गालियों का अड्डा बना भास्‍कर डॉट कॉम

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यशवंतजी, मैं आपका ध्यान भास्कर डॉट कॉम (हिंदी वेबसाइट) के होम पेज पर दिए गए ब्लॉग की ओर दिलाना चाहूंगा। यहां पर लीबिया के बारे में एक ब्लॉग पोस्ट किया गया है। लेख तो किसी भी दृष्टिकोण से प्रभावी नहीं लगा, पर अचंभा हुआ यह जानकर कि साइट को मॉडरेट करने वाले कितने सजग हैं। दरअसल इस ब्लॉग के नीचे कमेंट्स में किसी ने अभद्र शब्दों का प्रयोग करते हुए अपनी टिप्पणी की है, जिसे मॉडरेटर ने बिना पढ़े ही पब्लिश कर दिया है।

मैंने भड़ास पर पहले भी इसी तरह की खबर पढ़ी थी, जिसमें भास्कर डॉट कॉम की ऐसी ही कारगुजारी का जिक्र था। उक्त खबर दिग्विजय सिंह से संबंधित थी, जिसमें ढेरों गालियां पब्लिश कर दी गई थीं। ब्लॉग का लिंक और स्क्रीनशॉट आपके साथ भी शेयर कर रहा हूं। साथ ही वह टिप्पणी भी जिसमें वो शब्द प्रयोग किए गए हैं।


 

एक और अफगानिस्तान न बन जाए लीबिया !

लीबिया में अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस की सेना लीबिया के लोगों को बचाने के लिए पूरी मुस्तैदी से गद्दाफी की सेना से लड़ रही है। इनका लक्ष्य एक ही है, बस मानवता के नाते जनता को गद्दाफी के जुल्मों से बचाया जाए। कम से कम अंतरराष्ट्रीय मीडिया में आ रही हैं खबरों से तो ऐसा ही प्रतीक हो रहा है। विश्व के किसी भी कोने में जुल्म बढ़ेगा तो वे उसे मिटाने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोडं़ेगे। लेकिन क्या यह वाकई में सही है?

इस मुद्दे पर अमेरिका और ब्रिटेन के पुराने इतिहास को खंगालें तो बिना फायदे के ये देश कुछ नहीं करते हैं। इराक और अफगानिस्तान से लेकर वियतनाम तक इसके उदाहरण हैं। लेकिन फिर भी लीबिया को बचाने के लिए दुनिया के आका सामने आ चुके हैं। लीबिया में जो हो रहा है, उसे बिल्कुल जायज नहीं ठहराया जा सकता है लेकिन आगे वहां अमेरिका-ब्रिटेन लीबिया को गद्दाफी से मुक्त कराके वहां नई लोकतांत्रिक सरकार बनाने में मदद करेंगे? कहीं वैसी सरकार तो नहीं, जो अफगानिस्तान में बनाई गई थी। यह पूरी दुनिया जानती है कि किस प्रकार अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश ने इराक और अफगानिस्तान को दुनिया में शांति कायम करने के नाम पर तहस-नहस करवा दिया।

लेकिन जब अमेरिका में नए राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा की ताजपोशी हुई थी तो पूरी दुनिया को लगा कि एक अश्वेत क्रांति फिर से जन्म ले रही है। लेकिन जिस तरह लीबिया में बमबारी की जा रही है, उससे एक बार फिर से अमेरिका-ब्रिटेन का असली चेहरा सामने आ गया है। लीबिया की सड़कों पर जनता आमने सामने है। एक तरफ गद्दाफी समर्थक हैं तो दूसरी ओर गद्दाफी की नीतियों से पस्त आवाम। लेकिन भुगतना दोनों को ही पड़ रहा है। मिस्त्र से फैली यह आग लीबिया तक पहुंचने में कुछ ही दिन लगी।

लेकिन चिंगारी अंदर ही अंदर भड़क रही थी। बराक ओबामा भी जानते हैं कि दूसरे के मामले में टांग अड़ाने का तब तक कोई अर्थ नहीं है जब तक कोई फायदा नहीं हो। अपने राष्ट्रपति की बातों से अमरीकी विदेशमंत्री रॉबर्ट गेट्स भी इतेफाक रखते हैं। अब देखना यह है कि कब और कैसे अमेरिका और ब्रिटेन लीबिया से दूर होते हैं? अमेरिका और ब्रिटेन के इतिहास को देखकर नहीं लगता है कि ये देश लीबिया से खाली हाथ चले जाएंगे।

मानवाधिकार के बारे में दुनियाभर में खराब - अच्छा तय करने का अधिकार बड़े राष्ट्रों को किसने दिया?

क्या अमेरिका-ब्रिटेन का असली मकसद लीबिया में शांति स्थापना है?

क्या गद्दाफी के हटाये जाने भर से वहां शांति स्थापित हो जाएगी?

लीबिया में लोकतांत्रिक की आड़ में कहीं लेकिन पिट्ठू सरकार न बन पाए ऐसा कैसे संभव हो सकता है?

आखिर बड़े देशों को दुनिया का थानेदार बनने का हक किसने दिया?

