फेसबुक पर अन्ना को लेकर दिलीप मंडल और प्रमोद जोशी आमने-सामने

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फेसबुक पर इन दिनों अन्ना ही अन्ना छाए हैं. दिलीप मंडल ने कुछ शंकाएं जाहिर की हैं. उन शंकाओं का समाधान किस तरह हो रहा है, आप देख-पढ़ सकते हैं. बहुत रोचक बहस है. आपभी इसमें शरीक हों. शुरुआत दिलीप के उस स्टेटस से, जिस पर बहस शुरू हुई- Dilip Mandal : लोकपाल बिल बनाने के लिए सिविल सोसायटी के सदस्यों का चुनाव कैसे होगा? सिक्का उछालकर? अन्ना के लिए गानो वालों, हमारा ज्ञान बढ़ाओ। हम तो सिविल सोसायटी हैं नहीं। आप हो, तो बताओ?

Anant Kumar Jha : दिलीप जी! पहले इस बात की जानकारी दीजिये कि आखिर न्यूज़ चैनलों में बार-बार यह क्यों कहा जा रहा है की 'अन्ना से डरती है सरकार'

Ishwar Singh Vidyarthi : Aap bar bar apne ko sidh kar dete hai. Apne aapko itna bada mat samjha karo. aap to gyani hai choga utarkar ANNA ke saath aao. Samaj ko itni negative energy se mat bharo.

Ram N Kumar : सिविल सोसाइटी क्या होता है? कोई समझाओ हमें भाई

Pramod Joshi : देश में प्राय़ः अधिकतर जाँच आयोगों के अध्यक्ष बगैर चुने गए व्यक्ति होते हैं। चुना जाना ही महत्वपूर्ण होता तो भीमराव आम्बेडकर के लिए संविधान सभा में आना मुश्किल था। राज्यसभा में कुछ लोगों का नामांकन करने की व्यवस्था भी इसीलिए है। यों गैर चुने व्यक्तियों की बात लोकपाल विधेयक के प्रारूप को लेकर है। वह कानून तभी बनेगा, जब संसद पास करेगी। ऐसी क्या बात है कि 1968 में लोकसभा से पास हुआ लोकपाल विधेयक आजतक कानून की शक्ल नहीं ले पाया है? जहाँ तक सिविल सोसायटी की बात है, वह वही है जो इस सवाल पर चर्चा कर रही है।

Satyajeet Patil : YE SIVIL SOCIETY KYA BALA HAI SIR JI?

Dilip Mandal : जांच आयोग के सदस्य कानून ड्राफ्ट नहीं करते। सरकार करती है। यानी चुने हुए प्रतिनिधि। आप इन्हें हटा सकते हैं। सिविल सोसायटी वालों को कैसे हटाएंगे।

Ashish A Infotech : sabhi taiyyari ho chuki hai ye to prachar ho raha hai anna ka jab pura hoga to asli cheharey samney aa jayengey

Pramod Joshi : कानून का प्रारूप एक सुझाव है। उसके अलग-अलग पहतुओं पर संसद को विचार करना है। संसदीय व्यवस्था में बिल सरकार ही पेश नहीं करती प्राइवेट मेंबर भी कर सकते हैं। लोकायुक्त का पद जब भी बनेगा वह भारतीय संविधान के दायरे में होगा। उसे कैसे हटाया जा सकेगा इसकी विधेयक में व्यवस्था होगी। यदि वह संवैधानिक मर्यादाओं के दायरे में नहीं होगा तो कानून ही नहीं होगा।

Dilip Mandal : प्राइवेट मेंबर बिल शुक्रवार को दोपहर बाद पेश होते हैं और वह एक औपचारिकता है। मैंने और आपने भी ऐसे सैकड़ों प्राइवेट मेंबर बिल को पेश होते और वहीं समाप्त होते देखा है।

Dilip Mandal : और प्राइवेट मेंबर बिल भी वे पेश करते हैं जो चुनकर आते हैं। एनजीओ वाले नहीं।

