विचार उगलने के लिए अब ऑन लाइन 'चौराहा'

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: साइबर पत्रकारिता में चंडीदत्‍त शुक्‍ल की दस्‍तक : एक और पत्रकार न्यू मीडिया के मैदान में आ गए हैं। नाम है चण्डीदत्त शुक्ल। अमर उजाला, दैनिक जागरण, फोकस टीवी में तरह-तरह के पदों पर, किस्म-किस्म का काम करने के अलावा, चण्डीदत्त फ़िल्म, टेलिविजन, रेडियो, साइबर माध्यमों में सक्रिय रहे हैं और देश की तकरीबन सभी प्रमुख पत्रिकाओं और अखबारों में छपते रहे हैं। अब वह साइबर पत्रकारिता में जोश-ओ-ख़रोश के साथ दस्तक दे रहे हैं पोर्टल www.chauraha.in के ज़रिए।

जब सैकड़ों पोर्टल पहले से हैं, तो एक और नए अंतर्जालीय उपक्रम की क्या ज़रूरत...पूछने पर वह चर्चित कॉलमिस्ट प्रतिभा कटियार के एक आलेख का संदर्भ पेश करते हैं, जिसमें प्रतिभा ने लिखा था... 'बात कोई भी हो, मुद्दा कैसा भी हो, हम सब उस पर कुछ न कुछ कहना चाहते हैं. पहले इन बातों का जमघट लगता था चौराहों पर. चाय की चुस्कियां और गपशप चौराहों की रौनक होती थी.' अब भी होती है. लेकिन अब ये चौराहे ऑनलाइन होने लगे हैं. ऐसा ही एक चौराहा ब्लॉग जगत में बनाया है ब्लॉगर चंडीदत्त शुक्ल ने.

इस चौराहे पर गीत, कविता, लेख, समीक्षाएं, सामाजिक चिंतन, सपने, जीत का हौसला, बहस सब कुछ मौजूद है. चंडीदत्त अपने मूल में कवि हैं, इसलिए उनकी लेखनी में एक रिद्म हमेशा मौजूद रहती है. वे सक्रिय पत्रकार भी हैं इसलिए उनकी ऩजर देश, दुनिया, समाज पर लगातार बनी रहती है. और यह सब जमा होता है उनके चौराहे पर. उनके ब्लॉग की टैग लाइन के रूप में लगी कविता की बानगी लेते हैं, कौन सी थी वो जुबान/जो तुम्हारे कंधे उचकाते ही/बन जाती थी/मेरी भाषा/अब क्यों नहीं खुलती/ होठों की सिलाई/ कितने ही रटे गए ग्रंथ/नहीं उचार पाते/सिर्फ तीन शब्द.. बिना फॉर्म की परवाह किये बस कभी सामयिक विषयों पर झटपट लिखी गई पोस्ट्स तो कभी रूमानी विषयों पर इत्मीनान के मूड में लिखी गई चीजें यहां मौजूद हैं. उनके गाढ़े सरोकारों पर भाषा की पकड़ लिखे हुए को सार्थकता देती है।

चण्डीदत्त जैसे युवा लेखकों की नई जमात ने उम्मीद जगाई है कि उनकी नजर से बचा कुछ भी नहीं है. न ही वे कुछ कहने से चूकते हैं. ब्लॉगिंग ने युवा क्षमताओं को बड़ा प्लेटफॉर्म तो दिया ही है, उनका अपने ऊपर भरोसा भी बढ़ाया है. यह एक परिवार जैसा हो चला है अब. सब एक-दूसरे के विचार साझा करते चलते हैं. नई दिशाओं को प्रस्थान करते इन युवा दिलों की धड़कनें ब्लॉगिंग के संसार में खूब देखने को मिलती हैं. इस वीकेंड आइये चाय पीने के लिए चण्डीदत्त के चौराहे पर चलते हैं. इस चौराहे का पता है-http://chauraha1.blogspot.com

i-next में अपने लोकप्रिय स्तंभ में प्रतिभा कटियार की इस समीक्षा ने चण्डीदत्त को इस दिशा में सोचने के लिए प्रोत्साहित किया कि चौराहा महज उनका, यानी ब्लॉग ही क्यों रहे? यही सोच अब उस मंच को पोर्टल के रूप में लेकर आई है। चण्डीदत्त कहते हैं--चौराहा, जब तक ब्लॉग रूप में था…वह मेरी रचनाओं, सोच और अहसास का मंच था। यह सफ़र 2007 से भी पहले मेरे अन्य ब्लॉग्स के ज़रिए शुरू हो चुका था। अब चौराहा सुगठित और लोकतांत्रिक रूप में आपके सामने है। पोर्टल का कोई ऐसा इरादा नहीं है कि रात-ओ-रात दुनिया बदल जाएगी या एकदम अनूठी कोई चीज आपके सामने हम ले आने की खोखली भाषणबाजी करने वाले हैं…यहां कला, साहित्य, संस्कृति, समाज, सिनेमा, संगीत की…यही नहीं, हर वह बात हाज़िर करने की कोशिश होगी, जो खूब, खूबसूरत ज़िंदगी से आपको मिलवाए। इस कोशिश में महज दुआओं से काम नहीं चलेगा। आप सबको साथ आना होगा। जब ज़रूरत होगी, तब हम रेवेन्यू के लिए भी भागेंगे-दौड़ेंगे, फ़िलहाल, तो लिखना-पढ़ना है, सो पैसों की बहुत आवश्यकता या संकट नहीं है। जब होगा, हक़ से मांगेंगे। चौराहा आपका है…तो आइए और शुरू कीजिए…हंसना-मुस्कराना-झूमना और प्यार करना।

पोर्टल की शुरुआत आकर्षक ढंग से हुई है। अंतर्वस्त्रों के बिना महफ़िलों में शामिल होती अभिनेत्रियों के बयान-विवाद से लेकर आलोक श्रीवास्तव की कविताओं के अलावा विभिन्न नए-पुराने कलमकारों की रचनाएं पोर्टल पर हाज़िर हैं। विवाद नहीं, मन-रंजन और विचार-व्याकुलता के नज़रिए के साथ शुरू किए गए चौराहे www.chauraha.in पर बहस-दर्शन आप भी कर सकते हैं, चण्डीदत्त के साथ, जिनका कहना है--चौराहा याद है, थड़ियों की, साइकिलों की, गाड़ियों की. प्रेस विज्ञप्ति


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