सहारा के दावे से सब हैरान : कैसे निवेशकों को लौटाएगा 73000 करोड़ रुपये?

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सहारा इंडिया फाइनेंशियल कॉरपोरेशन एसआईएफएल ने मंगलवार को बाजार और नियामकों को अचंभित कर दिया। पैसे लौटाने की अब तक की अपनी सबसे बड़ी घटना के तहत सहारा इंडिया परिवार की पैराबैंकिग कंपनी सहारा इंडिया फाइनैंशियल कॉर्पोरेशन (एसआईएफसीएल)  इस साल दिसंबर तक अपने 1.9 करोड़ से अधिक जमाकर्ताओं को 73,000 करोड़ रुपए के डिपॉजिट का समयपूर्व भुगतान करेगी। यह रकम भारत के जीडीपी के एक फीसदी से कुछ ज्यादा है।

एसआईएफएल ने इस रकम को दिसंबर 2011 तक वापस करने का वादा किया है। भारतीय रिजर्व बैंक आरबीआई की डेडलाइन से पहले कम्पनी ने डिपॉजिट के पूर्व भुगतान का दावा किया है। एसआईएफएल के इस एलान से बांड बाजार पर पड़ने वाले संभावित असर को लेकर चिंता खड़ी हो गई है। आरबीआई ने कंपनी को अपना पूरा कारोबार समेटने के लिए चार साल का समय दिया था, परन्‍तु कंपनी ने अपनी पूरी देनदारी इसी साल के अंत तक चुकता करने का फैसला किया है।

अगर कंपनी सरकारी सिक्योरिटी बेचना शुरू करती है तो इससे बॉन्ड बाजार पर काफी असर पडे़गा। यह कंपनी रेसिडुअल नॉन बैंकिंग कंपनी आरएनबीसी कैटिगरी में आती है। इस तरह की कंपनियों को सिर्फ ट्रिपल ए वाली सरकारी सिक्योरिटी या कॉरपोरेट बॉन्ड में निवेश करने की इजाजत है। उल्‍लेखनीय है कि  एक अन्य घटनाक्रम में 2 महीने पहले ही भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने सहारा की दो अन्य कंपनियों को भी डिबेंचर के जरिए जुटाई गई कम से कम 6,588 करोड़ रुपये की रकम निवेशकों को लौटाने का आदेश दिया था।

बाजार सहारा के इस दावे से इसलिए भी हैरान है क्योंकि उसकी देनदारी इतनी नहीं है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग द इंडियन इकनॉमी सीएमआईई द्वारा जुटाए गए आंकड़ों के अनुसार मार्च 2010 के अंत तक सहारा की कुल देनदारी 13235 करोड़ रुपए थी। इससे एक साल पहले तक यह रकम 17640 करोड़ रुपए थी। मार्च 2010 के बाद के आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। हालांकि बैंकिंग रेगुलेटर के करीबी सूत्रों का कहना है कि सहारा की देनदारी दिसंबर 2010 तक घटकर 7500 करोड़ रुपए हो गई थी। सीएमआईई के मुताबिक मार्च 2010 तक कंपनी के निवेश की वैल्यू 6937 करोड़ रुपए थी। वहीं मार्च 2009 में यह रकम 10551 करोड़ रुपए थी।

एसआईएफसीएल ने एक सार्वजनिक नोटिस में कहा है कि कंपनी ने दिसंबर 2011 तक ही अपनी सारी देनदारी चुकाने का फैसला किया है। कंपनी ने कल अखबारों में विज्ञापन देकर कहा कि वह 4 दिसंबर तक अपने निवेशकों के तमाम पैसे लौटा देगी जो दरअसल 2015 तक लौटाने थे। बाज़ार में इस खबर को लेकर काफी खलबली मची हुई है और ज्यादातर विश्लेषक हैरान हैं। उन्हें यह समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर कंपनी कैसे इतनी बड़ी रकम का इंतज़ाम करेगी। विज्ञापनों के जरिए प्रकाशित नोटिस में कहा गया है कि कंपनी ने जून 2011 तक 73,000 करोड़ रुपये स्वीकार किए हैं। अगले कुछ महीनों में भुगतान किए जाने वाली वास्तविक राशि इससे काफी कम होगी।

