थन देते हुए पत्रकारिता के खालिस किताबी पाठ्यक्रम को ज्यादा से ज्यादा सामाजिक बनाने की मांग उठाई। संगठन के संयोजक शाह आलम ने कहा कि अभी आंदोलन तकनीकी रूप से खत्म हुआ है, हमारी लड़ाई तब तक जारी रहेगी जब तक की पात्रकारिता जैसे सामाजिक विषयों को ‘क्लास’ के दायरे से बाहर लाकर समाज के दायरे में नहीं पढ़ाया जाता। उन्होंने कहा कि तकनीकी आधार पर उपस्थिति कम बताकर किसी युवा को पत्रकारिता की पढ़ाई करने से वंचित नहीं किया जा सकता। प्रेस रिलीज


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