हिन्दुस्तान अब हिन्दुस्तान नहीं, पुराना भास्कर हो गया

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मैं बात कर रहा हूं दिल्ली के नंबर 2 अखबार की। हिन्दुस्तान की। एक जानदार अखबार, जिसका कंटेंट नंबर 1 अखबार की तुलना में बेहतर माना जाता है। अब वह हिन्दुस्तान ‘हिन्दुस्तान’ नहीं रहा। वह 2-3 साल पुराना दैनिक भास्कर हो गया है। 12 अप्रैल 2011 से हिन्दुस्तान नए कलेवर के साथ पाठकों के बीच में है। पहले ही पन्ने की इवन साइड पर समूह संपादक शशि शेखर जी का सुंदर लेख है। इसके अगले पन्ने से कंटेंट शुरू होता है।

कुछ दिनों से चर्चा थी कि हिन्दुस्तान नए कलेवर के साथ आ रहा है। सभी मीडियाकर्मी इस कलेवर को देखने को उत्सुक थे। मैं भी। पर मैं नहीं जानता था कि करोड़ों रुपयों की लागत के बाद भी मुझे हिन्दुस्तान का नया चोला पुराने भास्कर जैसा नज़र आएगा। यह सही है। अगर मेरे सामने आज का हिन्दुस्तान और 2-3 साल पुराना भास्कर पेपर रख दिया जाए और दोनों का हैडर छिपा दिया जाए तो मैं दोनों में आसानी से फर्क नहीं कर पाऊंगा। मैं क्या, यकीन है कि कोई भी नहीं कर पाएगा।

ये समानताएं हैं-

1. हैडिंग का फोंट हू-ब-हू वही है, जिसका इस्तेमाल कभी भास्कर करता था।
2. डबल डेक हैडिंग का एलाइनमेंट लेफ्ट है। भास्कर का भी लेफ्ट था।
3. बॉडी फोंट ज्यादा डार्क और बड़ा है, जैसा कि भास्कर का था।
4. लीड और एंकर न्यूज़ पर फ्लैग का इस्तेमाल। और दोनों का लेफ्ट एलाइनमेंट।
5. बरगंडी कलर का क्रॉसर। भास्कर का लाल रंग का था।
6. अंदर के पन्नों का हेडर। पुराने भास्कर की कॉपी।
7. फोटो पैकेज विद प्वाइंटर्स। हिन्दुस्तान के आज के पेज नंबर 4 पर देखें। भास्कर की आद आएगी।
8. येलो कलर का वेल्यू एडिट बॉक्स। भास्कर भी कभी पीला रंग इस्तेमाल करता था।
9. साइड बार या न्यूज़रील दो कॉलम है, भास्कर का पुराना स्टाइल।
10. न्यूज़ रील में पीले बॉक्स का इस्तेमाल।

एक और बात- बेशक हिन्दुस्तान ने करोड़ों रुपए इस स्टाइल शीट पर खर्च कर दिए होंगे। लेआउट अच्छा भी लग रहा है। पहले का भास्कर भी अच्छा लगता था। लेकिन करोड़ों रुपए किसी विदेशी को देने की बजाय अगर अपने कर्मचारियों को बोनस या इन्क्रीमेंट में दिए होते तो पेपर में और जान आ जाती। जब हिन्दुस्तान मैनेजमेंट ने चंडीगढ़ एडिशन बंद कर दिया था। तब कई स्ट्रिंगर्स को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था। कई बाल-बच्चों वाले थे। उनकी आंखों में भय देखा। मैनेजमेंट को बद्दुआएं देते सुना। इसी एक करोड़ को यदि चंडीगढ़ में निवेश किया होता तो वह यूनिट बंद होने से बच सकती थी। यूनिट के लोग बेरोजगार हुए, चलिए मैनेजमेंट को उसका ख्याल नहीं आया। लेकिन इतने बड़े और नामी अखबार की एक यूनिट बंद होना बड़ी बात है। मुझे लगता है कि यह एक बड़ी हार थी। शायद मैनेजमेंट को न लगता हो?

मलखान सिंह के ब्लाग दुनाली से साभार.

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