Pramod Joshi : हमारे यहाँ प्राइवेट मेंबर का बिल कभी कानून नहीं बना, पर बात संवैधानिक सिद्धांत की है। नागरिक के रूप में हम सबकी भूमिका है। आंदोलन करने या उसका विरोध करने का सबका हक है। उसे मान्य परम्पराओं के दायरे में होना चाहिए। ऐसी सलाह किसी ने नहीं दी कि एनजीओ वाले संसद में बिल पेश करेंगे। बात कानून के प्ररूप की है। इसके पहले कई साल तक सूचना के अधिकार के बिल पर देश भर में गोष्ठियाँ होती रहीं। यह भी लोकतांत्रिक व्यवस्था है। पर कानून तो सांसद ही बनाएंगे।

Vijay Jha : pramod ji, aapse sahmat ! waise bhi ye system change honi chahiye ! ye system samaj ke har kshetra main beimano ko paida kar raha hai ! aur ye shuruaat lokpal ke dwara ho raha hai, hamenis badlaw ko swagat karni chahiye !

Dilip Mandal : एनजीओ सुझाव दें। कानून बनाने की ड्राफ्टिंग कमेटी में वे सरकारी प्रतिनिधियों के साथ कैसे हो सकते है? एनजीओ को हम पांच साल बाद हटाएंगे कैसे।

Pramod Joshi : राष्ट्रीय सलाहकार परिषद में लोकपाल विधेयक का प्रारूप बन रहा है। वह तो संसद नहीं है।

Pramod Joshi : ड्राफ्टिंग कमेटी ड्राफ्ट बनाने के बाद खत्म हो जाएगी।

Dilip Mandal : प्रारूप तो आप भी बना सकते हैं और मैं भी। लेकिन जो बिल संसद में या विधानसभाओं में पेश होता है वह सरकार ड्राफ्ट करती है।

Sharad Kumar Tripathi : Tum logo ko lokpal bill pata hai jo itni badi bate kiye ja rahe ho...gaon basa nahi lutere aa gaye

Pramod Joshi : मैं इसीलिए कह रहा हूँ कि कानून बनाने की लोकतांत्रिक व्यवस्था में संसद की भूमिका है, पर अनेक मौके आते हैं, जब किसी कानून को बनाने या हटाने के लिए संसद के बाहर से माँग आती है।

Dilip Mandal : प्रमोद जी, मान लीजिए कल एनजीओ कहेंगे कि मनी बिल भी वे सरकार के साथ मिलकर ड्राफ्ट करेंगे। और बिल गिर गया तो संवैधानिक व्यवस्थाओं के हिसाब से सरकार गिर जाएगा। यह कोई हल्की बात नहीं है। इसके खतरों को समझने की जरूरत है।

Dilip Mandal : ये लोग चुनाव लड़कर सरकार बनाएं और फिर पूरी तरह से अपना बिल बनाएं। किसने रोका है। लोकतंत्र पर भरोसा है या नहीं?

Pramod Joshi : वे जब ऐसा कहेंगे तब बात करपनी चाहिए। इस लोकपाल बिल के बारे में बात ही तभी शुरू हुई जब सरकार के प्रस्ताव से असहमति थी। सरकार चाहे तो बिल पास करे। वह इसीलिए तो आंदोलनकारियों से बात कर रही है, क्योंकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में तमाम मौके आते हैं, जब चर्चा बड़े फलक पर आती है। बात यह होनी चाहिए कि दोनों पक्ष किस तरह के बिल पर बात कर रहे हैं।

Pramod Joshi : लोकतंत्र चुनाव लड़ने के अलावा भी कुछ होता है। सभी लोग चुनावी राजनीति में नहीं होते।

Dilip Mandal : अभी एक जनलोकपाल बिल है। कल को चार एनजीओ कहें कि हमारा असली वाला गारंटी कार्ड समेत पीपुल्स लोकपाल बिल है। तो किसकी बात सुनी जाएगी? इस तरह तो अराजकता फैलेगी।

Yashwant Singh : Chunao ladna kitna mahanga hai. Usme kitna paisa kharch hota hai. Kya is chunavi vyastha mein aam admi chunao ladkar Sasnsad me aa sakta hai?

