भारतीय मीडिया में कोई भी खबर आसानी से प्लांट कराई जा सकती है!

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सुमंत भट्टाचार्यादेश की मीडिया का हाल वाकई दुखदाई है। खासतौर पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का। कल की बड़ी खबर से साफ था, भारतीय मीडिया में कोई भी खबर आसानी से प्लांट कराई जा सकती है। उदाहरण है कांग्रेसनल रिसर्स सर्विसेस (सीआरएस) की रिपोर्ट। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बाबत सीआरएस की रिपोर्ट में जुटाई गई टिप्पणियों पर खबरिया चैनल्स ने कल दिन भर हंगामा ही बरपा दिया।

जिन्होंने भी रिपोर्ट पढ़ी और सीआरएस की वैधानिकता को समझा, उन्हें समझ में आ रहा था देश के मीडिया चैनल्स का दिमागी दिवालियापन। क्या ये वाकई दिवालियापन था या फिर सोची-समझी साजिश के तहत दर्शकों के गले कुछ उतारने की कोशिश हो रही थी। इस प्रश्न से आप जूझे, फिलहाल तो यह देखते हैं क्या है सीआरएस और क्या है यह रिपोर्ट। अमेरिकी शोध संस्थान कांग्रेसनल रिसर्च सर्विसेस (सीआरएस) की रिपोर्ट बताती है कि भारत में हाल के वर्षों में सबसे तेजी के साथ विकास करने वाला राज्य है गुजरात और इसका सेहरा बंधता है मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के माथे। दूसरे नंबर पर बिहार है और इसके लिए तारीफ की जानी चाहिए सूबे के हाकिम नीतीश कुमार की।

ऐसा इस रिपोर्ट का निहितार्थ हैं। एक सितंबर को यह रिपोर्ट सुपुर्द की गई अमेरिकी सरकार को और इसे सार्वजनिक किया अमेरिकी साइंटिस्ट फेडरेशन ने। सीआरएस ने रिपोर्ट अधिकृत तौर पर जारी नहीं की है क्योंकि सीआरएस सिर्फ अमेरिकी संसद और सांसदों के लिए काम करती है और इसकी रिपोर्ट को सामान्य गोपनीय दस्तावेजों की खांचे में रखा जाता है। फिलहाल तो सीआरएस की रिपोर्ट पर कोहराम सा मचा दिया है भारतीय मीडिया, खासतौर पर इलेक्ट्रानिक मीडिया ने। मानों भारतीय मीडिया कुछ यूं स्थापित करना चाहता है, अमेरिका यदि वाह-वाह कर दे तो कुछ और की फिर गुंजाइश ही नहीं बचती, अमेरिकी तारीफ और नोबल पुरस्कारों में कोई अंतर नहीं है।

अलबत्ता तो यह बता दें कि यह रिपोर्ट कोई अमेरिकी सरकार की वाह-वाह नहीं है। सीआरएस अमेरिकी संसद का महज एक थिंक टैंक है जो अमेरिकी संसद के पुस्तकालय का हिस्सा है। लिहाजा रिपोर्ट को अमेरिकी सरकार का अधिकृत दृष्टिकोण नहीं माना जा सकता है। सीआरएस विभिन्न मुल्कों की सरकारों की नीतियों पर सूचनात्मक रिपोर्ट तैयार करती है, जिनका मकसद अमेरिकी सांसदों और कानून निर्माताओं को अंतरदृष्टि देना है। यह भी बताना जरूरी है, सीआरएस की रिपोर्ट का आधार सेकेंडरी होता है, प्राइमरी नहीं। यानि इसके लिए सीआरएस अपनी ओर से जमीनी सर्वेक्षण नहीं कराती, अन्य सूचना माध्यमों से मिल रही जानकारी पर निर्भर रहती है। खासतौर पर मीडिया में उपलब्ध जानकारियों पर।

अब सवाल है, आखिर क्या सबब हो सकता है मोदी, नीतीश के प्रशासन की इस कदर कसीदे पढ़ने का। और इन कसीदों का निचोड़ क्या है। प्रशासन में भ्रष्टाचार की कमी और निवेश का माहौल। इन सरकारों के बाबत की गई तारीफ में ये दो शब्द प्रमुख हैं। रिपोर्ट में मौजूद अन्य तथ्यों के बरक्स इन दो शब्दों को तौल कर देखें तो अमेरिका का मकसद साफ हो जाता है।

