झारखंड में कुख्यात लोग बनेंगे सूचना आयुक्त!

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रांची : झारखंड में सूचना आयोग के गठन को लेकर एक विवाद उत्पन्न हो गया है। चयन समिति द्वारा दस अक्तूबर को गुपचुप तरीके से तीन लोगों के नाम तय करने की बात सामने आयी है। लेकिन इन नामों को अब तक रहस्यमय तरीके से गोपनीय रखा जा रहा है। पारदर्शिता के कानून के मामले में ऐसी गोपनीयता से सब हैरान हैं। मीडिया में जिन तीन नामों की चर्चा सामने आयी है, उन नामों से भी सबको हैरानी हो रही है।

ज्यादातर नागरिक तो इन तीनों के बारे में कुछ जानते ही नहीं। जो लोग इन्हें जानते भी हैं, वे इनके किसी अच्छे कामों के कारण नहीं बल्कि इनके बुरे कामों के कारण जानते हैं। सूचना कानून के अनुसार सूचना आयुक्त के लिए योग्यता है विशिष्ट ज्ञान वाले विख्यात व्यक्ति। लेकिन यहां कुख्यात लोगों को सूचना आयुक्त बनाने की चर्चा सामने आ रही है।

यही कारण है कि आरटीआइ फोरम ने महामहिम राज्यपाल को ज्ञापन देकर सूचना आयोग के गठन में मनमानी रोकने की मांग की है। फोरम के अध्यक्ष श्री बलराम के अनुसार आज 12 अक्तूबर 2011 को सूचना कानून के छह वर्ष पूरे हुए। लेकिन आज ही झारखंड में इस कानून का मखौल किया गया है। श्री बलराम ने महामहिम राज्यपाल से मांग की गयी है कि राज्य सूचना आयुक्तों की नियुक्ति हेतु अपारदर्शी, गोपनीय, मनमाने एवं संदेहास्पद तरीके से चयनित अयोग्य लोगों की सूची को वापस लौटाकर योग्य लोगों के चयन की प्रक्रिया शुरू करे।

झारखंड आरटीआइ फोरम द्वारा राज्यपाल को सौंपा गया ज्ञापन इस प्रकार है-

सेवा में,

महामहिम राज्यपाल,

झारखंड

विषय - राज्य सूचना आयोग का अपारदर्शी एवं मनमाने तरीके से गठन एवं अधिनियम के प्रावधान की अनदेखी करके अयोग्य लोगों का चयन रोकने संबंधी निवेदन

मान्यवर,

आज 12 अक्तूबर 2011 को सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 को लागू हुए छह वर्ष पूरे हुए। लेकिन आज ही झारखंड में इस अधिनियम की भावना एवं प्रावधानों का मखौल करने और नागरिकों के अधिकार पर कुठाराघात करने संबंधी राज्य सरकार की साजिशों से हम आहत हैं। यही कारण है कि हम सूचना का अधिकार का उपयोग करने वाले और इसके लिए जनजागरूकता से जुड़े नागरिक आपसे झारखंड राज्य सूचना आयोग का अपारदर्शी एवं मनमाने तरीके से गठन एवं अधिनियम के प्रावधान का मखौल करते हुए अयोग्य लोगों के चयन पर रोक संबंधी निवेदन करना चाहते हैं।

झारखंड राज्य सूचना आयोग का कार्यकाल 29 जुलाई 2011 को समाप्त हो गया। लेकिन राज्य सरकार ने नये राज्य सूचना आयोग के गठन के लिए कोई पारदर्शी एवं सार्वजनिक प्रक्रिया नहीं अपनायी। इसके बदले गुपचुप, मनमाने एवं संदिग्ध तरीके से अयोग्य लोगों को सूचना आयोग के गरिमामयी पद पर बैठाने की साजिश की गयी। इसके लिए कई गोपनीय बैठकों के संबंध में अखबारों में खबरें भी आयीं। लेकिन राज्य सरकार द्वारा इस संबंध में एक बार भी कोई आधिकारिक सूचना नागरिकों को नहीं दी गयी। पारदर्शिता के कानून के मामले में यह गोपनीयता दुर्भाग्यपूर्ण है।

आज दिनांक 12 अक्तूबर 2011 को दैनिक हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित समाचार के अनुसार कतिपय अयोग्य एवं संदिग्ध आचरण के लोगों को सूचना आयुक्त बनाने की प्रक्रिया चल रही है। इस संबंध में हम आपका ध्यान इन बिंदुओं की ओर आकृष्ट करना चाहते हैं-

1. सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धारा 15(5) के अनुसार विविध विषयों में व्यापक ज्ञान और अनुभव वाले समाज के प्रख्यात व्यक्तियों को सूचना आयुक्त बनाना है। इसमें यह भावना स्पष्ट है कि आयोग का गठन व्यापक मानदंडों पर आधारित हो। लेकिन इसके गठन प्रक्रिया संबंधी नियमावली के अभाव में पूर्व में राज्य सूचना आयुक्तों के चयन को लेकर विवाद सामने आते रहे हैं, जो लोकतांत्रिक परंपराओं के लिए चिंताजनक है।

2. सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धारा 27 के अंतर्गत इस अधिनियम के क्रियान्वयन हेतु सरकार को नियम बनाने की शक्ति प्राप्त है। राज्य सूचना आयोग का गठन एक महत्वपूर्ण दायित्व होने के नाते इसके गठन की प्रक्रिया संबंधी नियमावली बनानी चाहिए थी। ऐसी नियमावली के अभाव में आयोग के गठन में अपारदर्शिता, पक्षपात, अयोग्य के चयन और अन्य प्रकार के विवाद की संभावना होती है। लेकिन राज्य सरकार ने मनमाने तरीके से आयोग गठन की मंशा के कारण अब तक कोई नियमावली नहीं बनायी और न ही कोई पारदर्शी प्रक्रिया अपनायी।

3. यही कारण है कि हमने दिनांक 08.08.2011 को माननीय मुख्यमंत्री, झारखंड को एक ज्ञापन सौंपकर राज्य सूचना आयोग गठन नियमावली बनाने का निवेदन किया था (प्रतिलिपि संलग्न)। लेकिन राज्य सरकार ने ऐसा करने के बजाय गुपचुप एवं संदिग्ध तरीके से आयोग के गठन की साजिश जारी रखी।

4. ज्ञात हो कि झारखंड में सूचना आयोग के गठन हेतु कोई पारदर्शी प्रक्रिया नहीं अपनाये जाने के कारण गत वर्षों में झारखंड में दो बार चयन समिति द्वारा मुख्य सूचना आयुक्त/सूचना आयुक्तों का चयन करके महामहिम राज्यपाल के पास अनुशंसा भेजे जाने के बावजूद दोनों बार महामहिम राज्यपाल ने अपनी शक्तियों एवं विवेकाधिकार का उपयोग करते हुए अनुशंसा लौटा दी और चयन के बावजूद दोनों बार नियुक्तियां नहीं हो पायीं। पहली बार ऐसा मधु कोड़ा के मुख्यमंत्रित्व काल में हुआ था जब मुख्य सूचना आयुक्त एवं सूचना आयुक्तों की नियुक्ति संबंधी अनुषंसा को महामहिम राज्यपाल ने लौटा दिया। दूसरी बार वर्ष 2010 में भी शिबू सोरेन के मुख्यमंत्रित्व काल में मुख्य सूचना आयुक्त की नियुक्ति संबंधी अनुशंसा को महामहिम राज्यपाल ने लौटा दिया। इसके कारण लगभग तीन साल तक राज्य में मुख्य सूचना आयुक्त का पद रिक्त रह गया।

5. इस संदर्भ में हम भारत सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के परिपत्र संख्या एबी-14017/36/94- इएसटीटी.(आरआर) दिनांक 25.10.1994 का उल्लेख करना चाहते हैं (प्रतिलिपि संलग्न)। यह ऐसे वैज्ञानिक, तकनीकी अथवा विशिष्ट पदों पर नियुक्ति के संबंध में है जिनमें विशिष्ट पृष्ठभूमि, ज्ञान एवं अनुभव वाले समुचित एवं योग्य व्यक्तियों का चयन किया जाना है। इसके बिंदु 3.1.(पप) का अंश इस प्रकार है-

“It is to be kept in mind that as a rule, appointments in Government are to be made on the basis of open advertisement. Therefore, proper advertisement of vacancies to be filled up by direct recruitment is an essential requirement”

6. इसी तरह, ऐसे पदों पर नियुक्ति के संदर्भ में हाल ही में माननीय सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय भी महत्वपूर्ण मार्गदर्शक है। श्री पी. जे. थामस की मुख्य सतर्कता आयुक्त पद पर नियुक्ति रद्द करने के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने यह आदेश सुनाया था।

TRANSPARENT SELECTIONS ARE MANDATED BY SUPREME COURT

Supreme Court Judgment on P J Thomas’ appointment as CVC, in the Supreme Court of India, Civil Original Juridiction, Writ Petition (C) No. 348 OF 2010 with Writ Petition (C) No. 355 of 2010.

The Supreme Court’s recent verdict on CVC (Central Vigilance Commission) Selections also applies to selections of Information Commissioners and members of Human Rights Commission, Minorities Commission, and other constitutional authorities.