Vijay Jha : प्रमोद जी , आपसे सहमत ! वैसे भी ये सिस्टम चेंज होनी चाहिए ! ये सिस्टम समाज के हर क्षेत्र में बेईमानो को पैदा कर रहा है ! और ये शुरुआत लोकपाल के द्वारा हो रहा है , हमें इस बदलाव को स्वागत करनी चाहिए ! और जब बदलाव की बयार बहती है तो यथा-स्थितिवादी में बेचैनी स्वाभाविक है और हम इसे बदलाव के लिए शुभ सूचक मान सकते है ! तर्क-कुतर्क के बिच से ही कुछ अच्छा निकल कर आएगा ऐसा हमें विश्वास करके चलना होगा !

Pramod Joshi : मेरे विचार से संसद, सांसद और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की उपेक्षा नहीं होनी चाहिए। हमारे जो भी बदलाव हैं वे इसी रास्ते से होंगे। अन्ना हजारे वाले जन-लोकपाल बिल का प्रारूप बनाने वाले भी सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश हैं।

Dilip Mandal : सरकार गड़बड़ी करती है तो यह मुमकिन है कि उसे हटा दें। एनजीओ वालों को कैसे हटाएंगे। इसलिए कौनून बनाने का काम तो संसद और विधानसभाओं और सरकार के जिम्मे ही होना चाहिए। बाकी लोग सुझाव दें, विरोध करें। सरकार बदल दें।

Jayantibhai Manani : सिविल सोसायटी का मतलब उच्च वर्ण जातियों से आये सदस्य. जिसको जन्मजात सिविल माना जाता है. हकीकत में देश के तमाम सामाजिक वर्गों का प्रतिनिधित्व नहीं होना चाहिए ?

Ranish Jain : Civil Society ke manak kya hai?????????

Ravi Prakash : दिलीप जी, प्रमोद जी के तर्कों को अपने कुतर्क से कमज़ोर मत कीजिये. बेवजह का विरोध हास्यास्पद लगता है. देश भर के NGO के बारे में पता कर लें, फिर बात कीजिये. हम सब सिविल सोसाइटी हैं. आप भी उसी का हिस्सा हैं.

Dilip Mandal : तो आप करेंगे लोकबिल बिल की ड्राफ्टिंग। आपका चुनाव किसने किया सर? सरकार चुनेगी या अन्ना या एनजीओ के बाकी लोग। चिट निकाल कर फैसला होगा कि लॉटरी से।

Dilip Mandal : जैसे आपका मन किया और कह दिया कि प्रमोद जी ने जो कहा तर्क और मैंने जो कहा वह कुतर्क। वैसे ही कोई चुन देगा। मन से कानून बनेगा?

Dilip Mandal : आपने कहा मैं भी सिविल सोसायटी हूं. तो क्या मैं करूंगा ड्राफ्टिंग?

Vijay Jha : दिलीप जी क्या हम इसे आपका भ्रम फैलाना माने? जानकारी का आभाव आप में होगा ऐसा तो सोचा नहीं जा सकता ! कानून तो जब बनेगा सरकार के द्वारा ही बनेगा, और सरकार के द्वारा ही संचालित होगा! और एन जी ओ संसद में बैठ कर कानून तो पास नहीं करेगा ! कानून बनने से पहले की प्रक्रिया में सहभागिता एन जी ओ को ही क्यों हम सबों की भी होनी चाहिए ! और हम सब अपने अपने स्तर आवाज उठा ही रहे है पक्ष में या विपक्ष में !

Sandeep Kumar : jinki media hai usi ko bachane me anna lage hua hai....