रिजर्व बैंक की ओर से एक सूचना के मुताबिक इस रेजिडुअल नॉन बैंकिंग कंपनी (आरएनबीसी) ने बताया है कि उसने जून 2008 तक 59,076 करोड़ रुपये की रकम जमा की है। उसने 41,563 करोड़ रुपये की परिपक्वता राशि का भुगतान कर भी दिया है और ऐसे में जमाकर्ताओं के प्रति औसत देनदारी 17,513 करोड़ रुपये की ही बनती है। आरबीआई इसकी भी समीक्षा कर सकता है कि 73000 करोड़ की रकम किस प्रकार से भुगतान किया जाएगा। यही नहीं रेगुलेटर के मन में यह सवाल भी है कि क्या इसमें सहारा ग्रुप की दूसरी वित्तीय कंपनियों की देनदारी भी शामिल है।

वर्ष 2008 में एसआईएफसीएल को आरबीआई ने निर्देश दिया था कि वह 2015 तक अपना पूरा कारोबार समेट ले। आरबीआई ने अपने आदेश में यह भी कहा था कि जून 2009 तक जमाकर्ताओं को औसत देनदारी घटाकर 15,000 करोड़ रुपये, जून 2010 तक 12,600 करोड़ रुपये और जून 2011 तक 9,000 करोड़ रुपये कर लेना होगा। आरबीआई के एक प्रवक्ता ने बताया कि इस मामले में आगे कोई आदेश जारी नहीं किया गया है।

सितंबर 2009 के एक पुराने विज्ञापन में बताया गया था कि जमाओं के एवज में देनदारी घटकर 15,688 करोड़ रुपये तक आ गई थी। यह मार्च 2009 के बही खाते के आंकड़ों के मुताबिक है। अगर एसआईएफसीएल आरबीआई की समय सीमा के मुताबिक चलती है तो उसे 9,000 करोड़ रुपये कम चुकाने होंगे। सहारा के अधिकारियों ने बताया कि पुनर्भुगतान अभी शुरू नहीं हुआ है और यह एक महीने के अंदर शुरू कर दिया जाएगा। बड़े पैमाने पर पैसा लौटाने का यह काम देश भर में फैले कंपनी के 1508 सेवा केंद्रों के जरिए पूरा किया जाना है।

उल्‍लेखनीय है कि साल 2008 में आरएनबीसी के पास 3.94 करोड़ जमा खाते थे और इनके लिए 6.85 लाख एजेंट काम करते थे। आरबीआई के आदेश के बाद फरवरी 2011 में इन खातों की संख्या घटकर 1.91 करोड़ रह गई। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि पुनर्भुगतान की शर्तें क्या होंगी और इतने बड़े पैमाने पर पैसे लौटाने के लिए फंड कहां से आएगा। इसको लेकर आरबीआई भी पशोपेश में है कि सहारा इतनी बड़ी रकम जुटाएगी कहां से। उल्लेखनीय है कि सहारा इंडिया पर अभी तक किसी भी निवेशक की राशि डिफॉल्ट होने का आरोप नहीं लगाया गया है।

विशेषज्ञों की माने तो यदि सहारा इंडिया ने दिसंबर 2011 के पूर्व अपने बांड बेचना शुरू कर दिए तो न केवल बांड बाजार पर इसका विपरित असर पड़ेगा बल्कि केंद्र सरकार के लिए भी मुसीबत हो सकती है। सहारा की इस डेटलाइन को पूरा होने में केवल तीन माह का समय ही बचा है। वहीं रिजर्व बैंक ने इस विशाल रकम के बारे में जांच करने का विचार किया है। यह रकम इतनी ज्यादा है कि भारत की सबसे बड़ी एफएमसीजी कंपनी हिन्दलीवर का बाज़ार पूंजीकरण इसके सामने छोटा है।

सहारा द्वारा अपने निवेशकों के पैसे समय पूर्व वापस करने को लेकर विभिन्‍न अखबारों में छपी रिपोर्टों पर आधारित.


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