खंडूरी ईमानदार हैं तो जरा सारंगी के तार छेड़ कर दिखाएं!

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क्या आपको लगता है कि खंडूरी कुछ अलग, कुछ नया कर पाएंगे? यह सवाल उत्तराखंड के एक पत्रकार ने मुझसे पूछा तो मैंने प्रश्नवाचक मुद्रा में सिर हिला दिया. उन्होंने संक्षेप में समझाया- ''सब सेटिंग गेटिंग का खेल है. खंडूरी और निशंक में आपसी गठबंधन है. अंदरखाने डील हो चुकी है. तू मेरी धोती ना खोल, मैं भी तुझे नहीं छेड़ंगूा. निशंक के समय में जो भ्रष्टाचार हुए उसकी किसी भी जांच में निशंक नहीं फंसने वाले, यह पहले से तय हो चुका है.

तभी तो निशंक आराम की मुद्रा में हैं, प्रसन्न हैं. कुर्सी छोड़ने का दुख जो होना था हुआ, लेकिन उससे बड़ी खुशी ये है कि उन्हें जांच वगैरह में घसीटकर जेल नहीं भेजा जाएगा. इसी समझौते पर निशंक ने कुर्सी खंडूरी को दिया. और, भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व को भी क्या चाहिए था. बस यही कि उत्तराखंड में आने वाले विधानसभा चुनाव में पार्टी की इज्जत बच जाए, सो निशंक की जगह खंडूरी को इमेज बिल्डिंग के काम में लगा दिया गया. रोजाना घोषणाएं कर रहे हैं खंडूरी. भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़ी बड़ी बातें बोल रहे हैं. अन्ना को अपना आदर्श बता रहे हैं. टीम अन्ना के लोगों से मीटिंग भी कर चुके हैं.

पर क्या एक सीधे और साफ सवाल का जवाब खंडूरी दे सकते हैं? उत्तराखंड में भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्य शुरू करने का दावा करने वाले मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूरी को अपने सीएम के पहले कार्यकाल के दौरान खुद के सचिव रहे पी. के. सारंगी के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा देंगे? खंडूरी ने पहले मुख्यमंत्रित्व कार्यकाल में आईएएस अधिकारी पी. के. सारंगी को मुख्यमंत्री का प्रधान सचिव नियुक्त किया था. आरोप है कि सारंगी के माध्यम से सीएम और उनके खास लोगों ने जमकर वसूली की. तब भी भ्रष्टाचार के कई मामले सामने आए थे. खंडूरी अगर वाकई करप्शन के खिलाफ लड़ने के प्रति ईमानदार हैं तो उन्हें सारंगी के खिलाफ सभी मामलों की जांच के लिए मुकदमा दायर करने का आदेश जारी कर देना चाहिए.''

इस विश्लेषण, फीडबैक ने चौंकाया नहीं. देश-प्रदेश में राजनीति जिस लेवल पर है, उसमें मोहभंग और मूर्तिभंजन होना कोई नई बात नहीं है. जिस खंडूरी को लोग ईमानदार मानते हैं, उन्हीं खंडूरी पर गंभीर आरोप लगने लगे. उनका पहला कार्यकाल उनके पीछे भूत की तरह पड़ गया है. उत्तराखंड राज्य में प्रदेश युवक कांगेस ने सारंगी के खिलाफ मुकदमें की मांग को लेकर प्रदर्शन किया.

युवक कांग्रेस ने खंडूरी को निशाने पर लेते हुए भाजपा नेताओं के चरित्र का पर्दाफाश करना शुरू कर दिया है. हालांकि सेंटर में कांग्रेस सबसे ज्यादा करप्ट पार्टी के तौर पर देश की जनता के निशाने पर है लेकिन उत्तराखंड में कांग्रेस के विपक्ष में होने के कारण वहां भाजपा के घपलों-घोटालों को उठाने बताने का मौका मिला हुआ है. आजकल की राजनीति भी यही है. जब सत्ता से बाहर रहो तो बड़ी बड़ी बातें करो और सत्ता में घुसते ही उसी रास्ते पर चल पड़ो जिस पर पहले वाला सत्ताधारी चलता था.