Ravi Prakash : आप झारखण्ड से हैं. दिल्ली छोड़कर वहां जाइये. पता चलेगा क़ि कैसे काम कर रहे हैं NGO वाले. दयामनी बरला, घनश्याम, रंजन...कई नाम हैं ऐसे. जिनका काम आप जैसे दिल्ली छाप लोगों से बहुत बड़ा और बेहतर है. वातानुकूलित कमरों में होने वाले सेमिनारों से बाहर निकालिए. इन्टरनेट के बाहर भी एक दुनिया है. दरअसल, सच्ची और जाग्रत दुनिया वही है. उस दुनिया में भी कुछ लोग रहते हैं. कुछ काम होते हैं. समर्थन भी, विरोध भी. हाँ, उनके हर निर्णय के पीछे एक वाजिब कारण होता है. बेमतलब क़ी बातें मत कीजिये.

Dilip Mandal : सरकार ही इस देश में बिल ड्राफ्ट करती है। बाकी कोई भी सुझाव दे सकता है। प्रस्तावित ड्राफ्ट कोई भी बना सकता है। विरोध कर सकता है। सरकार को चुनाव में हराया जा सकता है। यही लोकतंत्र है। संविधान ने यही तरीका बताया है। आपने भी स्कूल में पढ़ा होगा।

Ravi Prakash : बची बात बिल क़ी ड्राफ्टिंग क़ी, तो हम-आप जैसे लोग ही करेंगे इसकी ड्राफ्टिंग. भारत में लोकतंत्र है. यहाँ हमारे और आपके ही प्रतिनिधि ही राज करते हैं. कोई राजा पेट से पैदा नहीं होता.

Dilip Mandal : रवि प्रकाश आपको धोखा हुआ है। दयामनि बारला को किसी ने भी नहीं कहा कि लोकपाल बिल ड्राफ्ट करने वाली कमेटी में उन्हें शामिल किया जाएगा। वैसे इनका चुनाल आपके ख्याल से किस तरीके से होना चाहिए। बहस फिर कर लेंगे। हमारा ज्ञान बढाइए।

Dilip Mandal ‎ : * कृपया चुनाव पढ़ें।

Ravi Prakash : अगर राजाओं के घरों में राजकुमार पैदा होते, और उनकी इस देश में हुकूमत होती, तो लालू प्रसाद, मुलायम सिंह, नीतीश कुमार, मायावती, शरद यादव, मीरा कुमार....जैसे लोगों क़ी आवाज़ दिल्ली में दबा दी जाती. लालकिले से एक सुरंग निकलती, जिसका दरवाज़ा लाहौर के किले में खुलता. तब कई अनारकलियाँ दीवारों में चुनवा दी जातीं. thank god, ऐसा नहीं हो रहा इस देश में. जो भ्रस्टाचार है, उसकी खिलाफत होनी ही चाहिए. अन्ना हजारे वही कर रहे हैं. कमसे कम उनका तो विरोध मत कीजिये.

Dilip Mandal : आपके और मीडिया के हिसाब से तो पूरा देश अन्ना के साथ है। एक-आध लोग विरोध कर लेंगे तो घबराने की क्या बात है। अगला चुनाव भी इस हिसाब से अन्ना समर्थक जीत ही लेंगे। लोकतंत्र में तो उनकी पूरी आस्था है।

Ravi Prakash : कल अमेरिका में अच्छी-खासी नौकरी छोड़ कर आये रामदयाल मुंडा भी आज संसद में हैं. कानून वही बनता है दिलीप जी. सब हमारे-आपके प्रतिनिधि ही हैं. गलत लोगों को चुना ही क्यों हमने? असली लड़ाई तो वही है. वहां जाकर कीजिये आन्दोलन. बहस. तब कुछ काम बनेगा. मेरी शुभकामनाएं हैं.

फेसबुक पर बहस अभी जारी है. इसमें हिस्सा लेने या देखने के लिए क्लिक करें- अन्ना और लोकपाल


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