साहित्यकारों की जुटान के बीच 'पूर्वग्रह' री-लांच

E-mail Print PDF

पूर्वग्रहसाहित्य-कला आलोचना की त्रैमासिक पत्रिका 'पूर्वग्रह' की री-लांचिंग पिछले दिनों दिल्ली के साहित्य अकादमी सभागार में हुई। पत्रिका के जनवरी-मार्च 2009 के अंक का लोकार्पण प्रसिद्ध आलोचक डा. नामवर सिंह, वरिष्ठ कवि कुंवर नारायण, प्रख्यात कथाकार कृष्णा सोबती, पत्रिका के संपादक प्रभाकर श्रोत्रिय व न्यासी सचिव मनोज श्रीवास्तव ने किया। यह पत्रिका भोपाल से निकल रही है। भारत भवन की यह मैग्जीन नए संपादक के नेतृत्व में नए स्वरूप व तेवर में पाठकों के समक्ष आ चुकी है।

री-लांचिंग का विशेषांक प्रख्यात कवि कुंवर नारायण पर आधारित है। इसमें कवि कुंवर नारायण की कई अप्रकाशित कविताएं भी प्रकाशित हुई हैं। साथ ही लोक कला, यात्रा, कविता, कहानी, आलेख आदि को भी स्थान दिया गया है। इस मौके पर अपने संबोधन में प्रख्यात आलोचक डा. नामवर सिंह ने साहित्यिक पत्रिकाओं को राजनीति से बचाने की वकालत की। 'पूर्वग्रह' के नए अंक की प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा कि यह काफी संतुलित और व्यवस्थित है।

मनोज श्रीवास्तव का संबोधन और मंचासीन प्रभाकर श्रोत्रिय, नामवर सिंह, कृष्णा सोबती और कुंवर नारायणकवि कुंवर नारायण ने कहा कि एक पाठक और लेखक के तौर पर वो पत्रिका से काफी लंबे समय से जुड़े रहे हैं। कई उतार-चढ़ाव के बावजूद पत्रिका ने अपना वास्तविक स्वभाव बनाए रखा है। उन्होंने उम्मीद जताई की पत्रिका साहित्यिक परिप्रेक्ष्य को समेटते हुए निकलती रहेगी। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहीं कथाकार कृष्णा सोबती ने नए अंक की पहली कविता 'प्यार की भाषाएं' का पाठ किया। पत्रिका की री-लांचिंग के मौके पर साहित्य जगत की कई नई और पुरानी हस्तियां मौजूद थीं। साहित्य अकादमी सभागार खचाखच भरा हुआ था। इस पत्रिका के पहले संपादक अशोक वाजपेयी भी मौजूद थे। न्यासी सचिव मनोज श्रीवास्तव ने 'पूर्वग्रह' को आधुनिक साहित्य समारोह में मौजूद लेखक और रचनाकारऔर कला की प्रतिनिधि पत्रिका बनाने के लिए प्रतिबद्ध होने की बात कही जबकि संपादक प्रभाकर श्रोत्रिय ने 'पूर्वग्रह' में किसी भी तरह का पूर्वाग्रह न होने की बात कहकर इस मैग्जीन से हर तरह के लेखकों, रचनाकारों, साहित्यकारों को जुड़ने का आह्वान किया।

 

 

यशवंत सिंह, नामवर सिंह और मनोज श्रीवास्तव


AddThis