टाइम्स प्रबंधन को अनुचित श्रम व्यव्हार का दोषी मानते हुए शो कॉज जारी

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आज टाइम्स ऑफ़ इंडिया पटना के प्रिंटिग प्रेस के नौकरी से हटाये गए कर्मियों के शांतिपूर्ण धरने का ३१वां दिन पूरा हुआ. यह धरना द टाइम्स ऑफ़ इंडिया न्यूज़ पेपर एम्प्लोयीस यूनियन के बैनर तले चल रहा है. इस यूनियन ने पिछले नौ सालों से यहाँ के कर्मचारियों को मनीसाना वेतन बोर्ड के द्वारा अनुशंषित वेतनमान दिलाने की लड़ाई शुरू कर रखी थी.

गौरतलब है कि इस यूनियन ने ऐसी मिसाल कायम कि थी कि इसने पूरी तरह कानूनी लड़ाई लड़ने की रणनीति अपनाई. यह इसलिए कि आम तौर पर मालिकों द्वारा यह बात मीडिया और अन्य तरीकों से फैलाई जाती रही है कि मजदूरों और उनकी यूनियन के नेताओं द्वारा मिलिटेंट ट्रेड यूनियन और हिंसा का रास्ता अपनाये जाने कि वजह से उद्योग बंद होते हैं. जनता के बीच भी इस कुप्रचार की वजह से यह मान्यता रूढ़ हो गयी है. यहाँ की यूनियन ने इस बात का खास ख्याल रखा कि यहाँ किसी तरह की अशांति नहीं फैले और उत्पादन पर बिलकुल ही असर नहीं पड़े. यही कारण है कि यहाँ की यूनियन ने काम के समय कभी गेट-मीटिंग तक नहीं किया. यूनियन कि मान्यता यह रही कि यदि इस देश में न्यायपालिका का रास्ता है तो फिर उसको ही क्यों नहीं आजमाया जाये. यूनियन ने डी. एल. सी. (डिप्टी लेबर कमिश्नर) से लेकर हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक की दौड़ लगाई.

प्रबंधन मजदूरों को यह कह कर मनीसाना वेतन नहीं दे रही थी कि हमारी चार अलग-अलग कम्पनियाँ हैं - बेनेट कोलमेन एंड कंपनी लिमिटेड, टाइम्स पब्लिशिंग हाउस लिमिटेड, एक्सेल पब्लिशिंग हाउस लिमिटेड और पर्ल प्रिंट वेल लिमिटेड और बेनेट को छोड़ कर अन्य किसी कंपनी पर मनीसाना वेज बोर्ड लागू नहीं होता है. कहानी को संक्षिप्त करते हुए हम ने इस सन्दर्भ में चारों कंपनियों द्वारा अलग अलग दायर क्रिमिनल मिस्लेनिअस मुकदमों ( १२८७६/२००४, १४०४६/२००४, १४३४४/२००४ और १४६२४/२००४)  को एक साथ क्लब करते हुए पटना हाईकोर्ट में दायर किया, जिसमें न्यायमूर्ति अखिलेश चन्द्र द्वारा दिए गए न्याय-निर्णय के मुताबिक प्रबंधन का दावा पूरी तरह गलत है.

न्याय-निर्णय यह स्पष्ट करता है कि टाइम्स प्रबंधन गैर क़ानूनी हरकत कर रहा था. इस क़ानूनी लड़ाई में यदि कोई गड़बड़ी नहीं हुई तो न्याय के मान्य सिद्धांतों के मुताबिक कानून कामगारों के हक़ में ही फैसला देगा क्योंकि कंपनी प्रबंधन द्वारा गैर कानूनी हरकत के दस्तावेजी सबूत हैं. और इसी बीच जस्टिस मजीठिया वेतन आयोग की बात आ गई और प्रबंधन को लगा कि यदि मजीठिया वेतन आयोग देने की बात आयी तो मामला गंभीर हो जायेगा तो फिर क्यों ना सारे मामले को जड़ से ही ख़त्‍म कर दिया जाये. ना रहेगा बांस और ना बजेगी बांसुरी. सिर्फ और सिर्फ इसी सोच के तहत प्रबंधन ने प्रिंटिंग प्रेस बंद करने का निर्णय हठात लिया. और वह भी तब जब कि कई एस.एल.पी मुक़दमे सुप्रीम कोर्ट में लंबित पड़े हैं.

