क्‍या यही है भास्‍कर की पत्रका‍रिता का स्‍टैंडर्ड!

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आखिर, मीडिया ऐसा क्यों है। सूचनाओं और समाचारों को सलीके से प्रस्तुत करना तो शायद हम भूल ही गए हैं। पिछले दिनों दैनिक भास्कर की वेबसाइट पर एक खबर पढ़ी ‘बाबा रामदेव ने खुद को बताया भगवान राम और महात्मा गांधी’। हेडिंग के नीचे मैटर भी पढ़ा। लेकिन मुझे बाबा रामदेव के बयान से ऐसा कुछ कहने की बू नहीं आई। खबर में रामदेव के हवाले से लिखा गया है- ‘मैं तो वही कर रहा हूं जो महात्मा गांधी और भगवान राम ने किया था। जब भगवान राम को नहीं बख्शा गया तो वे मुझे कैसे छोड़ सकते हैं।’

इसी बयान को हमारे इतने बड़े मीडिया प्रतिष्ठान ने जिस तरीके से छापा, वह बहुत गलत लगा। रामदेव के इस बयान से कहीं नहीं झलकता कि वे खुद को भगवान राम या महात्मा गांधी कह रहे हैं। क्या आपको लगा? अंत में पाठकों की राय मांगी गई है। लिखा है- बाबा रामदेव के विचारों और कार्ययोजना पर आपकी क्या राय है? क्या उनके द्वारा अपने मुंह से अपनी तुलना भगवान राम और महात्मा गांधी से करना शोभा देता है? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में लिख कर सबमिट करें और दुनिया भर के पाठकों से शेयर करें।

सवाल है कि क्या यह जिम्मेदार पत्रकारिता है? कम से कम मुझे यह जिम्मेदार पत्रकारिता नहीं लगती। इस समाचार में कुछ अन्य अच्छी बातें भी हैं, जिन्हें हाईलाइट किया जा सकता था। जैसे कि राजनीतिक सुधार देश की बड़ी जरूरत, तेलंगाना के लिए आत्महत्याएं न करें आदि। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। मात्र सनसनी फैलाने के लिए इस तरह से खबर पेश की गई होगी या फिर सरकार से पैसा लेकर। क्योंकि रामदेव सरकार के खिलाफ लगातार बोल रहे हैं और सरकार उनके खिलाफ।

लगातार विभिन्न खबरों पर नजरें रहती हैं और इसलिए प्रतिक्रियाएं भी होने लगती हैं। यह एक स्वाभाविक दिमागी क्रिया है। जब से बाबा रामदेव और सरकार के बीच विवाद पैदा हुआ है, तब से दैनिक भास्कर ने रामदेव के खिलाफ समाचार प्रकाशित किए हैं। उनके लिंक हैं-

योग गुरु बाबा रामदेव : साइकिल से स्कॉटलैंड तक की सवारी

रामदेव के बाबा बनने की पूरी कहानी

बाबा रामदेव ने खुद को बताया भगवान राम और महात्मा गांधी

इन हेडिंग्स पर क्लिक करके आप पूरी खबरें पढ़ सकते हैं और देख सकते हैं ‘पत्रकारिता का स्टैंडर्ड’।

लेखक मलखान सिंह पत्रकार हैं तथा इनदिनों वेब पत्रकारिता में जमे हुए हैं. उनका यह लेख उनके ब्‍लॉग दुनाली से साभार लिया गया है.


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