सवाल हिसार में कांग्रेस की गई या बची ज़मानत का नहीं

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: हरियाणा को गुजरात हुआ समझिए : सवाल हिसार में कांग्रेस की गई या बची ज़मानत का नहीं, हरियाणा में नेस्तनाबूद हुई अस्मत का है. जैसे उसने कभी महाराष्ट्र में मराठों, यूपी में ब्राह्मणों और पंजाब में सिखों को खोया वैसे ही उसने हरियाणा में जाटों और गैरजाटों दोनों को खो दिया है. हिसार के चुनाव और उसके परिणाम को मतदाताओं के जातिगत तौर पर हुए बंटवारे के रूप में देखिए.

जैसा मैंने पहले भी लिखा संगोत्र विवाह के मुद्दे पर उन से हुए व्यवहार के बाद पहले तो जाटों की खापें ही खफा थीं. आरक्षण के मुद्दे पर जाट कांग्रेस से समाज के तौर पर भी नाराज़ थे. खापों और जाटों के कांग्रेस के खिलाफ फतवे उस जिले रोहतक से भी आ रहे थे जो खुद मुख्यमंत्री का गृहजिला है. उन्हीं के रोहतक के करीब जला गोहाना अभी बुझा नहीं था कि मिर्चपुर में खुद दलित ही जिंदा जले दिए गए. जले हुए ताज होटल में फिल्मकार रामू को साथ ले जाने पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को हटा देने वाली कांग्रेस ने हरियाणा के मुख्यमंत्री के खिलाफ कोई कारवाई तो क्या कोई जांच तक नहीं बिठाई. नतीजा कि दलित भी गए उसके हाथ से.

वो भी चलो एक आपराधिक घटना थी. और घटनाएं हो भी जाया करती हैं. लेकिन उसके बाद? उसके बाद जो भी हुआ वो सारी की सारी प्रशासनिक विफलता थी. इस हद तक कि देश की सर्वोच्च अदालत तक को आपकी प्रशासनिक व्यवस्था पे कोई भरोसा नहीं रहा. मिर्चपुर का मुक़दमा हरियाणा से बाहर दिल्ली ट्रांसफर हो गया. आपने तब भी अपनी नैतिक पराजय स्वीकार नहीं की. और फिर आपने एक के बाद एक राजनीतिक भूल भी की. कांग्रेस की सब से बड़ी राजनीतिक भूल तो ये थी कि उसने सन 2005 में नब्बे में से चौसठ सीटें लाकर देने वाले भजन लाल को तब भी दरकिनार कर दिया कि जब वो ताबड़तोड़ बहुमत साफ़ तौर पर हरियाणा की तीन चौथाई गैरजाट जनता के कांग्रेस के साथ आ जाने का परिचायक था.

उस भूपेंद्र सिंह हुड्डा को तब भी मुख्यमंत्री बना देने का फैसल कांग्रेस ने किया जिसे उसने खुद विधानसभा का चुनाव नहीं लडवाया था इस डर से कि अगर उनके मुख्यमंत्री हो सकने का शक जनता को हो गया तो कांग्रेस हार भी सकती है. और फिर अगर भजन लाल को किसी भी वजह से सही, किनारे करने का मन कांग्रेस ने बनाया भी तो मौका तब तक लगातार पांच बार विधानसभा चुनाव जीत चुके किसी कैप्टन अजय यादव को नहीं बनाया. चौटाला के जाटों में ज़बर न हो जाने के डर से जाट ही अगर ज़रूरी था हुड्डा से बहुत सीनियर बिरेन्द्र सिंह को भी नहीं बनाया. उस ने फिर हुड्डा को मुख्यमंत्री बनाया कि जब वे अगले चुनाव में कांग्रेस को बहुमत नहीं दिला सके.

कांग्रेस गलती पे गलती करती रही. वो तब भी नहीं चेती कि जब भाजपा ने हिसार उपचुनाव से पहले कुलदीप बिश्नोई से गठबंधन किया. उस भाजपा ने गैरजाटों में जिसकी जितनी भी सही पैठ के कारण देवीलाल जैसा महानायक और बंसीलाल भी गठबंधन करते और हर बार सरकार बनाते रहे. फिर इस बार तो भाजपा उन भजन लाल के बेटे के साथ आई जिन्हें खुद कांग्रेस भी हरियाणा के गैरजाटों का निर्विवाद नेता मानती रही. खापें नाराज़ थीं. गोहाना और मिर्चपुर हो ही चुके थे. कांग्रेस को जरा ख्याल नहीं आया कि अगर बचे खुचे गैरजाट भी चले गए तो क्या होगा. उसने आरक्षण को लेकर सरकार को नाकों चने चबवा चुके जाटों के सामने जाट मुख्यमंत्री के भरोसे एक जाट उम्मीदवार झोंक दिया. ये कांग्रेस में हुड्डा विरोधियों की किसी चाल में आ कर किया तो और अगर जैसे तैसे जाटों को खुश रख करने के लिए तो भी घातक सिद्ध हुआ. जाट जो साथ थे. वो भी जाते रहे.

शुद्ध वोट बैंक की बात करें तो कांग्रेस नंगी हो गई. हिसार परिणाम ने साबित कर दिया कि न उसके साथ जाट, न दलित, न पंजाबी, न बनिए. मकसद अगर हुड्डा के उम्मीदवार को हरवा कर हुड्डा को हटाने का बहाना खोजना था तो इसकी क्या ज़रूरत थी. वैसे ही हटा देते. और मकसद अगर पोलराइज़ेशन रोकना था तो फिर कुलदीप की काट किसी गैरजाट उम्मीदवार से क्यों नहीं की? सोचा होगा कि गैरजाट को लाएंगे तो सारे के सारे जाट चौटाला ले जाएंगे. ये शायद बेहतर होता. चौटाला का बेटा जीत जाता तो कुलदीप से ज्यादा बेहतर होता. दो कारणों से. एक कि अजय लोकसभा में होते भी तो ऐसे किसी तीसरे मोर्चे में होते जिसका कि आज कोई वजूद नहीं है. और दो कि भाजपा हरियाणा की आबादी में तीन चौथाई गैरजाटों को लामबंद करके आपको कल को हरियाणा की दस की दस सीटों पे टक्कर देने की हालत में न होती.

बहरहाल, पार्टियां अपने तरीके से सोचती हैं और कई बार उनकी सोच पत्रकारों से अलग भी होती है. वे अक्सर बहुत अलग नज़रिए से देखती हैं. लेकिन जो अब हरियाणा में दरअसल किसी अंधे को भी दिख रहा है वो ये कि इस जीत से उत्साहित भाजपा हरियाणा को गुजरात बनाएगी. हिंसा या दंगों के सन्दर्भ में नहीं. वोटगत राजनीति के अर्थ में. वो कहेगी तो छत्तीस बिरादरी मगर लामबंद करेगी गैरजाटों को. आखिर तीन चौथाई से भी ज्यादा हैं गैरजाट हरियाणा में. गैरजाट वो ये मान कर चलेगी कि जब तीं चौथाई की सरदार वो बन गई तो बहुत से एक चौथाई वाले भी साथ आ लेंगे अपनी ज़रूरतों की वजह से. इस तरह का पोलराइज़ेशन कुलदीप को भी सूट करता है. राष्ट्रीय और प्रदेश के स्तर पर भाजपा जैसी किसी पार्टी के साथ चलना उनकी राजनीतिक मजबूरी भी है. सो, हुड्डा को इतिहास और हरियाणा को देर सबेर गुजरात हुआ समझिए.

चंडीगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार जगमोहन फुटेला का विश्लेषण.


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