आखिर क्या जरूरत  पड़ी इतने व्यापक शोध की।  बड़ा सवाल है, उधार के पैसों पर हिचकोले खाती अमेरिकी अर्थव्यवस्था का। अमेरिका एक ऐसा मुल्क है जो उधार के पैसों पर दादागिरी करता है। पिछली सदी में साठ के दशक में वामपंथी दलों की ओर से पुस्तिकाएं बांटी जाती थी, जिनका शीर्षक कुछ यूं होता था चीन देगा जवाब बरतानिया को...आज यह हकीकत में तब्दील हो चुका है...बरतानिया यानि इंग्लैंड ना सही, अमेरिका का सबसे बड़ा कर्जदाता मुल्क चीन ही है। इसका सीधा मतलब है, यदि अमेरिकी अर्थव्यवस्था डूबती है तो साथ में यह भारी जहाज एशिया की अर्थव्यवस्था को भी ले डूबेगा।

यही वजह है, सीआरएस तमाम अमेरिकी शोध संस्थानों की तरह ही एक ऐसा शोध संस्थान है जो दुनिया भर में अमेरिकी हितों की संभावनाओं की बनती-बिगड़ती हालातों पर नजर रखता है। बताता है, किन मुल्कों के किन क्षेत्रों में निवेश के सुरक्षित सियासी और सामाजिक हालात हैं। ताकि फैसला करते या बयान जारी करते वक्त अमेरिकी नीति निर्माताओं का नजरिया साफ रहे। बावजूद शोध में बुनियादी ईमानदारी बरती गई है, हर वाक्य और तथ्यों के रिफरेंस यानि संदर्भ स्रोतों को भी उल्लेखित किया गया है।

क्या है यह रिपोर्ट और क्या कहती है यह रिपोर्ट...

यह रिपोर्ट अमेरिकी सरकार का अधिकृत दृष्टिकोण नहीं है। सीआरएस एक ऐसी वैधानिक संस्था है जो अमेरिकी संसद के पुस्तकालय का एक शोध अंग है। जिसका प्रमुख दायित्व है, शोध के मार्फत अमेरिकी नीति निर्माताओं को किसी देश के बारे में तमाम बुनियादी जानकारियों से लबरेज रखना है, ताकि अमेरिकी सांसद या सरकार किसी देश के बारे में बयान देते या फैसला करते समय अमेरिकी हितों को ध्यान में रखें।

रिपोर्ट पूरी तरह से गोपनीय है, लिहाजा अमेरिकी सरकार इस पर कोई अधिकृत टिप्पणी कर भी नहीं सकती। रिपोर्ट को सार्वजनिक --- फेडरेशन ऑफ अमेरिकी साइंटिस्ट – ने किया है। इन सूचनाओं का महत्व किसी देश की सामाजिक और राजनीतिक बदलावों पर गहरी नजर रखना है, ताकि संबंधित देश के भावी या मौजूदा नेतृत्व के साथ अमेरिका बेहतर तालमेल बनाए रख सके। इसका सीधा मकसद होता है, बिना प्रत्यक्ष हस्तक्षेप के अमेरिका तमाम मुल्कों में हो रहे  बदलावों को अपने हिसाब से गाहेबगाहे तोड़ता मरोड़ता रहे। मसलन गुजरात के बारे में जिन प्रशंसापत्रों का मीडिया के एक सेक्शन में जोरशोर से जिक्र हो रहा है वह, 14 जनवरी 2011 को वालस्ट्रीट जर्नल में प्रकाशित -- गिलम्पसेस ऑफ इंडिया-माइनस द रेड टैप –आलेख का अंश है।

पूरी रिपोर्ट के संदर्भ स्रोतों में भी संतुलन नहीं है। समूची रिपोर्ट अंग्रेजी मीडिया में उपलब्ध संदर्भों पर टिकी हुई है। भाषाई मीडिया तक ना तो इस रिपोर्ट को तैयार करने वाला थिंक टैंक पहुंच पाया है और ना ही पहुंचने की कोशिश ही की है। गुजरात और बिहार के कसीदों को पढ़ते समय ध्यान में इन राज्यों की उपलब्धियों की बजाय अमेरिकी हितों के नजर से रिपोर्ट को देखना होगा। जो रिपोर्ट में ही मौजूद हैं।

