पोलिटिको डॉट कॉम के बिल निकोलस से मिलिए

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पालिटिको:माइकल जैक्‍सन की मौत भी नहीं बन सकी इस पेपर की खबर :अपनी अमेरिका यात्रा के दौरान मैं अन्य तमाम लोगों के अलावा बिल निकोलस से भी मिली. बिल वहाँ के “पोलिटिकोडॉटकॉम” (http://www.politico.com) नामक वेबसाइट के मैनेजिंग एडिटर हैं. वे इससे पहले कई सालों तक यूएस टुडे में काम कर चुके हैं और उन्होंने 1984 से ही व्हाइट हाउस कवर किया था. वे वहाँ सीनिअर कॉरेस्पोंडेंट थे और अब पोलिटिको के लिए काम करते हैं.

यह वस्तुतः न्यू मीडिया का एक शानदार उदाहरण है और एक ई-पेपर है. इस ई-पेपर की कुछ बड़ी ही खास बातें हैं-

1. इसमें किसी भी सरकारी तंत्र या सरकारी व्यवस्था से एक पैसा भी एडवरटीजमेंट नहीं लिया जाता है. ऐसा नहीं है कि ये लोग सरकारी एड नहीं पा सकते हैं पर ये एक आतंरिक नीति के तहत सरकारी एड नहीं लेते हैं.

2. इस ई-पेपर में मात्र राजनैतिक खबरें ही छपती हैं. चाहे दुनिया की कोई बड़ी से बड़ी दिखने वाली खबर ही क्यों ना हो, यदि वह संपादक मंडल की निगाह और उनके मानदंडों में राजनैतिक खबर के तहत नहीं आती है तो फिर वह नहीं छपेगी. खबर तो इस ई-पेपर में सिर्फ राजनैतिक ही छपनी है.

3. यह ई-पेपर मुख्य रूप से अमेरिका के राजनैतिक केंद्रबिंदु कैपिटोल हिल पर केंद्रित रहती है.

4. इस ई-पेपर की आय का मुख्य श्रोत सब्सक्रिप्शन होता है. ई-पेपर पढ़ने के लिए उसे सब्सक्राइब करना जरूरी है.

5. इसके अलावा ये लोग खुले तौर पर विभिन्न मुद्दों पर लॉबिंग करने वाले सम्बंधित लोगों अथवा कंपनियों से भी पैसा लेते हैं और इस आय को बकायदा प्रदर्शित करते हैं.

6. इस ई-पेपर का एक सीमित प्रिंट वर्जन भी है लेकिन उसे नि:शुल्क बांटा जाता है.

7. इस अख़बार के प्रिंट वर्जन में एक पन्ने पर खबर और दूसरे पन्ने पर ऐड छपा जाता है और यह एक स्वीकार्य प्रक्रिया बन गयी है.

पालिटिको

बिल निकोलस से हम लोगों की काफी लंबी बात हुई जिसमें उन्होंने अमेरिकी प्रेस व्यवस्था और अपने ई-पेपर के बारे बताया. मैंने उनसे सवाल किया कि जिस प्रकार से भारत में ज्यादातर मीडिया पर बड़े औद्योगिक घरानों का कब्ज़ा है क्या वही स्थिति अमेरिका में भी है. बिल का कहना था कि अमेरिका में ऐसी स्थिति नहीं है और ऐसे कई अखबार हैं, जो औद्योगिक घरानों से अलग हैं और ट्रस्ट आदि के माध्यम से भी चलाए जाते हैं.

उन्होंने एक बहुत ही मजेदार और सारगर्भित घटना बतायी. उन्होंने कहा कि वे इस अखबार में ऊँचे ओहदे पर हैं, मैनेजिग एडिटर हैं. साथ ही वे दिवंगत पॉप स्टार माइकल जैक्सन के भी बहुत बड़े फैन हैं. जब माइकल जैक्सन की अकस्मात मृत्यु की खबर आई तो एक पक्के फैन के रूप में वे भी काफी मर्माहत थे. पर उन्होंने इस खबर को अपने इस अखबार में नहीं लगाया क्योंकि यह राजनैतिक खबर नहीं थी और इसीलिए उनके अखबार का विषयवस्तु नहीं थी. उन्होंने माइकल जैक्सन पर अपनी श्रद्धांजलि भी लिखी, पर उसे भी अपने अखबार के लिए नहीं, दूसरे अखबारों के लिए. मैं समझती हूँ यह बात अपने आप में सीखने और सोचने लायक है.

अमेरिका से डॉ. नूतन ठाकुर की रिपोर्ट.


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