DIRECTIONS:

I. HIGH COURTS MUST ENTERTAIN WHEN APPOINTMENTS ARE CHALLENGED. “We reiterate that Government is not accountable to the courts for the choice made but Government is accountable to the courts in respect of the lawfulness/ legality of its decisions when impugned under the judicial review jurisdiction.”(Pg 52, Point 45)

II. RECOMMENDATION MADE WITHOUT DUE PROCEDURE ARE NULL & VOID. “If a duty is cast under the proviso to Section 4(1) on the High Powered Committee (HPC) to recommend to the President the name of the selected candidate, the integrity of that decision making process is got to ensure that the powers are exercised for the purposes and in the manner envisaged by the said Act, otherwise such recommendation will have no existence in the eye of law.” (Page 2, point 2).

III. CVC IS DEFINED AS AN “INTEGRITY INSTITUTION”. (THE SAME MAY APPLY TO INFORMATION COMMISSIONS.) “In our opinion, CVC is an integrity institution. This is clear from the scope and ambit (including the functions of the Central Vigilance Commissioner) of the 2003 Act. It is an Institution which is statutorily created under the Act. It is to supervise vigilance administration.

The 2003 Act provides for a mechanism by which the CVC retains control over CBI. That is the reason why it is given autonomy and insulation from external influences under the 2003 Act.” (Page 22, Point 26.)

IV. THE KEY ISSUE IS INSTITUTIONAL INTEGRITY, NOT PERSONAL INTEGRITY. “The constitution of CVC as a statutory body under Section 3 shows that CVC is an Institution. The key word is Institution.

We are emphasizing the key word for the simple reason that in the present case the recommending authority (High Powered Committee) has gone by personal integrity of the officers empanelled and not by institutional integrity.” (Point 28, page 30)

V. RECOMMENDATION OF SELECTION COMMITTEE MUST SHOW A PROPER THOUGHT-PROCESS. “The word ‘recommendation’ in the proviso stands for an informed decision to be taken by the HPC on the basis of a consideration of relevant material keeping in mind the purpose, object and policy of the 2003 Act…Thus, while making the recommendations, the service conditions of the candidate being a public servant or civil servant in the past is not the sole criteria.” (Point 28, page 31-32).

VI. THE LOGIC OF DECISION-MAKING PROCESS MUST BE SELF-EVIDENT. “Appointment… must satisfy not only the eligibility criteria of the candidate but also the decision making process of the recommendation. The decision to recommend has got to be an informed decision keeping in mind the fact that CVC as an institution has to perform an important function of vigilance administration. (Point 33, page 36)

VII. THE TOUCHSTONE IS PUBLIC INTEREST. “When institutional integrity is in question, the touchstone should be ‘public interest’ which has got to be taken into consideration by the HPC and in such cases the HPC may not insist upon proof ” (i.e. conclusive proof of the candidate being corrupt or ineligible.)… While making recommendations, the HPC performs a statutory duty. Its duty is to recommend. While making recommendations, the criteria of the candidate being a public servant or a civil servant in the past is not the sole consideration. The HPC has to look at the record and take into consideration whether the candidate would or would not be able to function…” (Point 33, page 37)

VIII. DON’T CONSIDER ONLY CIVIL SERVANTS. “No reason has been given as to why in the present case the zone of consideration stood restricted only to the civil service.” (Point 55, page 68).

IX. STEP-BY-STEP INSTRUCTIONS FOR SELECTION PROCEDURE, INCL. HOW LIST OF CANDIDATES WILL BE PREPARED (Point 55, pg 68 onwards):

(a) RECORD REASONS, ESPECIALLY IF THERE’S DISSENT. “As in the present case, if one Member of the Committee dissents that Member should give reasons for the dissent and if the majority disagrees with the dissent, the majority shall give reasons for overruling the dissent. This will bring about fairness-in-action. Since we have held that legality of the choice or selection is open to judicial review we are of the view that if the above methodology is followed transparency would emerge which would also maintain the integrity of the decision making process.”

(b) DON’T RESTRICT SELECTION TO CIVIL SERVANTS. “In future, the zone of consideration should be in terms of Section 3(3) of the 2003 Act. It shall not be restricted to civil servants.”

(c) IMPECCABLE INTEGRITY. “All the civil servants and other persons empanelled shall be outstanding civil servants or persons of impeccable integrity.”

(d) RATIONAL CRITERIA, RECORDING OF REASONS. “The empanelment shall be carried out on the basis of rational criteria, which is to be reflected by recording of reasons and/or noting akin to reasons by the empanelling authority.”

(e) FIXING ACCOUNTABILITY FOR EMPANELMENT. “The empanelment shall be carried out by a person not below the rank of Secretary to the Government… in the concerned Ministry.”

(f) DON’T WITHHOLD INFORMATION. “The empanelling authority, while forwarding the names of the empanelled officers/persons, shall enclose complete information, material and data of the concerned officer/person, whether favourable or adverse. Nothing relevant or material should be withheld from the Selection Committee. It will not only be useful but would also serve larger public interest and enhance public confidence if the contemporaneous service record and acts of outstanding performance of the officer under consideration, even with adverse remarks is specifically brought to the notice of the Selection Committee. ”

(g) TRANSPARENT SCREENING PROCEDURE. “The Selection Committee may adopt a fair and transparent process of consideration of the empanelled officers.”