गुजरात के बारे में रिपोर्ट में कहा गया, हाल के वर्षों में विदेशी निवेश बढ़ा है, जबकि भारत में मार्च 2011 में एफडीआई में 25 फीसदी की कमी आई  है जबकि जून 2011 में एफडीआई में 300 फीसदी का इजाफा हुआ है। यही वजह है, रिपोर्ट जिन दो कंपनियों के गुजरात में निवेश का जिक्र कर रही हैं, वो दोनों ही बहुराष्ट्रीय मोटर कंपनियां है, मित्सीबुशी और जनरल मोटर। यही रिपोर्ट बताती है कि एफडीआई में कमी की वजह नौकरशाही का हर्डल यानि दखलअंदाजी है। गुजरात के बारे में रिपोर्ट कहती है, गुजरात में ब्यूरोक्रेसी की दखलअंदाजी कम हुई है। ये दोनों ही बातें अमेरिकी निवेश हितों को साधती हैं।

अब जरा इस रिपोर्ट का व्यापकता में तौला जाए, ताकि अमेरिकी मंशा साफ हो सके। रिपोर्ट में भारत के बेहद खस्ताहाल इंफ्रास्ट्रक्चर का जिक्र किया गया है। साथ ही ये भी बताया गया है कि आने वाले सालों में भारत में निवेश की कितनी बड़ी संभावनाएं है। रिपोर्ट बताती है, भारत को 2030 तक ऊर्जा के क्षेत्र में 1.24 खरब डॉलर निवेश की जरूरत है। ट्रांसपोर्ट के क्षेत्र में भारत को 392 खरब डॉलर के निवेश की आवश्यकता है। वहीं बढ़ती आबादी को देखते हुए अगले 20 सालों में भारत में स्वास्थ्य के क्षेत्र में 143 अरब डॉलर की निवेश की जरूरत पड़ेगी।

रिपोर्ट अपने सांसदों का नजरिया साफ करने के लिए वर्ल्ड बैंक के जुटाए तथ्यों को भी परोसती है। वर्ल्ड बैंक के मुताबिक — गंदगी की वजह से भारत को हर साल 54  अरब डॉलर की चपत लगती है। जो असमायिक मौतों, खस्ता इलाज और इन सब वजहों से भारत से पर्यटकों की बेरुखी के तौर पर नजर आता है। बावजूद भारत में फॉरेन डायरेक्ट इनवेस्टमेंट  की अनंत संभावनाओं को अमेरिकी शोध संस्थान अपनी सरकार को अच्छी तरह से वाकिफ कराती है। रिपोर्ट बताती है – मार्च 2011 के दौरान भारत में एफडीआई 25 फीसदी की कमी आई है, वहीं जून 2011 में एफडीआई में 300 फीसदी का उछाल आया है। निवेश में कमी की वजह नौकरशाही की दखलअंदाजी, भ्रष्टाचार और मुद्रास्फीति को बताया गया है।

अपने नीति निर्माताओं को संक्षेप में आगाह करती हुए ये रिपोर्ट बताती है कि भारत उनके लिए कितना महत्वपूर्ण है। रिपोर्ट बताती है – अमेरिका ने सन 2010 में भारत को 19.222 अरब डॉलर का निर्यात किया, जबकि भारत से 29.531 अरब डॉलर का आयात किया। अमेरिका को आयात निर्यात के इस खेल में कुल 10.309 अरब का घाटा हुआ है। अब जरा इन आंकड़ों के बरक्स रिपोर्ट को तौलें  तो साफ समझ में आता है, अमेरिकी शोध संस्थान  की यह रिपोर्ट किन बदलावों का जिक्र कर रही है और क्यों सराह रही है।

लेखक सुमंत भट्टाचार्या नए लांच हुए राष्ट्रीय हिंदी न्यूज चैनल न्यूज एक्सप्रेस में बतौर ईपी कार्यरत हैं. सुमंत कई बड़े अखबारों और मैग्जीनों में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. उनसे संपर्क This e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it के जरिए किया जा सकता है.


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