उत्तराखंड का दुर्भाग्य यही है कि वहां भाजपा ने अपने राज में केवल करप्शन दिया, तो विपक्षी पार्टी कांग्रेस केंद्रीय सत्ता में घपलों-घोटालों के लिए कुख्यात है और यह पार्टी अगर उत्तराखंड में सत्ता में आती है तो यहां भी कोई अलग तस्वीर नहीं बनेगी. शायद उत्तराखंड की किस्मत में घटिया नेता, गंदी राजनीति और परम भ्रष्टाचार लिखा हुआ है.  सूत्रों का कहना है कि खंडूरी को सीएम की कुर्सी देने का ड्रामा भाजपा की एक सुनियोजित चाल है. जब तक निशंक सीएम की कुर्सी पर रहे, भाजपा के शीर्ष नेता उन्हें जमकर निचोड़ते रहे. कहने वाले कहते हैं कि निशंक भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं को साधने के चक्कर में भ्रष्टाचार के दलदल में फंसते गए.

पर यह भी सच है कि इन्नोसेंट निशंक भी नहीं थे. इसी बहाने उन्होंने अपने लिए भी खूब तीन-तिकड़म किए, साथ ही अपने आकाओं को जमकर ओबलाइज किया. पर उत्तराखंड में चुनाव नजदीक आते देख और भाजपा की हालत बेहद खराब भांपकर शीर्ष भाजपा नेतृत्व ने निशंक को पूरे विश्वास में लेकर कुर्सी खंडूरी के हवाले करने का खेल खेला. इस एक तीर से कई शिकार कर दिए गए. निशंक और भाजपा के खिलाफ जो तात्कालिक जनाक्रोश उत्तराखंड में था, उसे शांत कर दिया गया. चुनाव में कुछ ही महीने बाकी हैं, ऐसे में खंडूरी कोई बड़ा फेरबदल या कोई बड़ा काम नहीं कर सकते, सो उन्हें सीएम बनाकर भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व ने निशंक के कार्यकाल के हुए स्याह-सफेद को छूने की जगह क्रांतिकारी ऐलान, कोरी घोषणाएं, भावुक भाषणबाजी करने जैसे काम दे दिए.

और, खंडूरी कर भी यही रहे हैं. एक दो या तीन महीने बाद चुनाव आयोग के हवाले यह राज्य चला जाएगा क्योंकि चुनावी अधिसूचना जारी होने के बाद मुख्यमंत्री और प्रशासन कुछ खास नहीं कर सकता. अगर खंडूरी की भाषणबाजी, घोषणाएं काम कर गईं और भाजपा चुनाव में जीत गई तो निशंक के पास फिर मौका रहेगा सीएम बनने का. सूत्रों का कहना है कि निशंक को राष्ट्रीय नेतृत्व ने आश्वस्त कर रखा है कि अगर भाजपा की वापसी होती है तो निशंक की दावेदारी सबसे पहले होगी. संभव है, तब खंडूरी को उनकी उम्र या संगठन में बड़ा काम या पार्टी को टूटने से बचाने की दुहाई देकर सीएम की कुर्सी से दूर रहने को कहा जा सकता है. ऐसा इसलिए क्योंकि निशंक के साथ भाजपा के बड़े नेताओं की ट्यूनिंग ज्यादा ठीकठाक है.

भ्रष्टाचार के खिलाफ अलख जगाने की बात कहने वाले खंडूरी के नाक के नीचे भी खेल-तमाशे शुरू होने की चर्चाएं होने लगी हैं. देखना है कि सिर्फ भाषणबाजी करने के लिए लाए गए खंडूरी चुनाव होते-होते तक खुद को सीएम की अपनी दूसरी पारी में बेदाग रख पाते हैं या पहली पारी की तरह किन्हीं सारंगियों के बिगड़े सुरों के सम्मोहन में फंसकर रही-सही छवि भी गंवा बैठते हैं.

इसमें किसी को कोई शक नहीं कि निशंक से बेहतर सीएम साबित होंगे खंडूरी पर शक सबको इस पर है कि क्या निशंक के समय के घपले-घोटालों के असली आरोपियों को जेल की हवा खिलाने की ताकत रखते हैं खंडूरी या फिर उन्हें सीएम की कुर्सी निशंक को न छूने की शर्त पर मिली है? वैसे, राजनीति में अपनी पार्टी के लोगों और घपलों को बचाने का खेल खूब होता है, सो, खंडूरी से भी कोई उम्मीद नहीं की जा सकती. लेकिन विश्लेषक कहते हैं कि इस ड्रामे को उत्तराखंड की जनता पूरे ध्यान से देख रही है कि और चुनावों में नेताओं को पर्याप्त सबक मिल सकता है.

भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत की रिपोर्ट


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