यूपी में मीडिया को पुलिस-प्रशासन का गुलाम बनाने के लिए नया आदेश जारी

E-mail Print PDF

आईबीएन 7 पर हमले के बाद भी उत्तर प्रदेश सरकार पत्रकारों की घेराबंदी करने और पत्रकारिता पर हमले करने को कोई मौका नहीं छोड़ रही है। उत्तर प्रदेश में सार्वजनिक अभिव्यक्ति करने के तरीके पर सरकार ने पहले ही रोक लगा रखी है और अब सरकार के ताजा फरमान से मीडिया जगत के लिए एक नयी मुसीबत खड़ी होने वाली है। आज अखबारों में प्रदेश के गृह सचिव दीपक कुमार की तरफ से आदेशनुमा विज्ञापन छपवाया गया है।

इसमें कहा गया है कि सार्वजनिक प्रदर्शन की करवेज कर रहे मीडिया कर्मियों को रिकार्डिंग की एक प्रति प्रशासन को उपलब्ध करानी होगी जिसे साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत करना होगा। मतलब साफ है जब हंगामा कर रहे लोगों को पता चलेगा कि जो पत्रकार कवरेज कर रहा है, उसकी रिकार्डिंग प्रशासन तक पहुंच जायेगी, लिहाजा सबसे पहले वो लोग उसे ही दौड़ायेंगे। इसके बाद जब उसकी कवरेज अदालत में साक्ष्य के रूप में जमा होगी तो अदालत के चक्कर अलग से लगाने पड़ेंगे। पत्रकार संगठन भले ही इस मामले पर खामोश हों मगर वीकएंड टाइम्स के संपादक संजय शर्मा ने इस मुद्दे पर मोर्चा खोल दिया है।

उन्होंने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर अविलंब इस आदेश को वापस लेने की मांग की है और वापस न होने पर रविवार से उपवास एवं आंदोलन की बात कही है। उन्होंने यह भी कहा कि जरूरत पड़ने पर इस मामले में न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जायेगा। इस बीच, पता चला है कि गृह सचिव ने अपनी नियमित प्रेस ब्रीफिंग में आज इस मुद्दे को उठाए जाने पर कहा कि मीडिया के लिए कवरेज जमा कराना जरूरी नहीं रहेगा। पर पत्रकार इस मांग पर अड़े हुए हैं कि गृह सचिव मीडिया के कवरेज को साक्ष्य के रूप में पेश करने को जरूरी न होने की बात को लिखित रूप में जारी करें जिससे किसी किस्म का कोई कनफ्यूजन न हो। नीचे गृह सचिव द्वारा जारी वो आदेशनुमा विज्ञापन है जो यूपी के अखबारों में छपा है और वो पत्र भी दिया गया है जो संजय शर्मा ने विरोध में लिखा है....


AddThis