ये मुक़दमे हैं - एस. एल.पी. (क्रिमिनल) - १०१३४/२०१०, १८८४/२०११, १९५६/२०११ और १९५७/२०११ तथा इन सभी मुकदमों को एक साथ सुनते हुए सुप्रीम कोर्ट क़ी डबल बेंच ने विगत पांच जनवरी को यथास्थति बनाये रखने का आदेश पारित कर रखा है. आदेश कहता है "Issue notice. Status quo, as of today, shall be maintained." यह आदेश चारो कंपनियों द्वारा पटना हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति अखिलेशचन्द्रा के न्याय निर्णय के खिलाफ फाइल क़ी गई एस.एल.पीज को एक साथ क्लब करते हुए सुनते हुए जारी क़ी गई है. मगर देश की सबसे बड़ी अदालत के इस आदेश क़ी अवमानना करते हुए टाइम्स ऑफ़ इंडिया प्रबंधन ने प्रिंटिंग प्रेस बंद कर दिया.

उधर यूनियन क़ी ओर से बकाये वेतनमान की वसूली के लिए भी सुप्रीम कोर्ट में एक एस.एल.पी (सिविल) संख्या ३४०४५/२००९ दायर किया हुआ है. जिस में कोर्ट का अंतिम आदेश है - "Post for final disposal." इस केस को विगत २१ फरवरी को ही अंतिम डिस्पोसल के लिए सुना जाना था. मगर इसकी तारीख अब बढ़ कर ३१ अक्‍टूबर हो गई है. ऐसी स्थिति में जब क़ी क्रिमिनल एस.एल.पीज में यथास्थिति बनाये रखने का आदेश है, सिविल एस.एल.पी.फ़ाइनल डिस्पोसल के लिए तय है और साथ ही साथ इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट एक्ट का स्पष्ट प्रावधान है कि विवाद के चलते हुए सेवा शर्तों में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं किया जा सकता है टाइम्स प्रबंधन ने सभी कानूनों और सुप्रीम कोर्ट आदेशों को ताख पर रखते हुए प्रिंटिंग प्रेस बंद कर दिया.

और इस तरह टाइम्स ऑफ़ इंडिया न्यूज़पेपर एम्प्लायज यूनियन के नेताओं का पूर्ण शांति का रास्ता भी मालिकों के हृदय परिवर्तन करने में बुरी तरह नाकाम रहा. शायद इसलिए कि उद्योगपतियों को मजदूरों का खून पीने की आदत लग चुकी है. टाइम्स प्रबंधन को यूनियन का यह कानूनी रास्ता भी पसंद नहीं आया. क्योंकि उन्होंने मजदूरों का मनीसाना वेतन बोर्ड का बकाया पैसा खा कर पचा जाने का निर्णय कर रखा था. और साथ ही वो मजदूरों को जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड का बकाया भी पचा जाने की नीयत रखते थे. इसी नीयत से प्रबंधन ने कुम्हरार स्थित अपना प्रेस विगत १६ जुलाई से बंद कर दिया और ३९ परमानेंट और ५ कैजुअल मजदूरों को नौकरी से निकल बाहर कर दिया. तब से लेकर अभी तक ये हटाये गए मजदूर शांतिपूर्ण धरना पर बैठे हैं.

आज मजदूरों के ३१वें दिन यूनियन डिप्टी लेबर कमिश्नर पटना के कार्यालय से यूनियन कि शिकायत पर सुनवाई करते हुए जिस में कि यूनियन और प्रबंधन दोनों पक्षों को सुना गया था लेबर कमिश्नर ने टाइम्स प्रबंधन को अनुचित श्रम व्यव्हार (अनफेयर लेबर प्रक्टिसस) का दोषी मानते हुए एक शो कोज जारी किया है. डी.एल.सी. ने प्रबंधन को आइ. डी. एक्ट की धारा १९४७ की धारा ३३ (२) (बी)  के उल्लंघन का दोषी पाया है. डी. एल. सी. ने प्रबंधन को यूनियन के साथ १५.०९.१९९२ को संपन्न त्रिपक्षीय समझौता,  जिस में यह तय किया गया था कि उत्पादकता, कार्यक्षमता और गुणवत्ता में सुधर तथा उपयोगिता कि दृष्टि से आधुनिकीकरण में परस्पर सहयोग रखेंगे तथा इसके परिणामस्वरूप किसी भी कामगार, पत्रकार और गैर-पत्रकार कि छंटनी नहीं होगी. प्रबंधन इस समझौते के उल्लंघन के लिए भी दोषी पायी गयी है. जो आइ. डी.एक्ट. की धारा १८(१) का उल्लंघन है.

डी.एल.सी. ने अपने कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए प्रबंधन को कहा है कि ०५.०९.२०११ को ३.३० बजे यह बताएं कि क्यों नहीं प्रबंधन के खिलाफ आइ.डी.एक्ट की धारा ३३(२) (बी), २५ (ओ), १८(१) एवं २५ (टी) के उल्लंघन के लिए उनके खिलाफ अभियोजन क्यों नहीं दायर किया जाये. पत्र में कहा गया है कि उक्त तिथि को यदि प्रबंधन का स्पस्टीकरण नहीं प्राप्त होता है तो यह समझा जायेगा कि इस सम्बन्ध में प्रबंधन को कुछ नहीं कहना है.


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