पूरे घटनाक्रम में जिस तरह से दमन हो रहा है, हमले हो रहे हैं आम जनता की जानमाल की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जा सकती है?

आप भी इस बहस में भाग लेकर भास्कर डॉटकॉम के अन्य व्यूअर्स के साथ अपने विचार शेयर कीजिए।

Posted by Ambrish Pathak (24th Mar 11 10:16:29)
आशीष महर्षि जी, लगता है आपको इस बात की गलतफहमी है कि केवल आप ही अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर दखल रखते हैं। दरअसल जिस विषय पर आपने यह अपनी "विशेष टिप्पणी" दी है, उसे पूरे विश्व का मीडिया पहले दिन से ही बता रहा है। इसलिए इस पोस्ट के जरिये यह बताना कि अमरीका या ब्रिटेन अपने फायदे के लिए लीबिया में जंग छेड़ रहे हैं, नई बात नहीं है। एक और बात पर ध्यान दिलाना चाहुंगा कि थोथे टाइप के विषयों पर लिखने से बचें। लिखना ही था तो इसके आर्थिक पहलुओं पर नजर डालते।

Posted by Anil (23rd Mar 11 21:11:46)
yeh haram se hi peda hote hain in madar chodon ko apne bap aur mata ka bhi pata nahi hai yeh kisi ka kya bhala karenge yeh to dunyan main shanti chahte hi nahi hai. inka to matlab hi dunya main hinsa failana hai. jab hinsa hoti hai inko shanti milte hai. yeh sirf ek bahana hai oil k bhandaron per kabja karne ka. is se pehle bhi yeh iraq main esa kar chuke hain.

Posted by Wasim (23rd Mar 11 17:11:47)
sahi kaha sikandra aapne ye sale kutte h aapa fayeda jaha dikhta h waha kud padte h...

sawarti kism k log h middle east k tail k kahjanoo par nazar h inki. bahrin,oman,yaman, seriya yaha bhi to sarkar virodhi demostration ho rahe h.waha to ye kuch kr nahi rahe kuki waha unka swarth nahi h. libiya ek kamjor mulk h aur uus k paas petro oil k bhandar h. isliye y westrron contries ek k petro oil khajane par kabja jamana chahte h jaise Iraq aur afganistran m huaaa......

Posted by Indian (23rd Mar 11 15:13:40)

i have question to all thos ewho posten comments here,will it give any solution? we all know europe were always selfish and want to get only oil of libi,but why all libia;s friend countries are silent in the begnning iran had spoken very big word int se int baja denge where is iran now

Posted by Sikander Khan (23rd Mar 11 10:49:50)
Ye vo haram khor log hai ke sirf is baat ka intajar karte hai ki kisi bhi desh me kuch ho our us desh par kabja jama la pahale in British ne hamko luta ab inki niyat arab ke petrol ke khajane par hai ye log shuru se hi ham ko lut te aye hai 250 sal tak inhone ham par raaj kara hai ye samrajvadi log inka maksad sirf logo ko lutna hai na ki kisi ki jaan bachana

Posted by Raj (23rd Mar 11 10:16:35)
बिल्कुल सहि कह रहे है.........सले हरमि है.

Posted by Raghuraj Singh (22nd Mar 11 19:08:15)
ये अमेरिका और ब्रिटेन की एक बहुत बड़ी चाल है। ये देश लीबिया के खजाने अर्थात तेल भंडार पर इसी बहाने कब्जा करना चाहते हैं। इतिहास गवाह रहा है कि इन पर हमेशा से स्वार्थ हावी रहा है। ये लीबिया के लोगों की रक्षा करने नहीं बल्कि अपने घर का खजाना भरने के लिए गए हैं।

Ashish maharishi (22nd Mar 11 19:33:23)
हमला करने वाले देशों की नजर लीबिया के तेल भंडारों पर लगी है। लीबिया के अधिकांश तेल ठिकाने बेंगजी और देश के पूर्वी हिस्से में हैं, जहां सत्ता का विरोध करने वाले लड़ाकों का कब्जा है। मुअम्मर गद्दाफी ने बेंगजी पर वापस कब्जा करने के लिए बड़ा हमला किया, लेकिन उसके ठीक बाद पश्चिमी देशों ने लीबिया पर हमला बोल दिया।

Posted by एक छुट्टा पत्रकार (22nd Mar 11 19:05:01)
अरे भई, मगरमच्छ जिन्दा तभी है,  जब छोटी मछलियों को खाएगा।  और इस गलाकाट युग में शांति, मदद ऐसे शब्द नहीं चलते। फायदे के लिए तो पश्चिम वाले अपनों का भी गला काट दें।

Posted by Brijesh (22nd Mar 11 19:02:08)
ye bilkul adhipatya ki shuruaat hai jo naye kalevar me hai.

Ashish (22nd Mar 11 19:12:37)
Sahi kahan Brijesh apne

भास्‍कर

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.


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Comments (1)Add Comment
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written by khalid patel, March 30, 2011
ye ameria ki rajnity h k kaise tel k bhandaro par kabza kiya jay.

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