विनीत मित्तल ने अगर चोरी की है तो उन्हें चोर नहीं तो क्या कहेंगे

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: भड़ास को भड़ास ही रहने दें, इसे गन्दी उल्टी न बनाएं : भड़ास4मीडिया पर प्रकाशित खबर ''विनीत मित्तल की संपत्ति पर सहारा वालों ने जबरन कब्जा किया'' त्रुटियों और पूर्वाग्रहों से संक्रमित है। विद्वानों का कहना है कि झूठ ही सिर्फ झूठ नहीं होता, आधा सच भी झूठ ही होता है। और अगर आधा सच और आधा झूठ मिले तो झूठ की पराकाष्ठा पाप में होती है।

एक पत्रकार अगर अज्ञानता से ग्रसित है तो उसका लेख न केवल पत्रकारिता के लिए बल्कि समाज के लिए भी एक दोष है। मैं स्वयं अपने मुख से यह स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि मैंने सहारा में कभी काम तो नहीं किया मगर उसका प्रशंसक अवश्य हूं। और अभी तक ऐसा कोई कारण मुझे नहीं नज़र आया जो मेरे इस दृष्टिकोण को बदले। सर्वप्रथम यह खबर कि अदालत ने सहारा के लिए तुरन्त मुकदमा दर्ज करने के आदेश दिए हैं और जांच पर तुरन्त रिपोर्ट पेश करने को कहा है, सरासर झूठी हैं। और माननीय न्यायालय के आदेश को बिना पढ़े ही मनगढ़न्त तरीके से पेश किया गया है।

यहां मैं उच्च न्यायालय का आदेश जो कि वेबसाईट पर भी आसानी से उपलब्ध है उसका अनुवाद कर रहा हूं। माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खण्डपीठ की माननीय न्यायमूर्ति देवी प्रसाद सिंह एवं माननीय न्यायमूर्ति राजीव शर्मा जी की डबल बेंच ने विनीत मित्तल बनाम उत्तर प्रदेश सरकार के केस की सुनवाई करते हुए एस.एस.पी. लखनऊ को निर्देशित किया कि वे मामले को देखें और कानून के अनुरूप तर्कसंगत आदेश पारित करके वादी के रिप्रजेंटेशन को दो हफ्तों में निस्तारित करें। साथ ही यह आदेश भी दिया कि यदि जरूरी लगे तो अभियोग पंजीकृत करने हेतु सम्बन्धित थाने में प्रेषित करें।

अब सुनिये आपका आलेख क्या कहता है? विनीत मित्तल ने कोर्ट में शिकायत करते हुए न्याय की गुहार लगाई है। ‘सूत्रों’ के मुताबिक कोर्ट ने इस मामले को संज्ञान में लेते हुए लखनऊ के एसएसपी को तुरंत सहारा के वरिष्ठों के खिलाफ रिपोर्ट लिखे जाने के आदेश दिए और मामले की जांच कर तय समय में रिपोर्ट देने के निर्देश दिये। सूत्रों के मुताबिक कोर्ट ने इस प्रकरण को आपराधिक करार दिया। पाठक खुद देख सकते हैं कि न्यायालय के आदेश और लेखक के सूत्रों के कथन में क्या अन्तर है।

इनका यह ‘सूत्र’ किस चण्डूखाने का प्राणी है? मैं समझता हूं पाठकों के सामने दूध का दूध, और पानी का पानी अब तक हो चुका होगा जबकि भड़ास के ज्यादातर पाठक पत्रकार हैं, हम जानते हैं कि ‘सूत्र’ एवं ‘विश्वसनीय सूत्र’ किस मानसिकता की उपज हैं और किन स्थितियों में इस शब्द का दुरुपयोग किया जाता है। इस तरह के गैर जिम्मेदाराना लेख भड़ास की विश्वसनीयता पर प्रश्न चिन्ह लगाते रहते हैं। अपनी व्यक्तिगत खुंदक, निराशा और खीझ को पत्रकारिता का जामा न पहनाएं। किसी ने अगर चोरी की है तो वह चोर ही कहलायेगा। और अगर सहारा वालों ने विनीत मित्तल को चोटी पर बिठाया और उन सज्जन ने विश्वासघात किया तो यह निन्दनीय है। मेरी समझ से इससे पहले कि सहारा उनके खिलाफ कोई कानूनी कार्यवाही करे, विनीत मित्तल ने अपने को सुरक्षित करने के लिए यह युक्ति ईजाद की है तो इसे उसी संगत में देखना चाहिए।

निवेदन है कि भड़ास जो शुरू में पत्रकारों को रचनाशील एवं प्रगतिशील बनाने का और आपस में जोड़ने का अवसर प्रदान करता था उसे हताश निठल्लेबाजी का जमघट न बनायंे। भड़ास को भड़ास ही रहने दें इसे गन्दी उल्टी न बनाएं। इसमें विनीत मित्तल जो कटघरे में खड़े हैं उनका पक्ष नमक मसाले के साथ तो नज़र आता है मगर न न्यायालय का सच और न जिसके घर में चोरी हुई है उसका पक्ष।

उपरोक्त टिप्पणी को भड़ास4मीडिया के पास This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it मेल आईडी से भेजा गया है. टिप्पणी का प्रकाशन इसलिए किया गया है ताकि संबंधित मसले पर दूसरे पक्ष के विचार-तर्क-तथ्य को सबके सामने लाया जा सके.


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