भाकपा (माले) लिबरेशन का दसवां यूपी राज्य सम्मेलन : कुछ गप्प-शप्प

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दिनकर कपूरआमतौर पर कम्युनिस्ट पार्टियां अपने सम्मेलन में अपनी उपलब्धियों के साथ अपनी कमी कमजोरियों की शिनाख्त करती हैं और भविष्य के कार्यभार को तय करती हैं। लेकिन कुछ सम्मेलन गप्प शप्प के लिए भी होते हैं। ऐसा ही राज्य सम्मेलन भाकपा (माले) लिबरेशन उत्तर प्रदेश का है, जो 19 से 21 सितम्बर 2011 को गोरखपुर में सम्पन्न हुआ।

इस सम्मेलन में की गयी गप्पबाजी पर गौर कीजिए...

गप्प नम्बर एक- रिपोर्ट में कामरेड अखिलेन्द्र के बारे में लिखा गया है कि ‘‘वे एकदम स्वतंत्र एवं निहायत व्यक्तिगत तरीके से इलाके का अध्ययन करने के बहाने पार्टी जनाधार को तोड़ने, पार्टी के प्रति प्रतिबद्ध कतारों को हतोत्साहित करने व पार्टी से अलग मोर्चा/संगठन बनाने की जी तोड़ कोशिश में लग गए। चंदौली, सोनभद्र, मिर्जापुर व बलिया के कुछेक पाकेट में उन्होंने कार्यकर्ताओं को तोड़ने में सफलता भी हासिल की। खासकर चंदौली व सोनभद में कामकाज के प्रमुख क्षेत्रों में पार्टी केन्द्रक एवं कई एक कार्यकर्ता मोर्चा राजनीति से प्रभावित होकर पार्टी छोड़कर चले गए। कुछेक क्षेत्रों - दुद्धी व नियमताबाद में पार्टी जनाधार का अच्छा-खासा हिस्सा मोर्चा राजनीति से प्रभावित होकर चला गया।''

इन महानुभावों से कोई पूछ सकता है कि कामरेड अखिलेन्द्र को यदि तोड़-फोड़ ही करना होता तो अध्ययन का बहाना लेने की उन्हें जरूरत क्या थी, वे अपने राजनीतिक मत को लेकर सीधे कार्यकर्ताओं में जा सकते थे। केन्द्रीय कमेटी और राज्य कमेटी के सदस्यों के बीच में क्या उन्होंने कभी पीछे से गोलबंदी करने की कोशिश की या किसी भी कार्यकर्ता को अपने पक्ष में ले आने के लिए प्रयास किए। माले महासचिव बखूबी इस तथ्य को जानते हैं कि पार्टी में विभाजन का कोई भी प्रयास कामरेड अखिलेन्द्र ने कभी नहीं किया। इसका सबसे बड़े उदाहरण खुद मौजूदा राज्य सचिव हैं जो अखिलेन्द्र जी की कार्यशैली के बारे में भली भांति परिचित हैं। इसलिए इस तरह का लेखन परले दर्जे की लफ्फाजी और गप्पबाजी के सिवा कुछ नहीं है। हमने कम्युनिस्ट दिशा और कार्यक्रम के तहत पिछले तीन वर्षो में राष्ट्रीय स्तर पर कम्युनिस्ट कोआर्डिनेशन टीम और जन राजनीतिक मंच खड़ा करने में सफलता हासिल की और कभी भी सार्वजनिक तौर पर भाकपा (माले) की राजनीतिक अपरिपक्वता की आलोचना नहीं की। कथित विलोपवाद के नाम पर लड़ने वाले विलोप हो रही पार्टी की राजनीतिक कार्यदिशा पर बहस कर अराजकतावाद से मुक्त होते तो शायद उनका भला होता।

गप्प नम्बर दो- रिपोर्ट में कहा गया कि '‘इलाहाबाद का पुस्तक केन्द्र ‘सबद’ न सिर्फ पार्टी नियंत्रण से बाहर चला गया है, बल्कि अब वह दलत्यागियों के कब्जे में पार्टी विरोधी विचारों का अड्डा बन गया है।’' इससे बड़ा झूठ और कुछ नहीं हो सकता। जो महिला कामरेड सबद चला रही हैं, वे जब हम लोग माले से अलग हुए उस समय और उसके बाद भी माले में ही बनी रहीं। जब उन्हें सबद से हटाने की कोशिश की गयी तो उन्होंने प्रतिवाद किया। वह अपनी लड़ाई खुद लड़कर वहां रह रही हैं और यह माले का निहायत आंतरिक मामला रहा है और इसका जन संघर्ष मोर्चा से क्या लेना-देना। लेकिन गप्पबाजों को गप्पबाजी से कौन रोक सकता है।

गप्प नम्बर तीन- रिपोर्ट कहती है कि ''वामपंथ के हित में ‘बेहतर संदेश देने के लिहाज से’ सीपीएम-सीपीआई से सम्बंध बनाने की कोशिश की गयी लेकिन इन दलों ने सकारात्मक रूख नहीं दिखाया।'' वामपंथी एकता के इन पैरोकारों से कोई पूछे कि राबर्ट्सगंज में चुनाव बहिष्कार या चंदौली में अराजक प्रत्याशी का जन संघर्ष मोर्चा के खिलाफ समर्थन किस वामपंथी धारा का प्रतिनिधित्व करता है।

गप्प नम्बर चार- रिपोर्ट में मजदूर मोर्चे पर लिखते हुए कहते हैं कि ''विलोपवाद के खिलाफ चलाये गए संघर्ष में पिछले राज्य सम्मेलन के बाद तत्कालीन एक्टू सचिव व एक कार्यकारणी सदस्य को निकाला गया।''

आखिर यह विलोपवाद था क्या, हम तो इस विचार के साथ थे कि देश में कम्युनिस्ट पार्टी के साथ एक आईपीएफ जैसे जन राजनीतिक मंच की जरूरत है। बहरहाल यह तो माले के अंदर की बहस थी और एक जनसंगठन के नाते इस बहस से एक्टू का कोई लेना देना नहीं था। मैं तो एक्टू के राष्ट्रीय सम्मेलन की तैयारियों में लगा हुआ था। तभी ज्ञात हुआ कि एक्टू से मुझे निकाल दिया गया। किसने निकाला, कब निकाला, कुछ पता नहीं। सम्मेलन में पार्टी और जनसंगठनों के सम्बंध में मौजूद इस तरह के संकीर्ण, अराजकतावादी चितंन की गम्भीर आत्मालोचनात्मक समीक्षा की जगह गप्पबाजी करते हुए कहा जा रहा है कि हम बढ़ रहे हैं। ऐसी ही गप्पबाजी आपको रिपोर्ट में जगह-जगह दिखायी देगी।

कम्युनिस्ट कोआर्डिनेशन टीम, उ. प्र. के प्रभारी का. दिनकर कपूर द्वारा दिनांक 16 अक्टूबर 2011 को जारी प्रेस विज्ञप्ति


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