X. A PRECEDENT HAS BEEN SET FOR QUASHING OF COMMISSIONER’S APPOINTMENT BY COURT. No need for roundabout methods to remove CIC/SIC! “The impugned appointment of Shri P.J. Thomas as Central Vigilance Commissioner is quashed.” (Point 56, page 71).

7. इस आलोक में यह स्पष्ट है कि झारखंड राज्य सूचना आयोग गठन प्रक्रिया नियमावली के अभाव में मनमाने एवं गोपनीय तरीके से अयोग्य लोगों को राज्य सूचना आयुक्त बनाया जाना पूरी तरह जनविरोधी, अनुचित, अलोकतांत्रिक, असंवैधनिक एवं अधिनियम के प्रावधानों के खिलाफ है।

8. झारखंड में ऐसे महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति हेतु योग्यता के संबंध में अधिनियमों में स्पष्ट रूप से किये गये प्रावधानों की मनमानी व्याख्या करके अयोग्य के चयन के उदाहरण पहले भी देखे गये हैं। झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण परिषद के अध्यक्ष पद पर श्री शाहदेव की नियुक्ति के संबंध में माननीय झारखंड उच्च न्यायालय ने अपने महत्वपूर्ण आदेष में इस संबंध में स्पष्ट निर्देष देते हुए राज्य सरकार के विरूद्ध गंभीर एवं तीखी टिप्पणियां करते हुए श्री शाहदेव को तत्काल पदमुक्त करने का निर्णय सुनाया था।

9. सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धारा 15(5) के अनुसार तीन सदस्यीय समिति की अनुषंसा के आधार पर महामहिम राज्यपाल को राज्य सूचना आयोग के गठन की शक्ति प्राप्त है। इससे यह स्पष्ट है कि तीन सदस्यीय समिति को सिर्फ अनुशंसा करनी है। अनुषंसित व्यक्ति वास्तव में उस योग्य हैं अथवा नहीं, इसकी गुणवत्ता का आकलन करना और तदनुरूप निर्णय लेने की शक्ति एवं विवेकाधिकार महामहिम राज्यपाल के पास है। पूर्व में दो-दो बार महामहिम राज्यपाल, झारखंड द्वारा ऐसी अनुषंसाओं को अस्वीकार किया जाना इसका स्पष्ट उदाहरण है।

इस आलोक में आपसे निवेदन है कि-

क. राज्य सूचना आयुक्तों की नियुक्ति हेतु अपारदर्शी, गोपनीय, मनमाने एवं संदेहास्पद तरीके से चयनित अयोग्य लोगों की सूची को वापस लौटाने का कष्ट करें।

ख.  राज्य सरकार को निर्देष देने का कष्ट करें कि पहले झारखंड राज्य सूचना आयोग गठन प्रक्रिया नियमावली बनायी जाये और तदनुरूप पारदर्षी प्रक्रिया के तहत योग्य लोगों के चयन की प्रक्रिया शुरू हो।

ग. राज्य सरकार यह सुनिश्चित करे कि अधिनियम में सूचना आयुक्तों हेतु जिन विषिष्ट योग्यताओं एवं ज्ञान का प्रावधान किया गया है, उसकी मनमानी व्याख्या नहीं की जाये और अधिनियम के प्रावधानों एवं भावना को अक्षरषः लागू किया जाये। इसके लिए अहर्ता मापदंड के आधार पर आवेदन आमंत्रित करके पारदर्षी तरीके से आयोग का गठन किया जाये।

आशा है, राज्यहित में आप त्वरित कदम उठाते हुए राज्य सरकार को सुस्पष्ट निर्देष देना चाहेंगे और वर्तमान में की गयी अनुषंसा को वापस लौटाकर राज्य सरकार को विधिसम्मत निर्णय लेने का निर्देष देना चाहेंगे।

संलग्न -

  • कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग, भारत सरकार का परिपत्र सं. एबी-14017/36/94- इएसटीटी (आरआर)/25.10.94

  • पी. जे. थामस की मुख्य सतर्कता आयुक्त पद पर नियुक्ति रद्द करने के संबंध में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की प्रतिलिपि

  • राज्य के नागरिकों एवं सूचनाधिकार कार्यकर्ताओं द्वारा दिनांक 08.08.2011 को माननीय मुख्यमंत्री, झारखंड को प्रस्तुत ज्ञापन

  • दिनांक 12 अक्तूबर 2011 को दैनिक हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित समाचार

निवेदक

शक्ति पांडेय

पत्रकार
आरटीआई एक्टिविस्ट


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