क्‍या फेसबुक पर सच लिखने की सजा निलंबन है?

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फेसबुक पर टिप्पणी लिखने के कारण निलंबन का यह अनोखा मामला है। 17 सितंबर 2011 को बिहार विधान परिषद में कार्यरत मुसाफिर बैठा, सहायक (हिंदी प्रकाशन) को निलंबित कर दिया गया। मुसाफिर बैठा ने अपने भविष्य निधि की राशि से कर्ज लेना चाहते थे। लेकिन इसमें लाल फीताशाही को वह झेल नहीं पाये। साहित्य और लेखन में रूचि के कारण उन्होंने अपने साथ हुए व्यवहार को फेसबुक पर लिख डाला।

आठ सितंबर 2011 को उन्होंने फेसबुक पर लिखा- ''मुझे अपने भविष्य निधि खाते पर आधारित ऋण लेना है, आवेदन दिया है, कार्य की प्रगति जानने के लिए सम्बंधित कर्मचारियों, अधिकारियों के पास गया तो एक ने कहा कि आपका भविष्य निधि अकाउंट अपडेट नहीं है, ऐसा होने पर ही ऋण मिल सकेगा. जब भविष्य निधि अकाउंट अपडेट करने के लिए जिम्मेदार अधिकारी से इसके बारे में मैं ने पूछा कि मेरा खाता सात सालों से अपडेट क्यों नहीं हुआ है तो साहब ने प्रतिप्रश्न किया और लगभग डाँटते हुए कहा- इतने दिनों से कहाँ सोये हुए थे आप? मैं ने कहा, काम आपका और कोतवाल बन उलटे मुझे डांट रहे हैं? अब लीजिए, आरटीआई झेलिये.....और यह करने जा रहा हूँ।''

यह टिप्पणी सरकारी कार्यालयों में बाबुओं की मनमानी कार्यप्रणाली से निराश, लेकिन सूचनाधिकार से लैस एक आम नागरिक की पीड़ा और संघर्ष का अच्छा उदाहरण है। इसके एक-दो दिन बाद मुसाफिर बैठा ने फेसबुक पर लिखा- ''दीपक तले अँधेरा ! यह लोकोक्ति है जो बहुत से व्यक्तियों, संस्थाओं और सत्ता प्रतिष्ठानों पर लागू होता है. बिहार विधान परिषद जिसकी मैं नौकरी करता हूँ, वहाँ विधानों की धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं. कुछ यहाँ नियुक्त कर्मी ऐसे हैं जिनकी नियुक्ति के लिए जिस दिन निर्णय हुआ उसी दिन या एक दो दिन के बाद ही उनको नियुक्त भी कर लिया गया. न कोई सार्वजनिक नोटिस-अधिसूचना न ही मीडिया में विज्ञापन. किस लोकतंत्र में रह रहे हैं हम?''

उक्त टिप्पणी के कारण विधान परिषद के सभापति के आदेश पर मुसाफिर बैठा को निलंबित कर दिया गया है। निलंबन पत्र इन शब्दों में है-'' श्री मुसाफिर बैठा, सहायक (हिंदी प्रकाशन) को परिषद के अधिकारियों के विरुद्ध असंवैधानिक भाषा का प्रयोग करने तथा दीपक तले अँधेरा, यह लोकोक्ति है जो बहुत से व्यक्तियों, संस्थाओं और सत्ता प्रतिष्ठानों पर लागू होता है, बिहार विधान परिषद, जिसकी मैं नौकरी करता हूँ, वहाँ विधानों की धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं- इस तरह की टिप्पणी करने के कारण तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाता है. सभापति, बिहार विधान परिषद के आदेश से....''

फिलहाल यह मामला दिलचस्प मोड़ पर आ गया है। बिहार में सुशासन का हल्ला बहुत सुनने को मिलता है। नीतीश कुमार बिहार में लोकायुक्त को मजबूत बनाने की बात करते हैं। लेकिन उन्होंने सुशासन के सूचना कानून को ही बदल डाला है। बिहार में अपराधियों को कुकर्मों की सजा देने के बजाय माननीय या ठेकेदार बनाकर महिमामंडित किया जा रहा है। पुलिस जुल्म के नमूने रोज देखने को मिल रहे हैं। इतने बड़े सुशासन के लिए ऐसी छोटी-मोटी कुरबानियां तो देनी ही होंगी।

अब मुसाफिर बैठा के निलंबन ने अन्ना आंदोलन से जुड़े कई सवालों को सतह पर ला दिया है। क्या श्री बैठा का यह पूछना गलत था कि मेरा खाता सात सालों से अपडेट क्यों नहीं हुआ? अगर उन्हें जायज हक से वंचित और परेशान किया जा रहा था तो इसे सार्वजनिक मंच पर लाना अपराध कैसे हुआ? यही बात अगर अखबार में संपादक के नाम पत्र में लिखी गयी होती तो क्या उस पर भी निलंबन होता?

मुसाफिर बैठा ने बिहार विधान परिषद में नियुक्तियों को लेकर जो सवाल उठाये हैं, वह भी जांच का विषय है। इसी विधानमंडल में गुलाम सरवर के जमाने में तीन-चार सौ नौकरियों में मनमानी को स्वर्गीय विधायक महेंद्र सिंह ने उठाया था। मामला हाईकोर्ट पहुंचा और गलत नियुक्तियां रद्द हुईं। भविष्य निधि खाते को सात साल से अपडेट नहीं करना सुशासन नहीं है। अगर नीतीश कुमार सचमुच सुशासन चाहते हैं, तो उन्हें राज्य में ऐसे परिवेश की गारंटी करनी होगी, जो ऐसे सवालों को सहिष्णुतापूर्वक ले। लेकिन सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 को गैरकानूनी तरीके से बदलकर, कमजोर करके नीतीश कुमार ने नौकरशाहों को स्पष्ट संकेत दिया है कि वह कैसा सुशासन चाहते हैं। मुसाफिर बैठा के साथ अन्याय हुआ तो अन्ना समर्थकों के बीच खिल्ली ही उडे़गी, क्योंकि नीतीश कुमार ने भ्रष्टाचार विरोधी अभियान में बड़े-बड़े वायदे कर रखे हैं।

लेखक विष्‍णु राजगढि़या झारखंड में वरिष्‍ठ पत्रकार तथा आरटीआई कार्यकर्ता हैं.


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